|
बख्शी ने छायावाद के लिए भक्तिवाद नाम सुझाया था
पद्मश्री
पं.मुकुटधर पांडेय से जयप्रकाश मानस की बातचीत
पूर्वांश से आगे....
मानस –
आकी रचनाएँ अपने समय की किन-किन बड़ी पत्रिकाओं में छपती थीं
?
पांडेय जी –
यह तो आप जैसे युवा कवियों के शोध का विषय है।(बलदेव जी की ओर
देखते हैं)
बलदेव –
मानस जी, द्विवेदी युग की शायद ही कोई पत्र-पत्रिका हो जिसमें
पांडेय जी की रचनाएं ससम्मान न छपती हो, खासकर सरस्वती, इन्दु,
विशाल भारत, माधुरी, सुधा जैसी श्रेष्ठ अति लोकप्रिय पत्रिकाओं
में पांडेयजी की रचनाएं छपती थीं। स्वदेश बांधव, प्रभा, श्री
शारदा, हितकारिणी जैसी दर्जनों पत्रिकाओं में पांडेय जी छाए
रहते थे।
मानस –
मैंने सुना है, आप सरस्वती के मुखपृष्ठ में छपते थे।
पांडेय जी –
यह बात कुछ अंश में सही है, पहले मैथिलीशरण गुप्त सरस्वती के
प्रथम पृष्ठ में छपते थे, इसके बाद मेरी कविताएँ प्रथम पृष्ठ
में छपती थी, फिर पंत जी की रचनाएं। द्विवेदी जी के संपादन में
मेरी डेढ़ दर्जन कविताएं छपी हैं, जो प्रायः प्रथम पृष्ठ में
ही छपी हैं।
मानस –
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में आप क्या कहना
चाहेंगे ?
पांडेय जी –
आचार्य द्विवेदी मेरे गुरुजनों में थे। उन्होंने अपनी लौह
लेखनी से खड़ी बोली का संस्कार किया है, साहित्य के सीमित
विषयों की जगह उन्होंने नए-नए विषयों का समावेश किया है। नए
कवियों की रचनाओं को संशोधन कर उन्होंने परिमार्जित किया। वे
अनुशासनप्रिय थे। उदण्डता उन्हें बरदाश्त नहीं थी। आचार्य का
आतंक सर्वत्र था, इसके बाद भी वे नवीनता के विरोधी नहीं थे।
छायावादी कही जाने वाली मेरी रचनाएं उन्हीं के संपादन काल में
छपी हैं। द्विवेदी जी ने मेरा नाम सरस्वती के फ्री लिस्ट में
डाल रखा था। उनकी सीख थी साल में कोई तीन रचनाएं भेज दिया
करें, कम लिखिए लेकिन अच्छा लिखिए।
मानस –
प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी से आपके बीच किस प्रकार की
आत्मीयता थी ?
पांडेय जी –
देखिए, प्रसाद जी और हमारे भाई साहब (लोचन प्रसाद पांडेय) में
मैत्री थी। दोनों एक दूसरे को अपनी नई पुस्तकें भेंट किया करते
थे। प्रसाद जी के अंतिम समय में उनके दर्शन हुए थे। निरालाजी
से मेरा परिचय नहीं रहा, लेकिन हम दोनों एक दूसरे की रचनाओं से
परिचित थे। निराला जी के आग्रह पर मैंने
‘समन्वय’
के लिए रचनाएं भेजी थी, जो सन 192मानस --22 के बीच छपी थी।
निराला जी ने मेरा
‘स्वागत’
शीर्षक गीत ‘समन्वय’
के प्रारंभिक अंक में प्रकाशित किया था। पंत जी से भी मेरा
परिचय नहीं था लेकिन उनकी रचनाएं मझे प्रिय थीं। महादेवी जी के
दर्शन एकाध बार ही हुए। उनके गीत मर्मस्पर्शी हैं। वे
नारी-वेदना की अप्रतिम कवयित्री हैं। लोग उन्हें आधुनिक मीरा
कहते हैं तो ठीक ही कहते हैं।
डॉ. बलदेव –
पंडित जी, मुझे आदरणीय पंत जी और महादेवी वर्मा के दर्शन का
लाभ मिला है, दोनों आपको अपना गुरुवत मानते हैं। दोनों ने ही
सरस्वती में प्रकाशित होने वाली आपकी कविताओं से अपने को
प्रभावित होना बतलाया है।
पांडेय जी –
यह तो उनकी महानता है, पर वे दोनों उच्चकोटि के कवि हैं, उनसे
हिंदी साहित्य समृद्ध हुआ है।
मानस - पंडित जी, एक अंतिम प्रश्न...
पांडेय जी –
पूछिए...
मानस –
एक अच्छी कविता कैसी होनी चाहिए, आप नई पीढी़ को क्या संदेश
देना चाहेंगे...
पांडेय जी –
देखिए कविता की परिभाषा देना मुश्किल है, पर मैं समझता हूँ
कविता को सरल, सुबोध और सरस होना चाहिए। भाव संवेदन कविता का
प्रथम और प्रमुख गुण है। मैं हिंदी के भविष्य के प्रति
आश्वस्त हूँ, हिंदी तो देश की राष्ट्रभाषा है, उसकी गरिमा के
अनुकूल नई पीढ़ी को अग्रसर होना चाहिए। हाँ
!
छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के विकास की नई दिशा में नई चेतना
की ज़रूरत है। इधर की नई पीढ़ी इस भाषा में काफी कुछ कर सकती
है। मैं चाहूँगा कि आप जिस भाषा-बानी का उपयोग करते हैं, उसमें
भई तो रचिए। आखिरकार उससे भी तो हिंदी को बल मिलता है...
बलदेव –
मानस जी, अब पांडेय जी से अनुमति लें, आशीर्वाद लें, आज तो
हमने उनसे कुछ अधिक ही समय ले लिया।
पांडेय जी के चरण स्पर्श करने के बाद मैंने और डॉ. बलदेव उनके
निवास से वापिस हुए। डॉ. बलदेव तो अंतिम समय तक उनके सानिध्य
में रहे, लेकिन यह मेरे लिए उनका अंतिम दर्शन था। ऋषितुल्य
पांडेय जी का वह सौम्य, उदार मुखमंडल आज भी मेरे हृदय को
उद्दीप्त करता रहता है।
(30-9-1986)
◙◙◙
|