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आसां न था सफ़र कोई
छत पे सोया था बेख़बर
कोई।
लूट कर ले गया है
घर
कोई।
तुम जो मिम्बर से चीखे जाते है,
उसका होता नहीं असर कोई।
शाम लौटा वो घर तो ये बोला,
इतना आसां न था सफ़र
कोई।
पेट था,
पाँव
थे औ गरदन थी,
अंजुमन में नहीं था सर कोई।
सुबह से शाम झूठ और
धोखा,
तुमको लगता नहीं है डर कोई।
प्रताप सोमवंशी
स्थानीय संपादक,
अमर उजाला,
हिंदी दैनिक
८९,
इंडस्ट्रियल
इस्टेट,
फजलगंज,
कानपुर
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