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SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। अपनी बात ।।

 

 

 

 

।।हिंदी भाषा एवं साहित्य की वैश्विक दशा।।

 0 संदर्भ : इंटरनेट 0

 

हिंदी भाषा एवं साहित्य की वैश्विक विस्तृति के पीछे इंटरनेट भी है । सूचना प्रौद्योगिकी का सर्वव्यापीकरण और सिद्धि आगे चलकर उसे और अधिक कारगर साबित करने वाला है । सिर्फ़ एक माध्यम के रूप में नहीं अपितु सूचना-संदर्भ, ज्ञान-जानकारी, शिक्षा-दीक्षा, राग-रंग आदि की सर्वसुलभ-सर्वव्यापी मंच के रूप में भी । उसके पास शब्द, ध्वनि, चित्र और चलचित्र की चतुर्भूजी ताक़त जो है । यह विगत 20 वीं सदी और आगत 21 वीं सदी के हिंदी-मनुष्य का भी वेब-तंरगों में दिपदिपाता ठोस सच है। एक ऐसा सच, जिस पर हम सबों का अवलंबन दीर्घायु होता दिख रहा है । एक ऐसा सच, जो प्रभु होगा और हम दास । आप आज माने या न माने, भविष्य की पीढ़ी की-बोर्ड के संगीत के साथ, सूरदास की लय में गुनगुनायेगी ही, कि प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी । मनुष्य की सभ्यता में इसके पहले, ऐसी कोई भी आभासी चीज़ नहीं थी, जो मनुष्य का विश्वास अर्जित कर सके ।

      

मैं फ़िलहाल उसकी वंदना किये बगैर सीधे उसकी अंनत छाती में उमगती हिंदी और साहित्य की ओर ले चलना चाहता हूँ । विश्व में 80 करोड़ लोग हिंदी समझते हैं, 50 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं,और 35 करोड़ लोग हिंदी लिख सकते हैं। इसके बावजूद हिंदी इंटरनेट में अपनी सही जगह नहीं बना पाई है । यह संख्यात्मक कोण से नैराश्य उपजाता है किन्तु यह भी कम आत्मतोष का विषय नहीं कि आज जहाँ अँगरेज़ी के 20 अरब से अधिक जाल-पृष्ठ मिल जाते हैं, वहाँ हिंदी पृष्ठों का विस्तार एक करोड़ से अधिक की संख्या को लाँघ चुका है । इंटरनेट में मिलने वाली 98 प्रतिशत जानकारी दुनिया की जिन गिनी-चुनी 12 भाषाओं में है, उसमें हिंदी भी है । वैज्ञानिक और साहित्यिक बुद्धिजीवियों के प्रयासों से हमारी हिंदी विदेशी भाषाओं के समानांतर आगे बढ़ रही है । इंटरनेट द्वारा वैश्विक प्रतिष्ठा के हनुमान को अब अँगरेज़ी की सुरसा नामक राक्षसी नहीं भरमा सकती । वहाँ अब हिंदी और साहित्य लेखन - पठन - पाठन और उसकी बहुआयामी आवाज़ाही की लगभग सारी अपरिहार्य तकनीकी-कलायें मौजूद हैं । ऐसे में उस सूचना प्रौद्योगिकी के प्रति, जिसका हिंदी से भी रिश्ता कायम हो रहा है, विश्वास जताया जा सकता है कि – कौन सो संकट मोर ग़रीब को, जो तुमसे नहिं जात है टारो ।

 

