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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। ग़ज़ल ।।

 

 

 

आसां न था सफ़र कोई

 

छत पे सोया था बेख़बर कोई
लूट कर ले गया है  घर कोई

तुम जो मिम्बर से चीखे जाते है,
उसका होता नहीं असर कोई

शाम लौटा वो घर तो ये बोला,
इतना आसां न था सफ़र कोई

पेट था, ाँव थे औ गरदन थी,
अंजुमन में नहीं था सर कोई

सुबह से शाम झूठ और  धोखा,
तुमको लगता नहीं है डर कोई


  प्रताप सोमवंशी

स्थानीय संपादक,
अमर उजाला, हिंदी दैनिक
८९, इंडस्ट्रियल इस्टेट,
फजलगंज, कानपुर

◙◙◙

 

माह के ग़ज़लकार

 प्रताप सोमवंशी

- अच्छी-अच्छी बातें मत कर

- पहली उड़ान ले तो सही

- आईने सौ जगह से चटके हैं

- आसां न था सफ़र कोई

- सबने हथियार तलाशा

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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