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स्मृतियों
के गलियारों से...
नरेन्द्र कोहली
मुझे
बताया गया है कि मेरा जन्म 6
जनवरी
1940 ई. को स्यालकोट में प्रात: साढ़े नौ बजे हुआ था। जिस घर
में मेरा जन्म हुआ था,
वह मेरे दादा का
था। दादा पंजाब के वन-विभाग में हेड-क्लर्क के पद से रिटायर
हुए थे। उनकी आर्थिक स्थति बुरी नहीं थी। होश संभालने पर जो
तथ्य मुझे मालूम हुए थे,
उनके आधार पर
ज्ञात हुआ कि पैतृक मकान का उनका हिस्सा उनके बड़े भाई ने हड़प
लिया था। उस हिस्से को लेकर दोनों भाइयों में जो झगड़ा हुआ था,
वह उनके
जीवन के अंत तक चला। मेरे दादा के देहांत पर भी उनके बड़े भाई
नहीं आए थे।
पर मेरे दादा ने
अपनी वैध-अवैध कमाई के आधार पर दो मकान स्वयं बनवाए थे। एक
मकान 'ट्रंकां वाले बाजार'
के 'मुहल्ला
डिप्टी का बाग'
में था - जो
पुराने किस्म का मकान था; और किराए पर चढ़ा हुआ था। दूसरा मकान
'मुहल्ला वाटर वर्क्स'
में 'एबट रोड' पर
था। यह नए क्षेत्र में खुला हवादार मकान था। इसमें मेरे दादा
स्वयं रहते थे। दादा की दो पत्नियां थीं। उनके जीवन की कुछ
घटनाओं का उपयोग मैंने अपने उपन्यास 'पुनरारंभ' में किया है।
मेरे दादा - हरकिशनदास - की पहली पत्नी, मेरी सगी दादी -
भाइयां देई (देवी) - थीं, जो अपने पति से अलग होकर,
चाचाजी के
पास जमशेदपुर में रहती थीं। दादा अपनी दूसरी पत्नी के साथ अपने
इस नए मकान में स्यालकोट में रहते थे। दादा उर्दू और अंग्रेजी
जानते थे। शायद मैट्रिक पास थे। दादियां दोनों ही निरक्षर थीं।
हमारा परिवार
मध्यम वर्गीय नौकरी पेशा परिवार था। मेरे पिता, परमानंद कोहली
का जन्म 1903 ई. में हुआ था। उनकी आंखों में बचपन से कुकरे
थे। आंखों के रोग के कारण वे आठवीं कक्षा में ही स्कूल से उठा
लिए गए। पढ़ने-लिखने का शौक होते हुए भी,
वे आगे पढ़
नहीं सके। दादा ने उन्हें स्यालकोट में पुस्तकों और पत्रिकाओं
की एक दुकान खोल दी थी;
किंतु वे
दुकानदार नहीं,
साहित्यकार बनना
चाहते थे। साहित्य बेचना नहीं रचना चाहते थे। उन्होंने दो-एक
कहानियां भी लिखी थीं,
जो किसी दैनिक
समाचारपत्र में प्रकाशित हुई थीं।
उर्दू में
लिखे अपने तीन-चार उपन्यासों की पांडुलिपियां, वे अपने इस लेखक
पुत्र के लिए उत्तराधिकार स्वरूप छोड़ गए।
वे न साहित्यकार
बन सके, न दुकानदार। अंग्रेजों के विरुद्ध किए गए किसी
प्रदर्शन में पुलिस द्वारा पकड़े गए। दादा जमानत पर न केवल
उन्हें छुड़ा लाए,
वरन् अपने
अंग्रेज अधिकारी से कहकर उन्हें अपने ही विभाग में अस्थायी
क्लर्क की नौकरी भी दिलवा दी। समुचित रूप से शिक्षित न होने और
अपने दृष्टिदोष के कारण,
उनकी नौकरी न कभी
पक्की हो सकी,
न उनकी पदोन्नति
हुई;
दूसरी ओर अपने
परिश्रम और अंग्रेज अधिकारी की कृपा के कारण वे नौकरी से
निकाले भी नहीं जा सके। जहां थे,
त्रिशंकु
