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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। लघुकथा ।।

 

 

झलमला


स्व. पदुमलाल पन्नालाल बख्शी

रामलुभाया उदास था। 

मैं बरामदे में टहल रहा था। इतने में मैंने देखा कि विमला दासी अपने आँचल के नीचे एक प्रदीप लेकर बड़ी भाभी के कमरे की ओर जा रही है। मैंने पूछा, क्यों री ! यह क्या है ?” वह बोली, झलमला!” मैंने पूछा, इससे क्या होगा ?” उसने उत्तर दिया, नहीं जानते हो बाबू, आज तुम्हारी बड़ी भाभी पण्डित जी की बहू की सखी होकर आई हैं, इसलिए मैं उन्हें झलमला दिखाने ले जा रही हूँ।

 

तब तो मैं भी क़िताब फेंक कर घर के भीतर दौड़ गया। दीदी से जाकर कहने लगा, दीदी थोड़ा तेल तो दो। दीदी ने कहा, जा ! अभी मैं काम में लगी हूँ। मैं निराश होकर अपने कमरे में लौट आया। फिर सोचने लगा, यह अवसर जाने न देना चाहिए, अच्छी दिल्लगी होगी। इधर-उधर देखने लगा। इतने में मेरी दृष्टि एक मोमबत्ती के टुकड़े पर पड़ी। मैंने उसे उठा लिया और दियासलाई का बक्सा लेकर भाभी के कमरे की ओर गया। मुझे देखकर भाभी ने पूछा कैसे आए बाबू ?” मैंने बिना उत्तर दिए ही मोमबत्ती के टुकड़े को जलाकर सामने रख दिया। भाभी ने हँसकर पूछा यह क्या है ?” मैंने गंभीर स्वर में उत्तर दिया, झलमला।

 

भाभी ने कुछ न कह कर मेरे हाथ में पाँच रुपये रख दिए। मैं कहने लगा, भाभी! क्या तुम्हारे प्रेम के आलोक का इतना ही मूल्य है ?” भाभी ने हँस कर कहा, तो कितने चाहिए ?” मैंने कहा, कम-से- कम एक गिन्नी। भाभी कहने लगी, अच्छा इस पर लिख दो, मैं अभी देती हूँ।

 

मैंने तुरंत ही चाकू से मोमबत्ती के टुकड़े पर लिख दिया, मूल्य एक गिन्नी। भाभी ने गिन्नी निकाल कर मुझे दे दी और मैं अपने कमरे में चला आया। कुछ दिनों बाद गिन्नी के ख़र्च हो जाने पर मैं यह घटना बिल्कुल भूल गया।

 

आठ वर्ष व्यतीत हो गए। मैं बी.ए., एल.एल.बी. होकर इलाहाबाद से घर लौटा। घर की वैसी दशा न थी, जैसी आठ वर्ष पहले थी। न भाभी थी, न विमला दासी ही। भाभी हम लोगों को छोड़ कर स्वर्ग चली गई थीं और विमला कटनी में खेती करती थी।

 

संध्या का समय था। मैं अपने कमरे में बैठा न जाने क्या सोच रहा था। पास ही कमरे में पड़ोस की कुछ स्त्रियों के साथ दीदी बैठी थी। कुछ बातें हो रही थी। इतने में मैंने सुना, दीदी किसी स्त्री से कह रही है, कुछ भी हो बहिन, मेरी बड़ी बहू घर की लक्ष्मी थी। उस स्त्री ने कहा, हाँ बहिन ! ख़ूब याद आई, मैं तुमसे पूछने वाली थी। उस दिन तुमने मेरे पास सखी सन्दूक भेजा था न ? दीदी ने उत्तर दिया, हाँ बहिन ! बहू कह गई थी, उसे रोहिणी को दे देना। उस स्त्री ने कहा, उसमें सब तो ठीक था, पर एक विचित्र बात थी। दीदी ने पूछा कैसी विचित्र बात ? वह सोचने लगी। उसे मैंने खोल कर एक दिन देखा उसमें ख़ूब हिफ़ाजत से रेशमी रुमाल में कुछ बंधा हुआ मिला। मैं सोचने लगी कि वह क्या है। कौतूहलवश उसे खोलकर देखा। बहिन ! कहो तो भला उसमें क्या रहा होगा ? दीदी ने उत्तर दिया, गहना रहा होगा। उसने हँस कर कहा, नहीं गहना न था, वह तो एक अधजली मोमबत्ती का टुकड़ा था और उस पर लिखा हुआ था एक गिन्नी, मुझे दे दो ! मैं उस कमरे में पहुँचा और उस स्त्री से कहा, मुझे वह रुमाल दे दो। कुछ स्त्रियां मुझे देखकर भागने लगीं। कुछ इधर-उधर देखने लगी। उस स्त्री ने अपना सिर ढाँपते-ढाँपते कहा, अच्छा बाबू ! मैं उसे कल भेज दूँगी। पर मैंने रात को ही एक दासी भेज कर उस गिन्नी के टुकड़े को मँगा लिया। उस दिन मुझसे कुछ खाया नहीं गया। पूछे जाने पर मैंने यह कह कर टाल दिया कि सिर में दर्द है। बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता रहा। जब सब सोने के लिए चले गए तब मैं अपने कमरे में आया। मुझे उदास देख कर कमला पूछने लगी सिर का दर्द कैसा है ? पर मैंने कुछ उत्तर नहीं दिया। कमला ने पूछा यह क्या है ? में उत्तर दिया, झलमला ! कमला कुछ न समझ सकी। मैंने देखा थोड़ी देर में झलमले का शुद्ध आलोक रात्रि के अंधकार में विलीन हो गया।

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