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आईने सौ जगह से चटके हैं
लोग तर्कों
के बीच अटके हैं।
रास्ते दूर-दूर हट के हैं।
तेरे
वादों के लंबे मरूथल में,
कितने मासूम लोग भटके हैं।
सोचता
हूँ
अभाव है
या करंट,
एक-एक पल हज़ार
झटके हैं।
एक तस्वीर कैसे पाओगे,
आईने सौ जगह
से चटके हैं।
आप बोलें
ज़रूर
तूफां पर,
रहने वाले तो अप तट के
हैं।
प्रताप सोमवंशी
स्थानीय संपादक,
अमर उजाला,
हिंदी दैनिक
८९,
इंडस्ट्रियल
इस्टेट,
फजलगंज,
कानपुर
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