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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। व्यंग्य ।।

 

 

मीडिया पर मंहत


वीरेन्द्र जैन

 

क ज़माना था जब संत शहर से बाहर रहते थे। दूसरे हिसाब से कहें तो शहर से बाहर रहने का नाम ही संतई होता था। कोई जंगल की तरफ़ भागता था तो कोई पहाड़ पर चढ जाता था, कोई गुफाओं में छुप जाता था तो कोई बरगद की जटाओं में घुस जाता था। इन्द्र तक परेशान रहते थे कि मेनकाओं को कहाँ भेजें। उन्हें भेजने से पहले जासूसों को भेजना पड़ता था कि जाकर देख तो आओ कि इन्द्रासन को झूला बनाकर डुलाने के लिए कौन कहाँ कहाँ तपस्या में जुटा हुआ है। कई बार पता भी पड़ जाता था तो भी मेनकाएँ स्ट्रेचर पर धरी हुई वापिस लौटती थीं। स्लीव लैस ब्लाउज को मात देती कंचुकी में गठान लगाये हुए मेनकाएँ जब अपने समय का चालू उत्तेजक नृत्य आइटम पेश कर रही होती थीं तब पैर ऐसी ऊटपटाँग जगह पड़ता था कि या तो सीधे खाई में गिरती थीं या मोच आ जाने पर पैर पकड़कर बैठ जाती थीं और इन्द्र के दूतों को लादने को सुख प्रदान करती थीं। बेढब बनारसी ने लिखा है कि-

इसी को कहते हैं होता है दुख में सुख बेढब

लिपट के रोने लगीं हमसे, फेल होने पर

 

कुछ दो चार गुरू घंटाल संत ही ऐसे हुए होंगे जो तपस्या के लिए स्थान का चुनाव करते समय मेनका के नृत्य की पूर्व व्यवस्था देखकर चलते होंगे। तपस्या में लीन होने से पहले जमीन देख लेते होंगे

 

मेनकाओं का डेलीगेन इन्द्र को ज्ञापन सौंपते हुए कहता होगा- महाराज हमें डयू्टी पर भेजने से पहले इन संतो को थोड़ी ठीक जगह तो बैठाइये जहॉ पर इनकी तपस्या भंग करने का टनाटन प्रोग्राम प्रस्तुत किया जा सके। झूम कर नाचू तो घघरे का घेर तबलची के मुख मंडल पर तो न आये। हमारी सीआर बेकार में ही गलत तरीके से खराब हो रही है। पिछले साल पचास सन्तों की तपस्या भंग करने गयी पर हर बार अपना ही हाथ पायंव भंग कराके लौटी।

 

पर इस ज़माने की बात दूसरी है, संत अब शहर से बाहर नही जाते। वे शहर में ही बड़ी-बड़ी ज़मीनें दाब कर उन पर बिल्डिगें तान लेते हैं और जिनका नाम भर आश्रम रख लेते हैं। हेयर डाई करते हैं व दाढ़ी को शेम्पू से धोते हैं। अपनी छवि सुधारने के लिए सौदर्य विशेषज्ञों की सलाहें लेने के बाद प्रवचनों की रिहर्सलें करते हैं। अनेक प्रवचन लेखकों की रोज़ी-रोटी और दारू चखने का ख़र्चा इन्हीं की दम पर चल रहा है। उनकी अलमारियाँ पुस्तकों से भरी पड़ी रहती हैं जिनका इस्तेमाल उनके प्रवचन लेखक करते रहते हैं। माइक के सही इस्तेमाल की विशेषज्ञता उनके पास होती है तथा स्वरों के उतार चढाव को सीखने कई संगीतज्ञ उनके पास आते हैं। भाव भंगिमाएँ उनके कुशल अभिनेता  होने की मार्कशीट होती हैं जिसमें उन्हें पनचानवे प्रतिशत से अधिक अंक मिले होते हैं। वे मच्छरदानी लगा कर सोते हैं तथा पाउडर में भभूत या भभूत में पाउडर मिलाकर श्याम सुन्दर दिखने का पूरा प्रयास करते हैं।

 

