vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कविता ।।

 

 

ई-पार्क

 

बचपन में पढ़ते थे

ई फॉर एलीफैण्ट

अभी भी ई अक्षर देख

भारी-भरकम हाथी का शरीर

सामने घूम जाता है

अब तो ई

हर सवाल का जवाब बन गया है

ई-मेल, ई-शॉप, ई-गवर्नेंस

हर जगह ई का कमाल

एक दिन अख़बार में पढ़ा

शहर में ई-पार्क की स्थापना

यानी प्रकृति भी ई के दायरे में

पहुँच ही गया एक दिन

ई-पार्क का नज़ारा लेने

कम्प्यूटर-स्क्रीन पर बैठे सज्जन ने

माउस क्लिक किया और

स्क्रीन पर तरह-तरह के देशी-विदेशी

पेड़-पौधे और फूल लहराने लगे

बैकग्राउण्ड में किसी फ़िल्म का संगीत

बज रहा था और

नीचे एक कंपनी का विज्ञापन

लहरा रहा था

अमुक कोड नंबर के फूल की ख़रीद हेतु

अमुक नम्बर डायल करें

वैलेण्टाइन डे के लिए

फूलों की ख़रीद पर

आकर्षक गिफ़्टों का नज़ारा भी था

पता ही नहीं चला

कब एक घंटा गुजर गया

ई-पार्क का मज़ा ले

ज्यों ही चलने को हुआ

उन जनाब ने एक कम्प्यूटराइज्ड रसीद

हाथ में थमा दी

आखिर मैंने पूछ ही लिया

भाई! न तो पार्क में मैने

परिवार के सदस्यों के साथ दौड़ लगायी

न ही अपने टॉमी कुत्ते को घुमाया

और न ही मेरी पत्नी ने पूजा की ख़ातिर

कोई फूल या पत्ती तोड़ी

फिर काहे की रसीद ?

वो हँसते हुये बोला

साहब! यही तो ई-पार्क का कमाल है

न दौड़ने का झंझट

न कुत्ता सभालने का झंझट

और न ही पार्क के चौकीदार द्वारा

फूल पत्तियाँ तोड़ते हुए पकड़े जाने पर

सफाई देने का झंझट

यहाँ तो आप अच्छे-अच्छे

मनभावन फूलों व पेड़-पौधें का नज़ारा लीजिये

और ऑंखों को ताज़गी देते हु

आराम से घर लौट जाईये।   

   कृष्ण कुमार यादव

वरिष्ठ डाक अधीक्षक

कानपुर नगर मण्डल कानपुर (उ0 प्र0)

  ◙◙◙

 

माह के कवि

 

- ई-पार्क

- गौरेया

- गुर्दा

-  पेज थ्री

- रिश्तों का अर्थशास्त्र

- विज्ञापनों का गोरखधंधा

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google