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प्रतिकार करूँगा
ओ वैभव
की मूढ़ रंजना,
मैं
तेरा प्रतिकार करूँगा ।
रह ले
चाहे राजभवन में,
विचरण
कर ले आज गगन में ।
स्वर्णाभूषण, राजमुकुट या
रानी के
विन्यास वसन में ।
धर्म
आचरण से भटकी तो,
क्या तेरा सत्कार करूँगा
?
तुझको
तेरी माया प्यारी,
इधर
रोटियों की लाचारी ।
तेरे
मिथ्या आडंबर पर,
होती
मानवता बलिहारी ।
इसका
शोषण किया कभी तो,
मैं
तेरा संहार करूँगा ।
शोणित
से उपजी हरियाली
सींच
रहे सब डाली-डाली
श्रम से
पिचके अधर-गाल की,
क्षीण
हुई जाती है लाली ।
इनके हक
में क़लम चलाकर,
तीखी
उसकी धार करूँगा ।
सद्भावों के दीप जलाये,
विस्मृत
को रस्ता दिखलाये ।
दीन-हीन
की बातें सुनकर,
उनके
घावों को सहलाये ।
अगर
कहीं यह कर पायी तो,
तेरी
जय-जयकार करूँगा ।
डॉ. अजय पाठक
लेन-3,
विनोबा नगर,
बिलासपुर
(छत्तीसगढ़)
- 495001
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