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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

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।। उपन्यास ।।

 

 

भाग-1

पाँव ज़मीन पर


शैलेन्द्र चौहान

 

वे मेहनतकश

पिता की माँ और चाची यानी बड़ी अइया और छोटी अइया का बड़ा जोरदार संयोग था । दोनों विधवा थीं, वैधव्य एक साथ झेला था उन्होंने । बड़ी अइया के दो बेटे थे, मेरे पिता और चाचा, छोटी अइया संतानहीन थीं । बड़े बाबा भारत-बर्मा मिलिटरी पुलिस में नायक क्लर्क थे । वहाँ से अँग्रेज़ सरकार और संयुक्त प्रांत के मिलिटरी तथा पुलिस अफ़सरों से कई बार निवेदन करने के बाद भी उनका ट्रांसफर उत्तर भारत में नहीं हो पाया तो उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी। उसके बाद उन्हें ग्वालियर पॉटरीज में हैड क्लर्क की नौकरी मिल गई । वे सातवीं तक पढ़े थे और उनकी अँग्रेज़ी काफी अच्छी थी ।

 

विरासत में मिली ढ़ाई गाँव की ज़मीदारी छोड़ कर बाबा रंगून जाकर मिलिटरी पुलिस में भर्ती हो गए थे और मांडले में उनकी पोस्टिंग हो गई थी, जहाँ उन्होंने बारह वर्ष बिताए । तदुपरांत ग्वालियर में दो वर्ष रहने के बाद अपैंडिक्स के ऑपरेशन के दौरान उनकी मृत्यु हो गई । तब पिता कोई चार वर्ष के रहे होंगे और चाचा सिर्फ डेढ़ वर्ष के । उधर छोटे बाबा यानी पिता के चाचा सेना की सिगनल कोर में रुड़की में लांसनायक थे । कोई दो वर्ष बाद जब वे गाँव आए हुए थे तो वहाँ महामारी के रूप में हैजा फैल रहा था । कई लोग मारे जा चुके थे, लोग गाँव छोड़ कर जा रहे थे पर छोटे बाबा हैजे से बीमार लोगों की सहायता करते रहे । इस तरह स्वयं वह भी कोई एक माह बाद इस महामारी के शिकार बन गए । घर में कोई कमाने वाला न बचा, बड़ी अइया और छोटी अइया दोनों विधवा हो गई थीं । उधर पड़ोस में रहने वाली डोकरी अइया भी विधवा थीं । वे बाबा की चाची और पिता की दादी लगती थीं । अब छोटी अइया और बड़ी अइया के लिए जीवन-यापन एक विकराल समस्या थी, मात्र जमींदारी से होने वाली आय ही सहारा थी । उन दिनों राजपूतों की औरतें और वे भी जमींदार परिवार से संबंध रखनेवाली घर से बाहर अकेली क़दम नहीं रखती थीं । ऐसे में बड़ी अइया के भाइयों ने उनकी सहायता की।

 

उनके तीन भाई थे, बड़े भाई गाँव में खेती-किसानी देखते थे, वे अक्सर हमारे गाँव आते और जो भी मदद बनती करते । मँझले भाई खरगोन में ओवरसियर थे, मदद के तौर पर उन्होंने पिता को पढ़ाने का जिम्मा लिया और अपने साथ ले गए । सबसे छोटे भाई डाक्टर थे उनसे भी जो मदद बनती समय-समय पर किया करते । लेकिन गाँव में बड़ी अइया और छोटी अइया को अकेले ही रहना था, साथ में चाचा भी थे, उन्होंने दृढ़तापूर्वक वहीं रहने का मन बना लिया अन्यथा मायके जाने का विकल्प उनके पास था । जमींदारी थी सो गाँव वाले उनका लिहाज करते, निर्बल और पिछड़ी जातियों के लोग तो सारा काम बेगार में करते । दो तीन कामगार जो पहले स्थाई रूप से कोठी पर रहते थे अब धीरे-धीरे काम की तलाश में कोठी छोड़ गए । रह गए बस कन्हई धीवर जो मेरे पैदा होने के तीन वर्ष बाद तक कोठी के बाहर एक कोठरी में अपने परिवार सहित से रहे कन्हई बड़े जीवट के व्यक्ति थे, औसत स्वास्थ्य और रंग एक़दम काला, पर थे बहुत नेक इंसान । जात के कहार, जमींदारी के समय पालकी ढोते थे लेकिन पालकी तो कब की टूट चुकी थी पर कन्हई ने कोठी नहीं छोड़ी । घर की ज़रूरत के लिए सुबह शाम पानी भरना, घर और खेती के छोटे मोटे काम करना । मदद के लिए हमेशा मौजूद रहना कन्हई का अपना दायित्व बन चुका था और यह दायित्व उन्होंने पूरी निष्ठा से पिता और चाचा की नौकरी लग जाने के बाद के कई बरसों तक निभाया । आख़िर में लड़कियों के विवाह और अपनी गुज़र-बसर के लिए वे दूसरे गाँव में बस गए जहाँ उन्हें कुछ अधिक संभावना नज़र आई । जाते वक्त वे बहुत रोए पर कोई चारा न था, अब हमारे यहाँ से उनका भरण-पोषण बहुत मुश्किल था सो जाना ही पड़ा । फिर भी बहुत दिनों तक सप्ताह में एक या दो दिन वे हालचाल लेने के लिए आते रहे । धीरे-धीरे फिर उन्होंने आना छोड़ दिया ।

