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सातवाँ किश्त
हिंदी लघुकथा का विकास
डॉ. अंजलि
शर्मा
(लघुकथा
हिंदी साहित्य की नवीनतम् विधा है । इसका श्रीगणेश छत्तीसगढ़ के प्रथम
पत्रकार और कथाकार माधव राव सप्रे के 'एक टोकरी
भर मिट्टी से होता है' । हिंदी के अन्य सभी
विधाओं की तुलना में अधिक लघुआकार होने के कारण यह समकालीन पाठकों के
ज्यादा करीब है । और सिर्फ़ इतना ही नहीं यह अपनी विधागत सरोकार की
दृष्टि से भी एक पूर्ण विधा के रूप में हिदीं जगत् में समादृत हो रही
है । इसे स्थापित करने में जितना हाथ लघुकथाकारों का रहा है उतना ही
कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, बलराम, आदि संपादकों का भी रहा है । खास कर
लघुपत्रिकाओं के संपादकों का ।
इंटरनेट पर भी सुकेश साहनी जैसे वरिष्ठ लघुकथाकार इसे विश्वव्यापी
लोकप्रियता के लिए कटिबद्ध हैं ।
हमने
अपने प्रिय पाठकों के लिए पहली बार हिंदी लघुकथा के विकास पर किसी शोध
ग्रंथ को धारावाहिक रूप से छापने का निर्णय लिया है ताकि इस लघु किंतु
गुरुतर विधा से सारी दुनिया के रचनाकार और पाठक भी अवगत हो सकें । हमें
खुशी है रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ के शोध छात्रा और
हिदीं के प्राध्यापक डॉ. अंजलि शर्मा जी की सहमति से संपूर्ण शोध कृति
अंतरजाल पर प्रकाशित हो रहा है, जिस पर उन्हें पी-एच.ड़ी की उपाधि मिल
चुकी है । हिंदी अंतरजाल के इतिहास में शायद पहला अवसर है कि कोई शोध
कृति धारावाहिक प्रकाशित हो रही है ।
अभी तक आप
भाग 1,
भाग 2,
भाग 3,
भाग
4
भाग 5
एवं
भाग 6 पढ़ चुके हैं।
पिछले अंकों से
आगे पढ़िए -
संपादक )
मध्यकाल-
(सन् 1945 से सन् 1800 तक) मध्यकाल का प्रारंभ सन् 1945 से
होता है । यह काल राजस्थानी ब्रज भाषा के साथ-साथ खड़ी बोली
गद्य के विकास का काल है । राजस्थानी भाषा साहित्यिक रूप से
क्रियाशील रही, किंतु बाद में ब्रजभाषा के साथ-साथ अवधि भाषा
में भी साहित्यिक रचना की जाने लगी । राजस्थान में ख्याति वाले
व्यक्तियों की चर्चा बात के माध्यम से या कथाओं के माध्यम से
की जाने लगी । इस ख्यात चर्चा के रूप में, लघुकथा विकसित हुई ।
इनमें धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक रचनाएं लिखी गईं । पौराणिक
कथाओं की सादृश्यता के आधार पर अनेक दंत कथाएं भी प्रचलित हुईं
। इन दंत कथाओं में बौद्ध जातक कथाओं का भी प्रभाव दिखाई देता
है । पशु- पक्षी, पेड़-पौधे, नदी-पहाड़ आदि का चित्रण सजीव रूप
से हुआ है ।
पंचतंत्र और हितोपदेश के बाद जो युग आया उसमें लघुकथा का
विकास अवरुद्ध हो गया, ऐसा स्वाभाविक था क्योंकि 1000 से 1027
के बीच महमूद गज़नवी ने भारत के अनेक भागों में हमले किया और
लूट का माल ले जाता रहा । यही से राजनैतिक उथल-पुथल शुरु हुए
जिसका प्रभाव समाज एवं साहित्य पर भी पड़ा । इसे साहित्य का
शुप्तकाल कहा जाता है ।
सन् 1345 में बाबर द्वारा आक्रमण करने पर मुसलमानी साम्राज्य
की स्थापना हुई । इस काल में गद्य साहित्य की उपेक्षा हुई ।
पद्य साहित्य में भक्ति युग की लहर के साथ-साथ पदों, मुक्तकों,