सूचना प्रौद्योगिकी और प्रत्यक्ष शब्दावली में कहें तो कंप्यूटर और इंटरनेट ने हिंदी को अंतरराष्ट्रीय धरातल पर विकसित और विस्तार का सुनहरा अवसर दिया है । इससे पहले यह महत्वपूर्ण कार्य हिंदी सिनेमा कर रहा था । इंटरनेट ने तो विगत एक दशक में हिंदी में कार्यसक्षम ई-मेल, सर्च इंजन, वेबसाइट्स, ब्लॉग, युनिकोडिंग फोंट्स, टायपिंग टूल्स, चैटिंग रूम्स, आदि टूल्स और सॉफ्टवेयर्स से अँगरेज़ी का वर्चस्व टूटा है और आज अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साथ हिंदी चारों ओर पसरने लगी है। वह भी चार-चार धाराओं में - आक्षरिक(शाब्दिक) हिंदी, श्रव्यगत हिंदी, चित्रगत हिंदी और चलचित्रगत हिंदी । वैसे हम लेखन-प्रकाशन की दृष्टि से हिंदी भाषा और साहित्य को वहाँ दो रूपों में प्रतिष्ठित देख सकते हैं – पहला पुनर्प्रकाशित हिंदी और दूसरा अपूर्व प्रकाशित हिंदी । पुनर्प्रकाशित हिंदी या साहित्य की श्रेणी में कुछ महत्वपूर्ण मीडिया घरानों द्वारा संचालित अख़बारों में मुद्रित सामग्री के आनलाइनाइजेशन और महत्वपूर्ण कृतिकारों की कृतियों के अंतरजालीय संस्करणों, रचनाकारों की निजी किताबों के अंतरजालीय संस्करणों, शब्दकोशों, थिसॉरसों, आनलाइन एजूकेशन के तहत स्थापित पाठ्यपुस्तकों सहित अन्य विविध विषयों की सामग्री को आदि को गिना सकते हैं, जैसे फ़िल्मी गीत, संगीत । सीधे या पहली बार अंतरजाल पर प्रकाशित हिंदी की श्रेणी में निजी जाल-स्थलों, ब्लॉगों, वेब-पोर्टल्स, सामुदायिक समूहों को शुमार कर सकते हैं ।

 

समाचार पत्र

इंटरनेट की उपयोगिता को सबसे पहले विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ने ही समझा  । टाइम्स आफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, नई दुनिया, इंडिया टुडे, आउटलुक जैसी पत्रिकाओं ने अपने इंटरनेट संस्करण निकालने आरंभ किए, इससे निश्चित ही इन पत्र-पत्रिकाओं के पाठक प्रवासी देशों में भी बढ़े हैं। इस श्रृंखला में हम प्रभासाक्षी, बीबीसी हिंदी, एमएसएन, वेबदुनिया समाचार, दैनिक भास्कर, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, याहू, गूगल हिंदी, नई दुनिया, राष्ट्रीय सहारा, प्रभात ख़बर, यूनिवार्ता, समाचार ब्यूरो, पत्र सूचना कार्यालय, जन समाचार, हरिभूमि, नवभारत, आज तक, हिंदी मिलाप, दैनिक नवज्योति, महामेधा, लोकतेज आदि को भी जोड़ सकते हैं, जो नियमित रूप से हिंदी समाचारों, विचारों के साथ कुछ अंश तक साहित्य को दूर देशों के अंतिम छोरों तक आदान-प्रदान कर रहे हैं ।

 

पत्रिकाएँ

इस समय इंटरनेट में हिंदी में 3 दर्जन से अधिक पत्रिकाएँ चल रही हैं, जिनमें से कुछेक को ठीक उसी तरह देखा जाना चाहिए, जिस तरह हमने हिंदी की लघु पत्रिकाओं को देखा था, और जिनमें इतनी कूवत थी कि संघर्षशील रचनाकारों को एक पहचान मिली और समकालीन साहित्य को नया युगबोध भी । इनके पढ़ने वालों की अच्छी तादाद है। उदाहरण के तौर पर ही बताने की अनुमति लेते हुए बताना चाहूँगा कि - सृजनगाथा डॉट कॉम को मात्र 27 माह में 19 लाख से अधिक हिट्स मिले हैं । हिंदी इंटरनेट के बल पर आज हर कोई संपादक बनने को उद्यत है, किन्तु संपादकीय दृष्टि, साहित्यिक समझ और समर्पण इंटरनेट थोड़े ना देगा । बहरहाल स्तरीय पत्रिकाओं में - सृजनगाथा, अभिव्यक्ति, हिंदी नेस्ट, क्षितिज, शब्दांजलि, कृत्या, साहित्य कुँज, इंद्रधनुष, निरंतर,  लेखनी, साहित्य सरिता, छाया, गर्भनाल, भारत दर्शन, मीडिया विमर्श, उद्-गम, अनुरोध, प्रतिध्वनि, इत्यादि को वैश्विक विश्वास मिला हुआ है । इधर बीबीसी पत्रिका, याहू-जागरण हिंदी यूएसए ने भी साहित्यिक पाठकों के लिए नयी शुरुआत की है । यह दीगर बात है कि वहाँ के संपादकों को तथाकथित चर्चित रचनाकारों के अतिरिक्त और अन्य समकालीन नामों तक पहुँचने की न गरज़ है ना आत्मबोध । अधिंकाश संपादकों के पास संपादकीय टिप्पणी की भी फुर्सत नहीं है । यद्यपि वे वेब-पब्लिशिंग में पांरगत हैं किन्तु साहित्यिक पत्रकारिता की विस्तृत समझ अर्जित करना अभी शेष हैं। इससे हिंदी का मानक रूप, सैद्धांतिकी, काव्य सौष्ठव पर भी अनुशासनहीनता का ख़तरा भी बढ़ गया है । जो भी हो, ये पत्रिकाएँ भारतीय लेखन और प्रवासी लेखन के मध्य सेतु की तरह हैं । इससे कई तरह के भाषीय विविधता, शिल्प, कथ्य, संवेदना की आवाजाही संभव होने लगी हैं । अल्प विकसित या अल्प प्रचलित विधाओं जैसे ललित निबंध, लघुकथा, हायकु, दोहा, ग़ज़ल को नयी ज़मीन मिल रही है और नयी भाषा-संवेदना भी ।


