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आंतरिक सुरक्षा पर अब तो
सोचिए !
संजय
द्विवेदी
बेंगलुरू
में हुए बम धमाकों ने एक बार फिर हमारी आंतरिक सुरक्षा के सवाल
को और गहरा कर दिया है। हमारे राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र पर
सुरक्षा के प्रश्न को नजरंदाज करने के आरोप लगते रहे हैं। आज
के हालात में यह समझ पाना मुशिकल है कि हमारी सरकारों के लिए
यह सवाल इतना बेमानी क्यों है। देश की जनता के जान-माल का
मुद्दा जिस हल्के तरीक़े से हमारी राजनीति के द्वारा लिया जा
रहा है वह चिंता में डालता। आतंकवाद के ख़िलाफ़ हमारे तंत्र
में कहीं से संकल्प और दृढ़ता के दर्शन नहीं होते। यही कारण है
समाज में असुरक्षा का वातावरण घनीभूत होता जा रहा है और तंत्र
के प्रति जनमन में गहरी निराशा का भाव है। यही कारण है कि
हमारे समाज में अतिवादी ताक़तें ज़हर घोलने में सफल हैं।
हमारा तंत्र
हम भारत के लोंगों को सुरक्षा और सम्मान से जीने की गारंटी
देने में विफल क्यों है इस गंभीरता से सोचना होगा। राजनीतिक
क्षेत्र में घटती संवेदनहीनता और हर सवाल से राजनीतिक लाभ
उठाने का मामला हमें चौतरफ़ा दिखता है। इससे हुआ यह है कि मूल
सवाल हमारी राजनीति के लिए कभी मुद्दा बनते ही नहीं। भारत इतने
लंबे समय से आतंरिक सुरक्षा के संकट से जूझ रहा है किंतु
आतंरिक सुरक्षा के विषय पर हमारे तंत्र में कोई गंभीरता नहीं
दिखती। नक्सलवाद, आतंकवाद,जातीय आंदोलनों से लेकर अनेक विषयों
पर हमारे समाज जीवन में तत्काल तनाव पैदा हो जाता है। हिंसा की
घटनाएँ भी हो जाती हैं। लेकिन इन्हें रोकने के उपाय नदारद
दिखते हैं। विविधताओं से भरे इस देश में कब कौन किसे किस भावना
के नाम पर उद्वेलित करके वातावरण बिगाड़ दे या हिंसा फैलाने के
लिए लगी ताकतों का हस्तक बन जाए कहा नहीं जा सकता।
आतंकवाद का
वातावरण बनाकर देश की जनता को आतंकित करने और आतंकियों के
प्रति भारतीय राज्य का नरम रुख देखकर ऐसी घटनाओं को और बल
मिलता है। हमें देखना होगा कि भारतीय राज्य की पहचान एक ऐसे
देश के रूप में बन रही है जहाँ कानून या तो नाकाम दिखता है या
आरोपियों को सजा दिलाने में हमारे पसीने छूट जाते हैं। पुलिस
तंत्र सिर्फ वीआईपी सुरक्षा में ही अपनी मुक्ति समझता है। औसत
रूप में देखें तो पुलिस के पास पुलिसिंग के लिए वक़्त ही नहीं
है। इस हालात में हम भारत के लोग कैसे और किससे अपनी व्यथा कह
सकते हैं।
नक्सली आतंक हो
या अन्य क़िस्म के आतंक सबके निशाने पर निरीह आम लोग ही होते
हैं या छोटे दर्ज़े के पुलिस या अन्य सरकारी कर्मी। सत्ता और
प्रशासन के शिखर पर बैठे अधिकारियों को इससे या तो फ़र्क नहीं
पड़ता या तो वे इन अराजकताओं के प्रति संवेदनहीन हो गए हैं।
ज़ाहिर है ऐसे हालात में हमें अपनी आतंरिक सुरक्षा के प्रश्न
को केंद्रीय चिंता का विषय बनाने की ज़रूरत है। तेज़ी से
आथिर्क प्रगति और विकास की सीढियाँ चढ़ते देश के लिए ये संकेतक
बेहद ख़तरनाक हैं। इससे देश के जन-मन का भरोसा तो टूटता ही है
दुनिया में भी हमारी पहचान एक कमज़ोर देश के रूप में बनती है
जो अपनी ही समस्याओं से घिरा हुआ है। यह कहीं से भी भारत के
महाशक्ति बनाने के दावे पर उचित नहीं लगती है। हमारी पहचान
अपने देश
की शांति, सुव्यवस्था और सदभाव से ही होगी। ये हालात ही तेजी
से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए शुभंकर साबित हो सकते हैं।
बेंगलूरू जैसे तेज़ी से आगे बढ़ते और आईटी सिटी के नाम से जाने
जाने वाले शहर में धमाके दुश्मनों के इरादे ज़ाहिर करते हैं।
इसके पहले भी हमारी आर्थिक राजधानी और महानगर निशाने पर रहे
हैं।
हमें देखना होगा
कि हमारे देश को आख़िर किन ताक़तों की बुरी नजर लग गई है।
सुऱक्षा के बड़े होते घेरे में रहने वाले राजनेता ही आख़िर
क्यों हमारी चिंता के केंद्र में हें। आम आदमी की जान माल इस
जनतंत्र में इतनी सस्ती क्यों है। आख़िर यह सिलसिला कहाँ जाकर
रूकेगा। राजनीति की अपनी चाल औऱ चितांएँ होती हैं पर हमें यह
सोचना होगा कि जब देश ही नहीं बचेगा तो हम अपनी राजनीति कहाँ
करेंगें। इन धमाकों की आवाज़ अगर हमारे तंत्र के कानों तक
पहुँच सके और वह इससे सबक लेकर कोई निर्णायक शुरूआत कर सके तो
यह बात हमारे जनतंत्र को ज्यादा संवेदनशील और विश्वसनीय
बनाएगी।
संजय द्विवेदी
-ए-2,अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कालोनी,
रायपुर-492006
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