दोहों तथा खंडकाव्यों में प्रसंगवश लघुकथाएँ प्राप्त होती हैं
। इस काल में कथाओं का विकास दो रुपों में हुआ-
(1) आदर्श एवं कर्तव्य के प्रति न्यौछावर होना ।
(2) प्रेम कथाओं का निर्माण जैसे ढोला-मारु, शीरि-फरहाद,
लैला-मज़नू आदि । हास्य विनोद के साथ-साथ अश्लील प्रेमकथाएं भी
देखने को मिलती है जैसे- छबीली भठियारिन, तोता-मैना, किस्सा
साढ़े तीन यार आदि ।
इस काल में चारणों तथा भाटों द्वारा अपने-अपने राजाओं की
प्रशंसा में अनेक कथाएं लिखी गयई । मुगलकाल में अकबर तथा बीरबल
के मध्य हुई नोंक-झोंक का जो कथारूप मिलता है, वह उस युग की
लघुकथा तो थी ही, बल्कि उसी में आज की लघुकथा के अंकुर भी
निहित थे । अकबर-बीरबल के नोंक-झोंक में जो व्यंग्य का पुट है,
वही आज की लघुकथा का मूलस्वर है । इसी प्रकार चौरासी वैष्णवों
की वार्ता, गोरा बादल की कथा के रूप में अनेक लघुकथाओं का
निर्माण हुआ । ये लघुकथाएँ राजाओं सामंतों और ऐश्वर्यवान लोगों
के मनोरंजन के रूप में पनपी । इस प्रकार कहा जा सकता है कि लोग
साहित्य के रूप में लघुकथाएँ प्रत्येक युग में रही ।
(ब) नवीन रूप- (सन् 1800 से आज तक) लघुकथाओं का नवीन
रूप सन् 1800 से विकसित हुआ । ऐतिहासिक कालक्रम एवं अध्ययन की
दृष्टि से लघुकथाओं को निम्न श्रेणियों में विभाजित किया जा
सकता है-
(1) प्रारंभिक लघुकथाएँ-(सन् 1800 से 1900 तक) नवीन रूप में
प्रारंभिक लघुकथाओं का काल सन् 1800 से 1900 तक माना जाता है ।
सन् 1800 में अँगरेज़ों द्वारा फ़ोर्ट विलियम की स्थापना के
साथ-साथ हिंदी के अध्ययन-अध्यापन से प्रेरित होकर अनेक लेखकों
द्वारा छोटी बड़ी कथाएं लिखी गई।
हिंदी में सबसे पहले मुद्रित ग्रंथों में मर्सिया, सिंहासन
बत्तीसी व माधोनल को माना जाता है, ये सभी 1802 में प्रकाशित
हुई । इनमें लघुकथा के दृष्टिकोण से सिंहासन बत्तीसी को ही
लिया जा सकता है।
सन् 1803 में जे.बी. गिलक्राइस्ट द्वारा प्रमाणित हिंदी स्टोरी
टेलर नामक पुस्तक प्रकाशित हुई । इस पुस्तक को हिंदी लघुकथा का
आदि ग्रंथ माना जा सकता है। इसमें 108 लघुकथाएँ हैं।
सन् 1809 में संस्कृत में वेताल पंचविंशतिका का मुद्रण हुआ।
कवीश्वर द्वारा ब्रजभाषा में वेताल पच्चीसी के नाम से अनुवाद
किया गया । उसके बाद तारणि चरण मित्र द्वारा अनुदित किया गया।
इसमें लगभग पच्चीस छोटी बड़ी कथाएं हैं।
सन् 1810 में ब्रजभाषा में लगभग सौ रोचक लघुकथाएँ
‘न्यू
एनसाइक्लोपीडिया इंदुस्वातिका एटसेट्रा’
में लताइफ ए हिंदी नाम से संग्रहित हैं। इसी समय प्रेमसागर और
सदल मिश्र कृत नासितोपाख्यान प्रकाश में आयी तथा इंशा अल्ला
खां कृत रानी केतकी की कहानी प्रकाश में आयी । इस प्रकार गद्य
साहित्य के कथालाप के प्रति लोगों का रूझान पढ़ा।
सन् 1820 में जे.बी. गिलफ्राइस्ट द्वारा एक सौ लघुकथाओं का
संकलन आरथीपीग्रैफिकल अल्टीमेटम और द हिन्दुस्तानी स्टोरी
ट्रेलर (दूसरा संस्करण) प्रकाशित किया गया । सन् 1832 में
हिन्दवी कथाएं प्रकाशित हुई । जिसकी लघुकथाएँ नीतिपरक थी । सन्
1846 में बालगंगाधर शास्त्री द्वारा नीति परक कथाओं का संग्रह
