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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

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।। प्रशंगवश।।

 

 

घातक है कट्टरपंथियों का जनसंख्या बढाओ अभियान


तनवीर जाफ़री

 

छोटा परिवार-सुखी परिवार, जनसंख्या नियंत्रण के पक्ष में भारत सरकार द्वारा जारी किया गया यह महज़ एक नारा ही नहीं बल्कि वास्तविकता भी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अधिक बच्चे किसी भी परिवार में न सिर्फ़ सम्पत्ति के विभाजन का कारण बनते हैं बल्कि इनके पालन पोषण, शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य तथा जीवन-यापन हेतु सब कुछ एक अलग परिवार की भाति मुहैया करना अथवा बच्चों को इस योग्य बनाना कि वे आत्मनिर्भर होकर अपना जीवन यापन करें, यह सभी माता-पिता का नैतिक दायित्व होता है। परन्तु भारत जैसे विशाल देश की अधिकांशतय: ग़रीब निम्न मध्यम वर्ग की आबादी अपने इस दायित्व को पूरा कर पाने में स्वयं को असमर्थ पाती है। तीन-चार दशक पूर्व तक तो जो कुछ हो लिया सो हो लिया, परन्तु अब धीरे-धीरे भारतीय जनमानस में इस विषय को लेकर जागृति आने लगी है। अब लगभग प्रत्येक भारतीय चाहे वह किसी भी धर्म या सम्प्रदाय का क्यों न हो, यह महसूस करने लगा है कि अधिक जनसंख्या किसी भी क़ीमत पर लाभकारी नहीं है बल्कि यह समाज व देश के लिए घातक है। आज हर ख़ासोआम इस बात को भली-भांति समझ चुका है कि यदि उसे अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देनी है, उसके भोजन, कपड़े, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य जीवन संबंधी ज़रूरी ख़र्चों की उचित व्यवस्था करनी है तो उसे कम-से-कम बच्चे पैदा करने होंगे तथा जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण रखना ही होगा।

             

आज पूरे विश्व में मँहगाई को लेकर हाहाकार मची हुई है। अच्छे ख़ासे कमाते हुए परिवार के लिए दो वक्त क़ी रोटी जुटा पाना एक चुनौती के समान हो गया है। दैनिक उपभोग की वस्तुएँ विशेषकर खाद्य सामग्री के भाव पूरी दुनिया में आसमान छू रहे हैं। ऐसे समाचार प्राप्त हो रहे हैं कि इस बढ़ती हुई वैश्विक मँहगाई की वजह से अनेकों परिवारों ने अपने खान-पान व रहन-सहन में बदलाव लाना शुरु कर दिया है। जिन परिवारों में एक समय के भोजन में दो तीन तरह की सब्जियाँ बना करती थीं, वहां अब एक ही प्रकार की सब्जी बनाकर काम चलाया जा रहा है। तीन रोटियों से पेट भरने वाले अनेक परिवार अब मात्र 2 रोटी से अपना पेट भरने की आदत डाल रहे हैं। ज़ाहिर है इस बढ़ती हुई मँहगाई की भी सबसे अधिक मार वही परिवार झेल रहा है जिसके पास आय के साधन तो अत्यन्त सीमित हैं परन्तु बच्चों की संख्या अधिक है। ज़ाहिर है ऐसे हालात में ग़रीब व अधिक बच्चे वाले परिवारों का भविष्य अंधकारमय ही होगा।

             