के समान वहीं टंगे रहे। 1946 ई. तक अविभाजित पंजाब के वन विभाग
में अस्थाई क्लर्क के पद पर काम करते रहे। देश के विभाजन के
पश्चात् पूंजी,
डिग्री तथा अन्य
किसी कौशल के अभाव के कारण जमशेदपुर में पटरी पर बैठ कर फल
बेचने को बाध्य हुए। बाद में एक छोटी सी दुकान की। 1985 ई. में
बयासी वर्ष की अवस्था में उनका देहांत हुआ।
मेरी
मां - विद्यावती - रेलवे स्टेशन 'संबड़ेवाल' के पास के एक
गांव 'कौलोकी'
के एक कृषक
परिवार से थीं। 'कौलोकी'
में न स्कूल था,
न डाकघर,
न
अस्पताल,
न ही कुछ और।
लड़कियों की शिक्षा की व्यवस्था एवं परंपरा न होने के कारण वे
निरक्षर ही रहीं। 1992 ई. में दिल्ली में अनुमानत: अस्सी -
बयासी वर्ष की अवस्था में उनका देहांत हुआ।
मेरा शैशव कभी
भी नटखट और खिलंडरे बच्चों का शैशव नहीं रहा। आरंभ में मैं
काफी बीमार और रोना बच्चा रहा होऊंगा। शरीर पर फोड़े-फुंसियां
भी बहुत थीं। अधिकांशत: मां से ही चिपका रहता था। शक्ति की कमी
रही होगी,
पर ऊर्जा की कमी
नहीं थी;
क्योंकि मैं अपने
ढंग से सदा ही अधिक काम करने वाला प्रसिद्ध रहा हूं। या शायद,
ऊर्जा
अधिक नहीं थी,
पर जो थी,
उसे मैंने
बिखरने नहीं दिया।
मुझे अपना जीवन
लाहौर से याद आता है। दिल्ली के पुराने शाहदरा जैसे किसी
मुहल्ले में 'भगदां दा चौक'
के पास हरनामसिंह
के मकान में हम किराएदार थे। एक कमरा और रसोई नीचे की मंजिल पर
थे और एक कमरा और शौचालय पहली मंजिल पर था। जब किराया बढ़ाने की
बात हुई और पिताजी अधिक किराया नहीं दे पाए तो उन्होंने नीचे
के तल का कमरा छोड़ दिया। बाद में शायद रसोई भी छोड़ दी थी। ठीक
याद नहीं है मुझे। इतना ही याद है कि पहली मंजिल के एक कमरे
में हम रहते थे। गर्मियों के दिनों में कमरा तपता था।
जैसे-जैसे धूप चढ़ती थी,
चारपाई छाया की
ओर खिसकती जाती थी।
गली में नालियों
की उचित व्यवस्था नहीं थी। घर के बाहर गंदा पानी जमा करने के
लिए एक गढ्डा था,
जिसे हौदी कहते
थे। पानी इतना ही बहना चाहिए था,
जितना उस
हौदी में समा सके। पानी अधिक हो जाता तो गली में बह जाता और
वहां कीचड़ हो जाता। इसलिए मकान-मालिक की ओर से मां और पिताजी
को निर्देश था कि वे पानी अधिक न बहाएं। मां और पिताजी कम से
कम पानी में नहाते थे। मुझे और मुझसे बड़े भाई भूषण को अपनी एक
भूआ के घर नहाने जाना पड़ता था - जहां गली में नालियों का
प्रबंध था।
मेरे सबसे बड़े
भाई सोमदेव को हमारी सौतेली दादी ने गोद ले रखा था - उन्हें हम
आज भी उसी रिश्ते से चाचाजी पुकारते हैं। वे दादा-दादी के पास
स्यालकोट में ही रहते थे। जाने किन कारणों से मेरे दूसरे भाई
सुदर्शन और मेरी एकमात्र बहन विमला भी दादा-दादी के पास ही
रहते थे। लाहौर में अपनी मां और पिताजी के साथ मैं,
मुझसे बड़ा
भाई भूषण और हमारा सबसे छोटा भाई रवीन्द्र थे।
पांच-छह वर्ष की