 

छोटी अइया की पेंशन बँध गई थी । यद्यपि वह बहुत छोटी राशि थी लेकिन एक नियमित आय तो थी ही । उनकी उस आय से भी घर को एक राहत मिली थी । पिता की नौकरी के पहले तक यही आय महत्वपूर्ण मानी जाती थी । इस पेंशन से और कुछ हो न हो छोटी अइया का घर में सम्मान अवश्य बढ़ा था । अब उनकी बातों पर भी बड़ी अइया गौर करने लगी थीं । छोटी अइया भी अपनी अहमियत समझने लगी थीं । जितना बड़ा हमारा घर था उतना ही बड़ा घर पड़ोस में रहने वाली डोकरी अइया का भी  था । हमारे घर के एक कमरे जिसे सब नया मढ़ा कहते थे के साथ ही सटा हुआ डोकरी अइया का भी एक कमरा था । यह कमरा लंबाई में काफी बड़ा था, कोई तीस हाथ या पैंतीस फुट लंबा रहा होगा। इस कमरे में कुछ कबाड़ था, थोड़ा सामलिया का सामान ढोलकें, खंजड़ी और पले (डलिया) वगैरह और एक हाथ से आटा पीसने वाली पत्थर की चक्की भी थी । डोकरी अइया सुबह चार बजे जाग जातीं और चक्की पर अनाज पीसने लगतीं । वे हर दूसरे या तीसरे दिन अनाज पीसती थीं । चक्की  पीसते-पीसते वे दुख से सराबोर कोई गीत गातीं। मेरी कभी-कभी  जब अलस्सुबह नींद खुलती तो मैं डोकरी अइया की चक्की की आवाज़ और उनका विरह गीत सुनता । मुझे उनका सुबह-सुबह गाना अच्छा लगता पर अक्सर यह भ्रम होता कि कहीं वे रो तो नहीं रही हैं । चक्की की घरर-घरर आवाज़ संगीत का काम करती । हमारा सोने का कमरा चूँकि डोकरी अइया के इस कमरे से एक़दम सटा हुआ था सो सुबह-सुबह नि:शब्द एकांत में यह बिरहा डोकरी अइया के दुखी होने का अहसास दिलाता । उनका दुख था भी बहुत बड़ा, ग्यारह वर्ष की उम्र में पैंतालीस वर्ष के बूढ़े से ब्याह दी गई थीं और फिर शादी के एक वर्ष बाद ही वह बूढ़ा भी चल बसा, तब से निपट अकेली रह रही थीं वे इस घर में ।

 