‘सदुपदेश
की कथाएं का प्रकाशन हुआ । इसमें लगभग 414 लघुकथाएँ संग्रहित
की गई थी । सन् 1845 में लखनऊ में
‘नकलिया
ए हिन्दी’
हिन्दी लघुकथाओं की प्रमाणिक पुस्तक प्रकाशित हुई । परंतु
इनमें से कोई भी रचना मूल हिन्दी की नहीं है, सभी किसी न किसी
भाषा से हिन्दी में अनुदित है।’
सन् 1870 में वैष्णों की वार्ता का प्रकाशन हुआ । सन् 1851 में
हितोपदेश का हिन्दी अनुवाद पं. बद्रीलाल द्वारा किया गया । सन्
1864 में पन्नन की बात नामक पुस्तक छपी इसमें 141 लघुकथाएँ
संग्रहित हैं ।
सन् 1826 में उदन्त मार्तण्ड, 1844 में बनारस अखबार, कवि वचन
सुधा, हिन्दुस्तान प्रदीप, जगत समाचार हरिशचंद्र आदि पत्र
पत्रिकाओं ने लघुकथा को स्थान देकर लघुकथा के सोपान को आगे
बढ़ाया।
पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के संपर्क में अनेक आधुनिक पत्र
पत्रिकाओं का जन्म हुआ । इसमें आरंभिक गल्प और लघुकथाओं का
विशेष महत्व है । इस प्रकार हम कह सकते हैं, विभिन्न पत्र
पत्रिकाओं व संकलित पुस्तकों के माध्यम से लघुकथा का अंकुरण
प्रारंभिक रूप में हुआ ।
(2) विकासोन्मुख लघुकथाएँ-
(सन् 1900से 1950 तक) 1857 की क्रांति की असफलता ने भारतीय
राजनीति और समाज को झकझोर दिया था । इस क्रांति का भारतीय जनता
के मनोमष्तिस्क पर प्रभाव पड़ा । क्रांति की असफलता के बाद
पत्रकारिता ने करवट बदली परिणामस्वरूप कवि वचन सुधा, ब्राह्मण,
हिन्दुस्तान प्रदीप, जगत समाचार, हरिश्चंद्र आदि पत्रिकाओं में
अँगरेज़ों की ग़लत नीतियों का विरोध किया गया । सन् 1900 से
1950 तक का समय हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं का विकास काल है
। सन् 1900 में हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा सरस्वती का
प्रकाशन एवं संपादन महत्वपूर्ण घटना है ।
सन् 1900 से 1930 तक चाँद, मतवाला, मौजी, जागरण, गोलमाल,
बंगवासी, भारत मित्र, माधुरी, प्रभा, सत्यभामा हंस, इंदु,
मनोरमा आदि पत्र पत्रिकाओं की धूम थी । इन पत्र-पत्रिकाओं का
प्रमुख उद्देश्य देश की आज़ादी के लिए लेख लिखना एवं हिन्दी
का विधाओं को समृद्ध करना रहा । इन पत्रिकाओं ने लघुकथा की ओर
ध्यान नहीं दिया । इसका एक कारण और भी हो सकता है । देवकी नंदन
खत्री द्वारा चंद्रकांता सन्तनि एवं भूतनाथ जैसे लंबी
रोमांचकारी उपन्यासों की रचना की गई । कुछ समय तक लघुकथा
साहित्य में धुंधलापन इसलिए भी आया क्योंकि प्रेस ने लेखकों
को इस बात की पूरी छूट दी कि लंबे उपन्यास, निबंध एवं रोचक
कहानियाँ लिखें । लघुकथा
का मूल्य प्रेमचंद के काल से आगे पढ़ा । भारतीय साहित्य
रत्नमाला के पृ. क्रं, 186 में यह उल्लेख मिलता है -
‘प्रेमचंद
ने जब वह उर्दू में लिखते थे, लघुकथा के महत्व को समझ लिया था
। कथा साहित्य में कहानी का परंपरागत रूप विधान पहले ही दूर हो
चुका था । उसकी जगह छोटी कहानी अर्थात् लघुकथा ने ले ली।’
इस काल में अँग्रेज़ी तथा संस्कृत के अनेक अनुवाद लघुकथाओं के
रूप में प्रकाशित हुए ।
‘जम्बु
की न्याय’
सन् 1906 में तथा विद्यानाथ शर्मा का विद्या विहार 1909 में