अवस्था के मध्य कभी मेरा नाम देवसमाज हाई स्कूल, लाहौर में
लिखा दिया गया। उस समय बच्चे बाजे-गाजे के साथ स्कूल भेजे जाते
थे; पर हम उतने समर्थ नहीं थे। पिताजी मुझे अपने साथ ले गए थे।
रास्ते में चौक की एक दुकान से सवा रुपए के लड्डू खरीद लिए थे।
लड्डू मास्टर रूड़सिंह के हवाले कर, मुझे कक्षा में बैठा दिया
गया था। उस समय लाहौर में शिक्षा का माध्यम उर्दू ही था। मुझे
बड़ा आश्चर्य होता था कि बाहर लोग पंजाबी बोलते हैं; और कक्षा
में घुसते ही उर्दू पर क्यों उतर आते हैं।
सन् छियालीस के
आसपास ही पिताजी की आंखों की दशा शायद कुछ अधिक बिगड़ गई थी।
डॉक्टरी जांच में वे सरकारी दफतर में कार्य करने के सर्वथा
अयोग्य पाए गए थे। अत: उन्हें प्राय: पच्चीस वर्ष की अस्थाई
नौकरी के पश्चात् सेवानिवृत्त कर दिया गया। और कोई चारा न
होने के कारण हम लोग स्यालकोट आ गए। अब तक हमारे दादा का
देहांत हो चुका था। पुराना मकान पिताजी और चाचाजी की संयुक्त
संपत्ति था; और नया मकान हमारे दादा,
अपनी छोटी
पत्नी के नाम कर गए थे। पुराने मकान में नीचे की मंजिल अंधेरी
और सीलन भरी थी। वहां कोई रहता नहीं था। पहली और दूसरी मंजिल
में किराएदार थे। दूसरी मंजिल पर पिताजी ने अपने लिए एक कमरा
और रसोई किसी प्रकार खाली करा लिए थे। हम लोग आ कर वहीं टिके।
नीचे की मंजिल का आगे का कमरा कुछ हवादार था। मां के रहे-सहे
गहनों को बेच कर, पिता जी ने उसी कमरे में,
खेलों में
काम आने वाले सामान की दुकान खोल ली थी। स्यालकोट नगर खेल के
सामान के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था ही।
मुझे मुख्य शहर
से दूर,
जेल की दीवार से
लगते हुए गंडासिंह हाई स्कूल में दाखिला दिलाया गया। मेरे सारे
बड़े भाई भी इसी स्कूल में थे।
तभी देश का
बंटवारा हुआ। एबट रोड पर दंगाइयों का आक्रमण हुआ तो हमारी
सौतेली दादी, हमारे बड़े भाई-बहनों के साथ कैंप चली गई। वहां से
वे लोग भारत आए और चाचाजी के पास जमशेदपुर पहुंच गए। हमारी सगी
दादी, दादा के देहांत पर स्यालकोट आई थीं और तब से हमारे ही
साथ थीं। हम लोग भी कैंप में आए। वहां से गाड़ी में 'डेरा बाबा
नानक'
के पास रावी के
पुल के पाकिस्तानी क्षेत्र में उतार दिए गए।
हम पैदल पुल की
चढ़ाई चढ़ रहे थे। पुल का निचला तल पाकिस्तान का था। उसकी
रक्षा के लिए एक बलोच सिपाही, संगीन वाली बंदूक लिए खड़ा हमें
घूर रहा था... और मेरे प्राण सूखे जा रहे थे।...
दादी को चार-पांच
फीट से अधिक साफ-साफ दिखाई नहीं देता था। वे उस बलोच के
अस्तित्व से सर्वथा अनजान, अपने कष्ट के कारण झल्ला रही
थीं, ''इन मोए मुसलमानों ने हमें हमारे घर से ही निकाल दिया
...''
बलोच ने सुन लिया
था। चुप वह भी नहीं रहा, ''हमने निकाला या आप स्वयं घर छोड़
आईं।''
मेरा गला सूखा जा
रहा था । जाने कब वह बलोच अपनी बंदूक हमारी ओर तान दे और ...
