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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

सूखा बस्तर

एक

बरसात कहाँ है

सिवाय उम्मीद के

और कहीं नहीं

खेत बाट जोह रहे हैं

बरसात आए तो

वे कुछ हँस ले ।

दो

मेड़ अकेला नहीं है

पीली-लाल मिट्टी के

साथ देख रहा है

पेड़ में बैठी चिड़िया को

कि कब वह

चोंच में पानी भर लाए

और वह हरा हो ले ।

तीन

खेत की मिट्टी से मैंने पूछा-

तुम अच्छी हो

उसने सूखी आँखों से

कहा- देख तो रहे हो

आँखों में भी पानी नहीं है ।

चार

पेड़ चुप, पत्थर चुप, पगडंडी चुप

नदी चुप, चिड़िया चुप

खेत चुप सोमारू चुप

आसमान देख रहा है

धरती पर सब चुप हैं ।

पाँच

बहुत-सी कविताएँ लिखूँगा

खेत की तरह हरी-भरी

पानी की तरह लबालब

लेकिन कविता से

पानी नहीं गिरा पाऊँगा ।

    विजय सिंह

बंद टॉकीज़ के पास

जगदलपुर, बस्तर (छत्तीसगढ़)

  ◙◙◙

कविताएँ

 

- प्रभा मुजुमदार

- अभिनव शुक्ला

- विजय सिंह

-  डॉ. त्रिलोक महावर

 माह के कवि

- कृष्ण कुमार यादव

 

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