पिछले कुछ दिनों से डोकरी अइया का एक भतीजा सुरेश जो उम्र में मुझसे दो-एक वर्ष बड़ा था, उनके साथ रहने लगा था । कभी-कभी मैं उसके साथ खेलने के लिए डोकरी अइया के घर चला जाता । सुरेश ने सामलिया से बहुत कुछ सीख लिया था । कौड़ियाँ खेलना, मछली पकड़ने के लिए झल्ली बनाना जो कटे हुए शंकु के आकार की होती थी, बकरे का गोश्त साफ करना, बकरे की खाल सुखाकर पकाना, खंजड़ी  बनाना, ढोलक मढ़ना वगैरह । दरअसल सामलिया जात का चमार था लेकिन चमरौटे को छोड़कर अधिकतर समय वह डोकरी अइया के घर में ही रहता, उनके छोटे-मोटे काम करता, अनाज लाता, ले जाता । दशहरे के दिन बकरा ख़रीद कर लाता और डोकरी अइया के आँगन में ही काटता। सबसे पहले वह गोश्त हमारे घर पहुँचाता फिर गाँव में एक-दो दूसरे घरों में, बदले में पैसे या अनाज जो भी उसे ज़रूरत होती ले जाता । डोकरी अइया के पीछे वाले कमरे में उसका बहुत-सा सामान रखा रहता, मढ़ी हुई ढोलकें, पले, टोकरियाँ और पोटलियों में बँधा हुआ अनाज । वह डोकरी अइया के आँगन में बैठकर आराम से चिलम पीता और गाँव, आ-गाँव के किस्से सुनाता । बकरा कट जाने के बाद डोकरी अइया को मनचाहा और मन माफ़िक़ गोश्त मिल जाता था तब उनकी मज़ेदार कवायद शुरू होती, सिलबट्टे पर मसाला पीसना, गोश्त धोना और बड़ी ऐल्युमिनियम की देगची में डालकर चूल्हे पर चढ़ा देना, सुरेश डोकरी अइया की सहायता करता । जब गोश्त पक जाता तो डोकरी अइया हाथ पर पानी लगा-लगा कर बिना बेलन के गेहूँ और चने के मिले हुए आटे की रोटियाँ बनातीं और उन्हें चूल्हे में सेंकती जातीं । पहले सुरेश को खाना परोसतीं तब अपने लिए और सबसे बाद में सामलिया को उसके अलग बर्तनों में खाना देतीं । वे तीनों बहुत आनंद से खाना खाते । मैं यह सब कारोबार देखता रहता और वहीं पास में खेलता रहता । मैं गोश्त नहीं खाता था इसलिए उनके भोज में शामिल न होता ।

 

दरअसल हमारे घर वाले यानी छोटी और बड़ी अइया मेरा सुरेश के साथ खेलना पसंद नहीं करते थे । डोकरी और सामलिया दोनों उनके लिए अस्पृश्य थे क्योंकि जब मैं घर वापस लौटता तो मुझसे कहा जाता कि तुम हाथ-मुँह धो लो, तुमने उन्हें छुआ तो नहीं था, या खाना तो नहीं खाया उनके यहाँ । छोटी अइया कहतीं 'डोकरी का तो कोई दीन धरम नहीं है, सामलिया को घर में घुसेरे रहती हैं।' पर मुझ पर बहुत ज़्यादा पाबंदी नहीं थी इसलिए कभी-कभी खेलने चला जाता था । अक्सर हम धूल से घर, कमरे और कुछ अन्य आकृतियाँ बना कर खेलते । या हमारे पास उन दिनों मिट्टी या लकड़ी वगैरह के जो खिलौने होते उनसे खेला करते । सुरेश के पास जानकारी का काफी बड़ा पिटारा था और उसकी भाषा भी कुछ अलग ही होती थी । वह चूहे के बिल को 'घिल्ल' कहता, वह बताता कि चूहे के बिल में साँप घुस जाता है और फिर उसी में रहने लगता है । एक दिन डोकरी अइया के पीछे वाले कमरे में उसने चूहे के ऐसे एक घिल्ल में साँप को घुसते हुए देखा और उस घिल्ल में तब उसने एक लकड़ी घुसेड़ दी । वह बताता कि साँप अगर काट ले तो नींद आने लगती है तब भगत यानी ओझा ढाक बजाता है और ढाक बजते-बजते साँप का विष उतर जाता है । ढाक क्या होती है यह बात मैंने छोटी अइया से पूछी तो उन्होंने बताया कि रात भर दिया जला कर काँसे की बड़ी थाली बजाते हैं लकड़ियों से । सुरेश की बातें सुनकर साँप से मुझे बेहद डर लगने लगा । सपने में मुझे बड़े-बड़े, काले-काले साँप दिखाई देते, साँप मेरी तरफ आते और मैं दौड़ पाने में अवश होता, इसी कशमकश में साँप के काटने से पहले मेरी नींद खुल जाती । मैं कुछ बड़बड़ा रहा होता या चीख पड़ता, डर के मारे बुरा हाल हो जाता । माँ मुझसे कहतीं कि छाती पर हाथ रखकर सोने से बुरे सपने आते हैं । वे मुझे पुचकारतीं, सहलातीं, थोड़ी देर बाद मैं फिर सो जाता । सुरेश मुझे भूतों के बारे में बताता, कहता भूतों के पाँव उलटे होते हैं, आदमी मरके भूत बन जाता है। रात में मरघट में भूत नाचते हैं । वह न जाने कितने किस्से सुनाता, किस-किस को कहाँ-कहाँ भूत मिला और फिर दोनों में कैसे गुत्थमगुत्था हुई, साथ ही यह भी कि फिर वह आदमी कैसे भूत के चंगुल से छूटा । वह बताता बबूल के पेड़ पर मूतने से जिन्न पैदा हो जाता है लेकिन पीपल के पेड़ पर ब्रह्मदेव रहते हैं इसलिए भूत वहाँ नहीं जाते । एक बार किसी जवान आदमी ने पीपल के पेड़ पर मूत दिया तो वह पागल हो गया । भूत आग और लोहे से डरते हैं इसलिए अपने पास माचिस और चक्कू हमेशा रखना चाहिए। मुझे तो भूत और ब्रम्हदेव में कोई अंतर ही समझ में नहीं आता, मुझे दोनों से डर लगता। पीपल के पेड़ से भी मुझे डर लगता जबकि लोग पीपल के पेड़ की पूजा करते और पेड़ पर कपड़ा बाँध कर लटकाते, सफेद लाल धागा बाँधते, दीपक जला कर रखते, जल चढ़ाते र होली, दीपावली पर अन्न र प्रसाद भी चढ़ाते । ह चढ़ावा भी मेरे य का एक कारण होता पर बबूल से मैं कभी नहीं डरा, हमारे कुएँ के पास बबूल के कई पेड़ थे । बकरियाँ डाल झुका झुका कर मजे से उसकी पत्तियाँ खातीं । उसकी न कोई पूजा करता और न ही मूतने का दुस्साहस करता । हाँ बबूल और नीम की दातौन गाँव के सभी लोग करते थे । बावजूद काँटों के वह साधारण पेड़ अपना सा लगता ।

