vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। लघुकथा ।।

 

 

कृष्ण की कूटनीति


हरीश नवल

रामलुभाया उदास था। 

 अंततः कौरवों और पांडवों का युद्ध न टल सका। कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में पांडवों और कौरवों की सेनाएँ साज-सज्जा सहित उपस्थित हो गईं। दोनों पक्षों से शख-ध्वनियाँ गूँजने लगीं। युधिष्ठिर रथ से उतरे और कौरव सेनापति भीष्म पितामह, गुरु द्रोण आदि श्रद्धेय जनों को प्रणाम कर आशीर्वाद लेने गए।

 

इधर अर्जुन के रथ की शोभा ही निराली थीः स्वयं भगवान् कृष्ण सारथी के रूप में शोभित हो रहे थे। अर्जुन ने शत्रुपक्ष की ओर दृष्टि डाली, सब ओर से कुल-वृद्धजन, बंधु-बांधव व मित्र ही नज़र आए। इनसे कैसे युद्ध करूँगा, यह अनुचित है, वह भावुक हो उठा और रथ से नीचे उतर कर गांडीव धरती पर रख दिया। पांडव-पक्ष अवाक् रह गया।

 

कृष्ण को चिन्ता हुईः यदि अर्जुन न लड़ा तो पांडवों की विजय संदिग्ध है। क्या किया जाए ? समय बिलकुल न था। यदि गीता उपदेश दिया जाए, विराट रूप दिखाया जाए तो यहीं दो पहर बीत जाएँगे तब ? कूटनीतिज्ञ कृष्ण ने गंभीर विचार शीघ्र निदान सूझ गया। उन्होंने अर्जुन को कोई उपदेश न दिया, अपितु चौड़ी बेल्ट वाली एक खाकी नेकर उसे बलात् पहना दी... बस, फिर क्या था, अर्जुन पूरे जोश के साथ भिड़ गया।

हरीश नवल

हिंदी विभागाध्यक्ष, हिंदू कॉलेज, दिल्ली 110007

   ◙◙◙

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google