साहित्यिक कोशों का विस्तार

उपयोग, संशोधन, संपादन में स्वतंत्रता देती हिंदी की इनसायक्योपीडिया यानी कि विकिपीड़िया जैसे पोर्टल से हिंदी और साहित्य के संग्रहण के नये द्वार खुले हैं । यह विविध विषयों का मुक्त कोश है । यद्यपि अभी यह अनुशासनबद्ध और भाषायी तथा साहत्यिक दक्षता वाले सहभागी वेब विशेषज्ञों की माँग भी करता है तथापि इसकी लोकप्रियता से सिद्ध हो गई है कि हिंदी समूचे विश्व में और सभी वर्गों में पठनीय और महनीय है। कविता कोश को भी इसी श्रृंखला में लें, जिसमें शताधिक कवियों की कवितायें संग्रहित हैं । आपको यहाँ नौसिखियेपन का भी दर्शन हो सकता है । शायद यही कारण है कि कंटेन्ट के बाज़ारीकरण वाले लोभ में यहाँ उन कवियों को भी रखा गया है, जो केवल यहीं नज़र आते हैं । इधर हिंदी गद्यकोश की भी सहभागी शुरुआत हो चुकी है,  पर वहाँ अतिप्रगतिशीलता की बदबू भी आती है । इसके वैश्विक हिंदी को क्या बचना नहीं चाहिए ? लघुकथा कोश की भी एक बृहत परियोजना रायपुर जैसे छोटी-जगह से शुरू हो चुकी है । भारतीय भाषा कोश केंद्रीय हिंदी निदेशालय का ऐसा शब्दकोश है, जिसका संकलन भाषाविंदों ने किया है। इसमें 14 भारतीय भाषाओं के शब्द एक ही स्थान पर उपलब्ध हैं। जिनके समतुल्य अर्थ 13 भाषाओं में दिए गए हैं। इन शब्दों का संकलन दैनिक जीवन में प्रयुक्त किए जाने वाले शब्दों को ध्यान में रखकर किया गया है और ये शब्द भारतीय संस्कृति एवं परंपरा से लिए गए हैं।

 

ब्लॉग यानी इंटरनेट पर निजी डायरी लेखन की तकनीक से हिंदी की व्यापकता को नया कलेवर और नये स्वरूप मिलने लगा है । इससे हिंदी की अभिव्यक्ति का प्रजातांत्रिक स्वरूप भी उभर कर आने लगा है । सबसे बड़ी बात यह कि हिंदी का विषयतगत विस्तार भी हो रहा है, पर सबसे बुरी बात यह कि वहाँ हिंदी के माननीकरण के नये ख़तरे भी दिखाई देने लगे हैं। उधर आनलाइन किताबों की दुनिया रोज़ समृद्ध हो रही है, जो पाठकीयता की नयी इबारत भी है। यह किताबों के वैश्वीकरण और स्थायीकरण का भी विनम्र प्रयास हो सकता है ।

 

कुछ परामर्श

समस्यायें तो बहुत हैं पर निदान के लिए में इतनी बात तो सर्वग्राह्य हो ही सकती है कि एक मानक कुँजीपटल की अनिवार्यता के लिए सरकारी पहल आवश्यक है जो असरकारी भी हो । इसे युनिकोडित फोंट्स आधारित भी बनाया जा सकता है । इससे सर्च इंजनों से हिंदी में खोजने में जो कठिनाईयाँ है स्वतः दूर हो सकती है । दूसरी विकट समस्या यू.आर.एल.ऐड्रस की है। जब तक यू.आर.एल. ऐड्रस और इंटरनेट संबंधी अन्य सरल तकनीक हिंदी सहज उपलब्ध नहीं होंगी, तब तक अंग्रेजी न जानने वाले बहुसंख्यक हिंदीभाषी इससे दूर ही रहेंगे

जयप्रकाश मानस

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अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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