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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

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।। कविता ।।

 

 

समग्र

 

ज़िंदगी के ढेर सारे रंग

अभिव्यक्ति की हर पंक्ति में

घुल मिल गये हैं

एक कोलॉज जिसमें से कुछ भी

अलग नहीं किया जा सकता

समय के इस लंबे गलियारे में

कब कौन चला है किस ओर

हर पल बनती बदलती

परछाइयों को देख कर

मुश्किल है एक आकार तय करना

गड्ड-मड्ड चेहरे, मिलीजुली आवाज़ें

और अहसासों के हर रंग और गंध में से

नहीं मिट सकता अनचाहा पल

बीता हुआ एक लमहा भी

अनबीता नहीं हो सकता

रोशनी और अंधेरा, सफेद और स्याह, कडुआ मीठा

यही अखंड समग्रता में जिया हुआ

पल, बरस और दशक

 

दृष्टा

 

जबकि सुविधाभोगी ज़िंदगी ने

बना दिया है हद दर्ज़े का समझौतापरस्त

स्थितप्रज्ञता की यह नई परिभाषा

जहाँ अपने ही

चारों ओर की टूट-फूट

हत्या, लूट पाट, बलात्कार, ब्लैक मेल की

रोज की खबरें चाय की चुस्कियों के साथ

पढने और सुनने का नित्य क्रम

दिमाग और मिजाज पर

कुछ भी असर नहीं छोडता

सब कुछ चलता है की

संतुष्टि और स्वीकृति के बीच

भूचाल की तरह हिला जाती है कोई खबर

चुप्पी की मोटी बर्फ को चीर कर सनसनाती

कुछ कहने को विवश कर देती है

नैतिकता और आधुनिकता, मर्यादा, वर्जना हीनता की सीमा

पीढियों के बदलते रिश्ते

जैसे बुनियादी प्रश्न उस मलबे से निकल कर

आ खडे होते हैं

हमने कहा था न की तर्ज पर प्रवचन, दोषारोपण, गौरव गाथाओं के

हजार बार सुने जुमले जब तब दोहराये जाते हैं

संवादहीनता को इक तरफा बयानों से, नारों और निष्कर्षों से

खत्म तो नहीं किया जा

सोच असफल हो जाती है

नहीं बन जाता सेत जो जोड सकें अलग-अलग किनारे

व़क्त की तेज़ रफ़्तार में, ज़िंदगी के अध्याय में

हमारा रोल क्या वाह अथवा

वाह तक ही रह गया है

    प्रभा मुजुमदार

वरिष्ठ डाक अधीक्षक

कानपुर नगर मण्डल कानपुर (उ0 प्र0)

  ◙◙◙

 

कविताएँ

 

- प्रभा मुजुमदार

- अभिनव शुक्ला

- विजय सिंह

-  डॉ. त्रिलोक महावर

 माह के कवि

- कृष्ण कुमार यादव

 

 

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तकनीकः प्रशांत रथ

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