पहले लोग संतो के पास जाते थे, अब संत लोगों के हर आते हैं। उन्हें बुलानेके लिए बड़े बड़े रंगीन पोस्टर लाखों की संख्या में छपवाकर दीवार-दीवार कोने-कोने में चिपकवा देते है- यहाँ तक कि मूत्रालयों को भी नही बख़्शते। अखबारों में सूचना नहीं विज्ञापन देते हैं कि संत फलां ट्रेन से पधार रहे हैं। इस विज्ञापन में जो फोटो छपता है उसमें वे फूलों के हार पहने हुए होते हैं जिससे लोगों को स्वागत हेतु हार ले जाने की याद दिला दी जाती है। उनका पंडाल लाखों रूपयों का होता है जिसमें पखे लगे होते है, कूलर लगे होते हैं, जिनमें गुलाब जल डला होता है। आध्यात्म का भैतिक आनन्द चारों और प्रवाहित होता रहता है। मेनकाए संत की कर्मचारी होती हैं जो संत की नहीं अपितु उनके भक्तों की जड़ता भंग करने में कोई कभी न छोड़ने की दृष्टि से सादा वेषभूषा में सद्यस्नात-सी ताज़ा नजर आती हैं।

 

इन दिनों इन्द्र निश्चिंत रहने लगे हैं क्योंकि अब इन्द्रासन को कहीं कोई ख़तरा नज़र नही आता। इन्द्र की नगरी से अच्छी तो संत ने अपनी दुनिया बसा ली है। इन्द्र देख ले तो खुद ईर्ष्या करने लगे। डरे कि मेनकाए तपस्याएँ भंग करने जायें तो यहीं की होकर न रह जायें। एयर कंडीशंड हाल में नाचने का आनन्द ही कुछ और है। पहले के संत तो न जाने भाँग-गाँजा धतूरा काहे का सेवन करके तपस्या मग्न रहते थे कि टाँगें दुख जाती थीं पर तपस्या नही टूटती थी। 'कि घुँघरू टूट गये' जैसे वाक्य की रचना ऐसी दशा में हुयी होगी। अब संतों की आँखें ही नहीं मुँदती हैं- एक निमेष को भी नेत्र निमीलित नही होते हैं। मैथली शरणगुप्त की अलंकारित हिन्दी का कचरा किये पड़े हैं। संत अब अपने बाज़ार का पूरा ध्यान रखते हैं। जहाँ पर वे नही जा पाते वहॉ का बाज़ार भी नही छोड़ते इसके लिए विजुअल मीडिया गठिया लिया है। जितने संत है सबने कोई न कोई चैनल पकड़ लिया है। सैकेड़ों चैनल हैं और घी दूध डकारते हजारों संत हैं, कई चैनलों पर तो दो- दो तीन तीन लदे  रहते हैं।घर में बुङ्ढा एक चैनल से उपदेश की चुस्की ले रहा है तो बुढिया दूसरे चैनल से संतवाणी का रसपान कर रही है। लड़के बहू ने रात्रि में जिस चैनल पर से उत्तेजनाओं का गर्मागर्म डोज़ लिया था उसी पर सुबह सुबह संत बिलबिला रहे हैं। अभी थोड़ी देर बाद दादा-पोते के बीच रिमोट कंट्रोल पर कंट्रोल का युद्व होने वाला है तथा कार्टून फिल्म  और संत क्रमश: टेलीविज़न पर चूहा दौड़ करेंगे। भजन गाने वाली गायिका सुन्दरी थोड़ी देर में पॉप गाने लगेगी पता ही नही चलता कि अपने दिवंगत पूर्व पति के प्रेम में करूण हो रही है या नये संगीत निर्देशक के इश्क में इतरा रही है।

 

डाकू का काम करने वाले बापू के रूप में प्रचारित होते देख गांधीजी के चित्र को शर्म आ रही है। ये कुछ ही दिनों में फ़िल्म अभिनेताओं तथा क्रिकेट खिलाडियों की तरह विदेशी बाज़ार की वस्तुएँ हर्बल उत्पाद के नाम पर बेचते नज़र आयेगे। संतो की सिफ़ारिश वाले सेनेटरी नेपिकिन्स ख़ूब बिकेंगे।

    वीरेन्द्र जैन

21 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास, भोपाल, मप्र

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