प्रकाशित हुई इसमें लघुकथा के बीज दिखाई देते हैं ।
श्री माखनलाल चतुर्वेदी हिन्दी लघुकथा के जनक माने जा सकते हैं
। डॉ. प्रभाकर मिश्र के मतानुसार
‘जब
मैंने माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्य का अध्ययन किया तो पाया
कि उनके लेखन की शुरुआत लघुकथाओं से हुई थी, और पहली रचना थी
‘बिल्ली
और बुखार’
यह रचना सभी गुणों से युक्त है, इसलिए बिल्ली और बुखार को मैं
हिन्दी की पहली लघुकथा मानता हूँ ।’
मैंने पुष्करणा जी के आलेख
‘हिन्दी
की पहली लघुकथा और हिन्दी का पहली लघुकथा लेखक’
पढ़ी उनके मतानुसार ‘बलराम
द्वारा पूछे गये पहली लघुकथा प्रश्न के उत्तर में मैंने उसे
बिल्ली और बुखार की जानकारी दी थी और कहा था कि कानपुर में
प्रभा के अंकों को ढूँढकर कन्फ़र्म कर लेना । किंतु पटना लौटकर
हिन्दी की पहली लघुकथा की सच्चाई जानने हेतु मैंने और निशान्त
ने मिलकर माखनलाल चतुर्वेदी की पूरी रचनावली खंगाल डाली । मगर
‘बिल्ली
और बुखार’
नामक लघुकथा तो क्या इस शीर्षक से उनकी कोई भी रचना हमें दिखाई
नहीं दी ।’
पुष्करणा जी ने अनुशीलन के पश्चात मेरे में खलबली मची थी आख़िर
‘बिल्ली
और बुखार’
रचना गई कहाँ ?
चतुर्वेदी जी ने अपनी लघुकथा में किन भावनाओं की अभिव्यक्ति दी
है । आख़िर एए दिन आमंत्रण(साप्ताहिक, रायपुर) पढ़ते-पढ़ते
मुझे ‘बिल्ली
और बुखार’
लघुकथा मिल ही गई ।
सन् 1897 में माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा लिखित
‘बिल्ली
और बुखार’
हिन्दी की पहली लघुकथा है जो लघुकथा की कसौटी पर खरी उतरती है-
उदा. दृष्टव्य है- ‘कस्तूरबा
बाई मुझसे लगभग छह वर्ष छोटी है। यद्यपि वह माँ की चौथी संतान
थी । लेकिन यों हम घर में पीठ पाँव कहलाते थे । कस्तूरबा
छोटेपन से ही मेरी छोटी-मोटी बातों की शिकायत माँ और पिताजी से
कर देती थी परिणामस्वरूप मैं घर में झाडे़ खाता गालियाँ खाता
और कभी-कभी पीटा भी जाता ।’
एक बार की बात है मेरी यही बहन कस्तूरबा बाई डेढ़ दो साल की
होगी और मैं आठ वर्ष का । माँ मुझे से कह गई कि मैं नदी पर जा
रही हूँ । लड़की को बुखार है । तेरे पिताजी स्कूल गयी हैं, तू
खटिया पर ही बैठे रहना कहीं जाना मत ।
मेरे लिये तो यही सज़ा थी, आख़िर मैं खटिया पर बैछा रहा ।
खटिया के नीचे से निकली एक बिल्ली, मैंने उसकी दुम पकड़ ली और
बहन के ऊपर लटका दिया । बहन बहुत रोयी-चिल्लायी, उस बिल्ली को
अपने ऊपर लटके देखकर पर वहाँ उसका रक्षक कौन था ।
माँ जब आयी तो बहन ने अपनी तोतली बोली में मेरी सारी
कारगुजारी कह सुनायी । उन्होंने कहा इसको तो बुखार है ही नहीं
।
बात यह थी कि बिल्ली के भय से बहन को खूब पसीना आया था, और
उसका बुखार उतर गया था।
सन् 1901 में माधवराव सप्रे की
‘एक
टोकरी भर मिट्टी’
बिलासपुर से छत्तीसगढ़ मित्र पत्रिका में प्रकाशित हुई थी, जो
बाद में सारिका में प्रकाशित हुई । हरिप्रकाश मंत्रालय बनारस
में भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुस्तक परिहासिनी बनारस से
प्रकाशित हुई थी । इसमें ज्ञानचरण
‘मिहमान
दुआ माँगना’
आदि लघुकथाएँ मिलती है । यदि आकारगत दृष्टि से देख तो सन् 1915