दादी ने उसकी बात
सुन ली। अपनी धुंधली आंखें उसकी ओर उठा कर बोलीं, ''मुझे क्या
पता था कि तू खस्मां नूं खाना यहां भी खड़ा है।''
मैं शक्ति भर
दादी को घसीट रहा था। कब हम पुल चढ़ जाएं और भारत की सीमा में
पहुंच जाएं।
दादी और उस बलोच
में और संवाद नहीं हुआ। हम भारत के क्षेत्र में आ गए। भरतीय
सैनिकों ने अपनी भुजाएं बढ़ा कर हमें थामा और पुल के ऊपर खींच
लिया। सैनिक ट्रकों में बैठा कर वे हमें किसी अस्थायी डेरे पर
ले आए।
डेरा बाबा नानक
में एक महीने के लगभग रुके रहकर,
कुछ दिन
अमृतसर के गीता भवन में और कुछ, रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म
पर काट कर, दिल्ली होते हुए हम लोग जमशेदपुर पहुंचे थे।
चाचाजी टाटा आयरन
एंड स्टील कंपनी के 'नगर प्रशासन'
में
सैनिटरी इंजीनियर थे। उनके पास तीन कमरों का क्वार्टर था। उनके
तब तक आठ बच्चे थे। घर में एक नौकर और एक आया भी थी। अब दस
व्यक्ति और आ गए थे। घर छोटा पड़ने लगा। फिर उनके परिवार का वह
घर था और हम उनके घर आ गए थे। परिस्थितियां वैसी ही बन गईं,
जैसी कि
हो सकती थीं।
पिताजी ने कदमा
बाजार में पटरी पर फलों की दुकान लगानी शुरु की। मेरे सबसे बड़े
भाई, सोमदेव पहले बसों के चेकर हुए, फिर टिस्को में ट्रेसर हो
गए। सुदर्शन दिन में पिताजी के साथ दुकान लगाते और रात को नाइट
स्कूल में पढ़ते। मां घर का काम करतीं। बहन जी,
भूषण,
मैं और
रवींद्र स्कूलों में भेज दिए गए। जिस दिन हम जमशेदपुर पहुंचे,
बहन जी ने
मुझे नहलाते हुए बताया कि यहां के लोग पंजाबी नहीं बोलते। वहां
वही भाषा बोलते हैं,
जो स्कूलों में
पढ़ाई जाती है। वे स्कूल में हिंदी पढ़ती थीं और मैं उर्दू।
घर (12,
स्टाकिंग
रोड) के पास उर्दू माध्यम का एक स्कूल था 'धतकिडीह लोअर
प्राइमरी गर्ल्स स्कूल'। स्कूल लड़कियों का था,
पर शायद
लड़कियों की संख्या बहुत कम थी,
इसलिए लड़के भी ले
लिए जाते थे। मेरे पास स्यालकोट के किसी स्कूल का 'स्कूल
लीविंग सर्टिफिकेट'
नहीं था,
इसलिए
मेरी दूसरी कक्षा की परीक्षा ली गई। मेरे साथ कुछ लड़के और भी
थे। हम सब-के-सब उस परीक्षा में सामूहिक रूप से फेल हो गए।
किंतु मेरे अंक फेल लड़कों में सबसे अधिक थे। अत: मुझे तीसरी
कक्षा में ले लिया गया।
कक्षा में पहुंचा
था कि दो अध्यापिकाएं मुझे बाहर मैदान में ले आईं। मैदान में
एकांत था। ''क्या नाम है तुम्हारा
?''
उन्होंने पूछा।
''नरिन्दर
कुमार।''
''तुम हिंदू हो
?''
''जी।''
''तो फिर उर्दू
क्यों पढ़ते हो
?''