 

हमारे घर की दहलीज़ में कोने पर एक कोठरी थी जिस में भुस भरा रहता था । अनाज के बोरे भी कभी-कभी इसमें डाल दिए जाते, इसे बखारी कहते थे । बखारी में हमेशा अँधेरा रहता था इसलिए मुझे हमेशा उसमें भूत होने का भय रहता । इसी तरह पुराने मढ़ा के एक ओर कोने में भी एक अँधेरी कोठरी थी जिसमें अक्सर कबाड़ पड़ा रहता था, वहाँ भी मुझे भूत के होने का अंदेशा होता । न जाने क्यों ऐसी अँधेरी कोठरियाँ घर में बनाई जाती थीं जिनमें दिन में भी लालटेन लेकर घुसना पड़ता था । गाँव में डर का भयंकर साम्राज्य था, कभी भूत-प्रेतों का डर, कभी डायनों का डर तो कभी साँप, बिच्छू, भेड़िया जैसे जानवरों का डर और नहीं तो चोर डकैतों का ही डर । कुल मिलाकर 'मौत' एक बहुत बड़ा डर थी वहाँ, पता नहीं कब, कैसे और कहाँ आ जाए । मज़ेदार बात यह थी कि अधिकतर डरावनी चीज़ें अमूर्त या काल्पनिक थीं ।

 

एक दिन मैं पढ़ने से मन चुरा रहा था, माँ बार-बार बारहखड़ी लिखाती, मैं ग़लती कर देता । गुस्से में आकर माँ ने एक जोर से चाँटा जड़ दिया मेरे गाल पर । मैं रोने लगा और खूब रोया, माँ मुझे बहुत ही कम मारतीं थीं । पास में ही बड़ी अइया बैठी थीं, कहाँ तो वे थोड़ी सी डाँट-डपट पर भी मेरी तरफ़दारी करने लगती कहतीं 'जाने दो बहू छोटा है' पर आज न उन्होंने माँ से न कुछ कहा और न ही मुझे चुप कराया । मुझे उन पर बहुत अधिक क्रोध आया, थोड़ी देर बाद मैंने उनसे अपना गुस्सा प्रकट किया 'तुम्हारा सीना नहीं फट गया, तुमने मुझे चुपाया तक नहीं ।' सुनकर वे बहुत हँसी थीं और बहुत दिनों तक सब घरवाले भी मेरी इस बात पर हँसते रहे । दरअसल कई बार मैंने ड़ी अइया के ही मुँह से यह वाक्य सुना था, कभी कहीं दुख की या किसी पर ज़्यादती की बात होती तो वे अक्सर कहतीं 'सुनकर (या देखकर) हमारा तो कलेजा या सीना फट गया।'

 