में सरस्वती में प्रकाशित
‘बिमाता’
लगभग 700 शब्दों में, सन् 1916 में पदुमलाल पन्नालाल बख्शी
की ‘झलमला’
लगभग 600 शब्दों में प्रकाशित हुई । सन् 1924 में शिवप्रसाद
सहाय की ‘एक
अद्भुत कवि’
लगभग 400 शब्दों में मारवाड़ी मासिक, कलकत्ता से प्रकाशित हुई
। सन् 1933 में एक लघुकथा कुछ आप बीती कुछ जग बीती भारतेन्दु
जी की कवि वचन सुधा में लगभग 400 शब्दों की प्रकाशित हुई ।
जगदीश चंद्र मिश्र की
‘बुढ़ा
व्यापारी’
माखनलाल चतुर्वेदी की लघुकथा
के बाद प्राप्त होने वाली पहली प्रमाणिक लघुकथा कही जा सकती
है । ‘बुढ़ा
व्यापारी’
के पश्चात मिश्र जी के चार पाँच लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुए
लेकिन उनकी लघुकथाओं में शरीर तो है, परंतु प्राणतत्व का अभाव
है । सन् 1929 में कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर की पहली लघुकथा
‘सेठजी’
प्राप्त होती है । इनकी लघुकथा जानदार होने के साथ-साथ
प्रभावशाली भी है । उनकी लघुकथा संग्रह
‘आकाश
के तारे, धरती के फूल’
काफ़ी चर्चित है ।
प्रभाकर जी के बाद हिन्दी लघुकथा को आनंद मोहन अवस्थी और
हरिशंकर परसाई जैसे दो प्रतिभाएं मिले लेकिन इसे लघुकथा की
क्षति कही जायेगी । आनंद मोहन अवस्थी चल बसे, परसाई जी व्यंग्य
के क्षेत्र में रम गए । सन् 1940 के आसपास श्री रामप्रसाद रावी
ने ‘मेरे
कथा गुरु का कहना है’
शीर्षक से लघुकथा संकलन लिखकर हिन्दी लघुकथा को नई भावभूमि
प्रदान की । सन् 1950 में आनंद मोहन अवस्थी का लघुकथा संग्रह
‘बंधनों
की प्यास’
प्रकाशित हुई । अवस्थी जी की प्रथम लघुकथा
‘शीशम
का खूँटा’
है । अयोध्या प्रसाद गोयलीय की
‘गहरे
पानी पैठ’
लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुआ ।
पांचवे दशक में लघुकथा के स्वरूप निर्धारित करने वाली
महत्वपूर्ण रचनाएं प्रकाशित हुई । इंदौर से प्रकाशित मासिक
पत्रिका ‘वीणा’
सन् 1942 से लघुकथा प्रकाशित कर रही है । पंडित रामनारायण
उपाध्याय तथा अन्य लेखकों की लघुकथाएँ
‘वीणा’
में प्रकाशित हुईं । नवम्बर 1944 में रामनारायण उपाध्याय की
‘आरा
और सीमेंट’,
‘मज़दूर
और थकान’
प्रकाशित हुई । सन् 1945 में श्याम सुंदरदास की
‘ध्वनि
प्रतिध्वनि’
लघुकथा प्रकाशित हुई । सन 1945 में सुदर्शन की
‘झरोखे’
नामक लघुकथा प्रकाशित हुई । सन् 1950 में कन्हैयालाल मिश्र
प्रभाकर की ‘आकाश
के तारे’,
अवधेश कुमार शुक्ल की
‘ज्योत्सना’,
बैकुंठनाथ मल्होत्रा की
‘ऊँचे
और ऊँचे’,
निराला की ‘सखी’,
गुलजार की ‘चौरस
रात’,
ज्योति प्रकाश की ‘दिल
की गहराई’,
के कामता प्रसाद सिंह की
‘नाविक
के तीर’,
श्याम नंदन शास्त्री की
‘पाषाण
की पंछी’
लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुई ।
सन् 1900 से 1950 तक लघुकथा ने कथा विधा के रूप में अपने को
प्रतिष्ठित कर लिया था तथा हिन्दी के अग्रज लेखकों ने लघुकथा
लिखकर लघुकथा की महत्ता स्थापित कर दिया ।
(क्रमशः अगले अंकों मे)
डॉ. अंजलि शर्मा
सहायकशासकीय
स्नातकोत्तर कला एवं वाणिज्य महा.
जरहाभाटा,
बिलासपुर, छत्तीसगढ
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