परन्तु इन सभी ज़मीनी वास्तविकताओं से दूर दुनिया में कुछ साम्प्रदायिक एवं कट्टरपंथी शक्तियाँ ऐसी भी हैं जो ग़रीबी, अशिक्षा तथा जनसंख्या वृद्धि को सत्ता हासिल करने के एक कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहती हैं। जनसंख्या वृद्धि के मामले में सबसे बदनाम समुदाय मुस्लिम समुदाय को माना जाता है। इसका मुख्य कारण इस्लाम धर्म में पुरुष द्वारा एक से अधिक शादियाँ करने की छूट को माना जाता रहा है। कालान्तर में मुस्लिम जनसंख्या में विश्वस्तर पर हुई वृद्धि का एक कारण यह भी हो सकता है, परन्तु आमतौर पर अशिक्षित मुस्लिम परिवार में ही अधिसंख्य बच्चों की संख्या देखने को मिलेगी। आम मुसलमान अपने प्रत्येक नवजात बच्चे को 'अल्लाह की देन' जैसे प्रचलित मुहावरे की आड़ में स्वीकार कर लिया करता था। परन्तु अब समय बदलने लगा है। बदलते समय के साथ-साथ इन्सानों की सोच में भी भारी बदलाव आने लगा है। अब आम मुसलमान यह महसूस करने लगा है कि उसका नवजात शिशु बेशक 'अल्लाह की देन' क्यों न हो परन्तु चूँकि उस नवजात बच्चे के जन्म का माध्यम अल्लाह ने ही स्वयं उसके माता-पिता को बनाया है, अत: उस शिशु के जीवन यापन का ज़िम्मा भी उन्हीं माता-पिता का है। केवल मुसलमान ही नहीं बल्कि प्रत्येक समुदायों के अशिक्षित परिवारों में बच्चों की एक लम्बी ंफौज देखी जा सकती है।

      

जनसंख्या वृद्धि के विस्फोटक परिणामों से बचाव हेतु एशियाई देशों सहित दुनिया के कई हिस्सों में जनसंख्या नियंत्रण के पक्ष में सरकार द्वारा अनेकों विशेष कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। कई देशों की सरकारों ने तो जनसंख्या नियंत्रण हेतु विशेष मंत्रालय गठित किए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ऐसे कार्यक्रमों को प्रोत्साहन देता है तथा उसके लिए विशेष धन मुहैया कराता है। परन्तु ठीक उसके विपरीत कई कट्टरपंथी सम्प्रदायवादी संगठन ऐसे भी हैं जो जनसंख्या नियंत्रण जैसे लोकहित के कार्यक्रमों का विरोध कर रहे हैं। य शक्तिया जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों का केवल विरोध ही नहीं कर रही हैं बल्कि अपने समुदाय के धर्मान्ध अनुयाईयों को अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने की सलाह तथा इस कार्य हतु उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन भी दे रही हैं।

             

भारत में सक्रिय कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी संगठनों के कुछ ज़िम्मेदार नेताओं द्वारा भारत में हिन्दू सम्प्रदाय के मध्य यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि भविष्य में भारत में मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या के चलते मुसलमान बहुसंख्या में हो जाएँगे तथा हिन्दु समुदाय अल्पसंख्यक हो जाएगा। यह नेता हिन्दू समुदाय के भोले-भाले, अशिक्षित व धर्मान्ध व्यक्तियों का आह्वान कर रहे हैं कि वे अधिक-से-अधिक बच्चे पैदा करें ताकि हिन्दू समुदाय स्वयं को बहुसंख्यक के रूप में क़ायम रख सके। नि:संदेह उनका यह आह्वान महज़ दुष्प्रचार पर आधारित है। भारत का अशिक्षित समाज चाहे वह किसी भी समुदाय का क्यों न हो, आमतौर पर उन्हीं परिवारों में अधिक बच्चों की फ़ौज देखने को मिलेगी। मुस्लिम समुदाय में एक से अधिक शादियाँ करने जैसे व्यवहारिक दौर भी अब नहीं रहा। आज का नवयुवक एक ही शादी तथा शादी के उपरान्त बढ़ने वाले आर्थिक ख़र्चों को लेकर चिंतित दिखाई देता है। ऐसे में दो शादी करने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। परन्तु केवल धार्मिक दुर्भावना फैलाने हेतु यह बातें मात्र इस मंकसद के मद्देनंजर की जाती हैं ताकि संख्या वाले लोकतंत्र के खेल में बहुसंख्या के आधार पर सत्ता तक का सफ़र तय किया जा सके।

             