मिट्ठू और मेवा मिस्त्री थे, अइया उन्हें 'राज' कहती थीं । हमारे घर की सामने वाली दीवाल इन्हीं लोगों ने पक्की की थी । पहले वह मिट्टी की बनी हुई थी, दरअसल पूरा का पूरा घर मिट्टी का ही बना हुआ था, मोटी-मोटी दीवालें और खूब भारी छत । मरम्मत बेगार में हो जाती, गाँव के वे कामगार जो हमारी जमींदारी में थे सारा काम करते रहते थे। धीरे-धीरे हमारे घर की स्थिति के कमज़ोर पड़ने और जमींदारी प्रथा समाप्त होने की घोषणा से, काम के बदले बदले में मज़दूरी देने का चलन चल पड़ा इसलिए गढ़ी की हालत ख़राब होने लगी थी । एक कारण यह भी था कि काफी लंबे समय तक घर की देखभाल आदमियों के अभाव में ही होती रही थी । अब पिता और चाचा दोनों कमाने लगे थे इसलिए घर की मरम्मत नए तौर-तरीकों से करना ज़रूरी हो गया था । मैनपुरी के आसपास इंर्टों के कई भट्टे शुरू हो गए थे, अब पक्की इंर्टों का ज़माना था । पत्थरों का हमारे यहाँ प्रचलन नहीं था क्योंकि पत्थर आगरा, ग्वालियर या धौलपुर में मिलते थे जो गाँव से काफी दूर पड़ते थे ।

 

पूरा घर एक साथ पक्का नहीं किया जा सकता था इसलिए बाहर-बाहर की दीवालें पक्की करने की बात थी जिसकी शुरुआत सामने वाली दीवाल से हुई थी । मिट्ठू की उम्र कोई सत्ताईस अट्ठाईस वर्ष काला रंग, सर पर सफेद गाँधी टोपी, सफेद धोती, गाढ़े का कुर्ता और ऊपर से जाकेट । हल्की देह और औसत क़द, दाहिने कान के ऊपर बीड़ी खोंसे रहता और बहुत आहिस्ता-आहिस्ता बात करता । एक़दम काँग्रेसी नेता लगता था वह, लोग मज़ाक में उससे कहते भी थे नेता पर वह अपने रहन-सहन में एक़दम चौकस रहता । उसके हाथ तथा थैले में राजगिरी के सभी औज़ार रहते - करनी, वसूला, हथौड़ा, गुनिया, साहुल और धागा । उसके पास एक बहुत छोटी करनी थी एक़दम बचकुन्नी, मुझे वह अच्छी लगती, मैं उसे लेने की ज़िद करता । थोड़ी देर तक वह जान बूझ कर ध्यान नहीं देता पर फिर वह दे देता और कुछ देर बाद वापस माँग लेता । मैं दुबारा ज़िद करता, घर का कोई आदमी अगर वहाँ मौजूद होता तो मुझे रोकता अन्यथा मिट्ठू थोड़ा परेशान हो जाता पर किसी तरह बहला-फुसला कर मेरा मन रखता । प्लास्टर करते वक्त मैंने ज़िद करके दहलीज़ वाले बड़े दरवाज़े के दोनों ओर दो बड़े-बड़े आले और उनके ऊपर दो मोर बनवाए जो उसने बड़ी कलाकारी के साथ बनाए थे ।

 

मेवाराम तीस पैंतीस साल का प्रौढ़ था, उसका रंग भी गहरा, क़द मिठ्ठू से दो एक इंच कम और सेहत अच्छी थी। वह धोती के ऊपर कमीज़ पहनता, कुर्ता पहने उसे मैंने नहीं देखा, उसके कान छिदे हुए थे । वह बहुत ही कम बोलता पर जब भी बोलता तो मज़ाक करता था, वह मिट्ठू का असिस्टैंट था, दोनों की जोड़ी मज़ेदार थी । मिट्ठू अक्सर मुझे चिढ़ाया करता, कहता 'तुम्हारा नेकर मैं ले जाऊँगा' कभी कहता ' तुम्हारी कमीज़ दे दो मैं पहनूँगा' । कभी मेरी चप्पलें इंर्टों में या अपने झोले के नीचे छुपा देता, मैं चारों तरफ ढूँढ़ता फिरता और अगर मैं चप्पलों को भूल कर अंदर चला जाता तो वह मुझे आवाज़ देता 'अपनी चप्पलें तो ले जाओ बबुआ' । कब दीवार बन गई कब प्लास्टर हो गया समय पता ही नहीं चला, मेवा मिट्ठू अपना सारा सामान समेट ले गए । कोई हफ़्ते भर बाद वे दोनों फिर दिखाई दिए मगर इस बार उनके हाथों में राजगिरी के औजार नहीं बल्कि कूचियाँ थीं । उन्होंने एक बड़े बर्तन में चूना भिगोया और दूसरे दिन के लिए पुताई का इंतजाम करके चले गए । दूसरे दिन आकर उन्होंने चून