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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

एक

आख़िर

मिल ही गई तुम,

और

खोई हुई कविता

(जो कभी लिखी थी तुम्हारे लिए)

तुम मिली तो

मैं/मैं न रहा,

और

कविता मिली तो

तुम/तुम न रही

दो

उसका मिलना

जैसे ईशान वन में

धुंध का हटना

घुमावदार पहाड़ी रस्ते पर

किसी व्यूह पाईंट पर

खिलखिलाती धूप का मिलना

उसका मिलना/जैसे

अमराई के आगोश में

मकरंद का झरना

सरई की ख़ुशबू में, साथ-साथ

पगड़ंडी पर चलना

महुए के फूलों में

सुध-बुध का खो जाना

उसका मिलना/ जैसे

ख़ुद-ब-ख़ुद

पहाड़ी नदी हो जाना या

स्मृतियों के लॉन में

दुपट्टा लहराते हुए खिलखिलाना

उस मोड़ तक

साथ-साथ आना

और लौट जाना

तीन

मुरझाने का

ख़ौफ था

लिहाजा फूल तब्दील हो गये

कविताओं में मुद्दतों बाद

जैसे ही

तुमने छुआ मेरी उँगलियों को

कविता संग्रह को

ताज़ा हवा का एक झोंका

छू गया हम दोनों को

देहगंध में डूबी हवा मे

बिखर गई भीनी-भीनी ख़ुशबू

और लगा

हम भौरों भरे बगीचे में हैं ।

    डॉ. त्रिलोक महावर

कलेक्टर

धमतरी (छत्तीसगढ़)

  ◙◙◙

 

कविताएँ

 

- प्रभा मुजुमदार

- अभिनव शुक्ला

- विजय सिंह

-  डॉ. त्रिलोक महावर

 माह के कवि

- कृष्ण कुमार यादव

 

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