इसी प्रकार ईसाई समाज जोकि अपने सभ्य एवं प्रगतिशील समाज होने का दावा करता है, उसके द्वारा भी पिछले दिनों भारत के केरल राज्य के रोमन कैथोलिक चर्च की ओर से इसी प्रकार का आह्वान किया गया। चर्च की ओर से कहा गया है कि- 'ऐसा देखा जा रहा है कि ग़रीब व्यक्ति आर्थिक परेशानियों के चलते अधिक बच्चे पैदा नहीं करते। परन्तु यदि ग़रीब लोग अधिक बच्चे पैदा करेंगे तो रोमन कैथोलिक चर्च उनकी आर्थिक सहायता करेगा।' चर्च ने जनसंख्या वृद्धि हेतु चलाए जाने वाले इस घातक कार्यक्रम हेतु बाक़ायदा एक अलग विभाग भी गठित किया है। यह विभाग अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने पर ग़रीबों की सहायता तो करेगा ही साथ-साथ ग़रीब परिवारों को अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने हेतु प्रोत्साहित भी करेगा। यहाँ यह बात ग़ौरतलब है कि किसी भी समुदाय द्वारा जब भी जनसंख्या वृद्धि हेतु किसी भी समुदाय के परिवार को प्रोत्साहित किया जाता है तो इसमें प्रोत्साहन देने वाले तथाकथित धर्मगुरुओं अथवा साम्प्रदायिक संगठनों से जुड़े नेताओं द्वारा उन्हें सीधे तौर पर धर्म का ही वास्ता दिया जाता है। और जहां बात धर्म की आ जाए वहां स्वर्ग अथवा जन्नत जैसी परिकल्पनाएँ अपने आप ही प्रकट हो जाती हैं। और यही धार्मिक भावनाएँ जागृत करना इन साम्प्रदायिक संगठन चलाने वाले नेताओं का मुख्य उद्देश्य होता है।

             

ऐसे में, जबकि भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों की सरकारें जनसंख्या नियंत्रण हेतु वृहद् पैमाने पर बड़े से बडे ख़र्चीले कार्यक्रम चला रही हैं, फिर सरकार की इन नीतियों का विरोध करने का अधिकार आख़िर इन्हें किसने और क्योंकर दे दिया है ? साम्प्रदायिकतावादी शक्तियाँ जोकि वास्तव में लोकतंत्र विरोधी होती हैं परन्तु यह तांकतें अपनी तानाशाही सोच को तरह-तरह के धार्मिक व व सामाजिक संगठनों के माध्यम से अपने धर्मान्ध अनुयाईयों पर थोपकर बहुमत का ख़तरनाक खेल खेलना चाहती हैं। इस कार्य हेतु इन शक्तियों ने लोकतांत्रिक प्रणाली में विश्वास रखने वाले संगठनों से भी खुली साँठगाँठ कर रखी है। यह साम्प्रदायिक शक्तियाँ संसदीय चुनावों के समय स्वयं को बेनक़ाब करती हैं तथा अपने विचारों की पैरवी करने वाले राजनैतिक संगठन के पक्ष में मतदान कराने हेतु साम्प्रदायिक आधार पर मतदाताओं को प्रेरित भी करती हैं। ऐसे में ज़रूरी है कि बच्चा पैदा करने जैसे अति व्यक्तिगत मामलों को संबंधित परिवारों के विवेक पर ही निर्भर रहने दिया जाए। सत्ता को निशाना बनाते हुए ग़रीब परिवारों के साथ उनकी आर्थिक स्थिति का मज़ाक़ उड़ाना क़तई अच्छा नहीं है। यदि प्रोत्साहन देना ही है तो किसी व्यक्ति को रोज़गार मुहैया कराने हेतु अथवा किसी बच्चे को शिक्षित बनाने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिए तथा उसकी आर्थिक सहायता की जानी चाहिए न कि बच्चे पैदा करने हेतु। ऐसे आह्वान अनैतिक, घातक, अमानवीय तथा सरकार विरोधी भी हैं। ऐसे आह्वान करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई भी की जानी चाहिए।

  तनवीर जाफ़री,

सदस्य, शासी परिषद,हरियाणा साहित्य अकादमी

22402, नाहन हाऊस, अम्बाला शहर, हरियाणा

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