''हम तो उर्दू ही
पढ़ते हैं।''
मेरा उत्तर था।
मैं क्या जानता था कि मैं उस भाषा में शिक्षा पा रहा था, जो
हमारी अपनी नहीं थी।
मेरी उन
अध्यापिकाओं के जीवन में पहली बार एक हिंदू लड़का उर्दू की
कक्षा में आया था; और मैं इस विषय में पूर्णत: अबोध था।
तीसरी कक्षा की
परीक्षा में मेरा द्वितीय स्थान था। प्रथम स्थान नज्जू का था।
वह हमारी क्लास टीचर के पति से घर पर ट्यूशन पढ़ता था। ऐसे में
कक्षा में प्रथम आने का उसका नैसर्गिक अधिकार बनता था। चौथी
कक्षा में स्कूल बदल गया था। वहां फातिमा बेगम हमारी क्लास
टीचर नहीं थीं। परिणाम यह हुआ कि नज्जू मुझसे अधिक अंक कभी
नहीं ला सका।
चौथी कक्षा में
मैं न्यू मिडिल इंग्लिश स्कूल में आ गया था। तब हम उसे न्यू
एम. ई. स्कूल कहा करते थे। कक्षा में प्रथम आया था। कक्षा का
मॉनीटर भी बना। सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि शनिवार के पहले
पीरियड में होने वाले वाद-विवाद में मेरी धाक जम गई थी। छठी
कक्षा में 'एजुकेशन वीक'
के अवसर पर मैं
मिडिल स्कूलों की उर्दू वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम रहा
था। उसमें मुझे एक मेडल मिला था,
जिसे मैं
बहुत दिनों तक अपनी कमीज पर टांगा करता था। विषय-वस्तु मुझे
पिताजी ने लिख दी थी। उसे मैंने रट लिया था। अनेक बार अनेक
लोगों के सामने उस भाषण को मैंने दोहराया था।
उस घटना की चर्चा
मैंने अपनी एक कहानी 'छवि' में की है : कहानी में रोहित मेरे
बड़े भाई हैं और संदीप मैं स्वयं हूं...
* * *
संदीप आरंभ से ही
परिवार में कुछ भिन्न सा व्यक्ति माना जाता था। स्कूल में था।
छोटा सा बच्चा था। रोहित उस समय स्वयं बीस-बाईस वर्ष के रहे
होंगे। संदीप उनसे दस वर्ष छोटा था। वे नौकरी में लग चुके थे।
वयस्क फिल्में देखने का साहस कर चुके थे। छुप कर सिग्रेट भी
पीने लगे थे। पार्टी के नाम पर दो-चार बार विह्स्की भी चख चुके
थे। बहुत रगड़ कर क्षौर करते थे। सिर के गीले बालों पर कपड़े की
पट्टी बांध कर,
अपने केशों को एक
विशेष ढंग से संवारने का प्रयत्न करते थे। उनकी आंखें युवतियों
पर टिकती थीं और वे जानते थे कि लड़कियां भी उनकी ओर देखने लगी
थीं।... ऐसे में बारह वर्षों के उस ढीली-ढाली निकर या बेतुका
पाजामा पहनने वाले...,
बिखरे बालों के
साथ,
धूल-धक्कड़ में
कंचे खेलने वाले,
उस अनाकर्षक और
प्रभावशून्य लड़के का उनके जीवन में क्या महत्व हो सकता था। वह
न तो उनसे आंखें मिला सकता था,
न उनसे ढंग से
बात ही कर सकता था। किसी विषय पर कोई गंभीर चर्चा करने की तो
कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।... वे उन दिनों भी अपने पैसों
से दि अमरीकन मैगजिन,
दि लाईफ,
रीडर्स
डायजेस्ट और दि इलेस्ट्रेटेड वीकली खरीद कर लाते और पढ़ते थे।
दिनशॉ मेमोरियल लाइब्रेरी के सदस्य थे। वहां से अंग्रेजी के
उपन्यास लाते थे और खाना खाते हुए भी एक हाथ में पुस्तक रखते
थे। कुछ इस कारण से कि पढ़ने के लिए अधिक समय नहीं मिलता था और
कुछ इस कारण से कि इन लोगों से विशेष बात न करनी पड़े।... यह
संदीप तब उर्दू के मिडिल स्कूल में पढ़ता था। अंग्रेजी का
अक्षर-ज्ञान उसे हो गया था; और अक्षरों को जोड़-जोड़ कर छोटे
छोटे और सरल शब्दों को सीखने का प्रयत्न कर रहा था। प्राय:
उर्दू की जासूसी पुस्तकें पढ़ता था। 'जासूसी दुनिया' , 'जासूस
महल', उर्दू में सेक्स्टन ब्लैक और राबर्ट ब्लैक के उपन्यास।
कभी-कभी साहस कर उनसे अंग्रेजी के किसी साधारण से शब्द का अर्थ
पूछ लेता था। वे अर्थ बता देते थे और कभी उसे साइकिल साफ करने,
कभी मोची
से जूतों की मुरम्मत करा लाने, या ऐसे ही किसी साधारण काम में
लगा देते थे।... एक-आध बार उसके अंग्रेजी के तुच्छ ज्ञान पर
तरस खा कर कह दिया था कि वह नए सीखे शब्दों के वाक्य बनाए,
वे उसका
संशोधन कर देंगे।... उसने कुछ अत्यंत साधारण शब्दों के वाक्य
बना कर उन्हें दिखाए भी थे। पर न तो कभी ढंग से काम कराने का
उन्हें अवकाश ही मिला और न उसके विकास में उनकी रुचि जागी।...
उन दोनों का संसार एक दूसरे से बहुत भिन्न था और उनके लिए उसका
संसार तनिक भी महत्वपूर्ण नहीं था।...
एक दिन उन्होंने
संदीप को सफेद कमीज,
नीली निकर और
जूते-मोजे डटाए हुए देखा। नारियल के तेल से उसके बाल चमक रहे
थे और बुरी तरह चिपके हुए थे।... रोहित उन दिनों ब्रिल्क्रीम
का प्रयोग करते थे। नारियल और सरसों के तेल वाले देहाती और
गंवारू संसार से वे बहुत दूर जा चुके थे।...आज संदीप उनके काम
पर जाने से पहले अपने स्कूली कपड़े पहन कर तैयार हो गया था।...
होगा कोई कारण। उन्हें क्या।... पर उसकी कमीज की जेब पर यह एक
मैडल सा क्या लटक रहा है
?...पता
नहीं क्या लटका कर वह जोकर सा इधर-उधर घूम रहा है।... उन्हें
उसमें कोई विशेष रुचि नहीं थी;
पर दुनिया तो
जानती थी न कि वह उनका भाई है। उनके साथ उनके घर में रहता
है।... फिर वे उसे इस प्रकार कार्टून बन कर कैसे घूमने दे सकते
हैं। ...
''इधर आओ।''
वह आकर उनके
सम्मुख खड़ा हो गया।
''यह जेब पर क्या
लटका रखा है
?''
''मैडल है।''
संदीप ने
कहा।
''मैडल
?
क्या किसी मोर्चे
पर गया था
?''
वे हंसे
थे।
उन्होंने अपने इस
वाक्य से आहत, संदीप का पीड़ित दर्प भी देखा था। पर इतने से
बच्चे का बैंड वालों के समान मैडल लटका कर घूमना,
उनके लिए
हास्यास्पद ही हो सकता था।
''मुबाहिसे में
जीता है।''
उसने अपना सारा
आत्मबल बटोर कर उनका प्रतिवाद किया।
''मुबाहिसा ! ओह
डिबेट !'' उन्हें कुछ गंभीर होना पड़ा।
उन्हें उसीसे
मालूम हुआ था कि नगर के सारे स्कूलों की वार्षिक प्रतियोगिताओं
में उसे मिडिल स्कूलों की उर्दू वाद-विवाद प्रतियोगिता में
पुरस्कार स्वरूप यह मैडल मिला था,
जिसका
प्रदर्शन कर वह मुहल्ले में स्वयं को गौरवान्वित करता फिर रहा
था। बचपना ही तो था। नहीं जानता था कि मैडल को अपने डब्बे में
बंद रहना चाहिए और कोई विशेष आवश्यकता होने पर ही किसी को
दिखाना चाहिए। मैडल लटकाने का प्रचलन या तो सेना की आलंकारिक
वर्दी में था,
या फिर बैंड बाजे
वाले,
शहनाई और नफीरी
बजाने वाले,
इस प्रकार मैडल
लटकाते थे। कभी कभी जादू का प्रदर्शन करने वाले,
तथाकथित
प्रोफेसर लोग भी इस प्रकार के मैडल लटकाते थे।... इस बच्चे को
किसी ने नहीं बताया और यह अपने बौने अहम् को प्रदर्शित करता,
मैडल
लटकाए गलियों में घूम रहा है।
उन्होंने उससे यह
पूछना भी आवश्यक नहीं समझा था कि डिबेट का विषय क्या था और वह
वहां क्या बोल कर आया था। यद्यपि घर मे |