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अच्छी-अच्छी बातें मत कर
तुझको देख के जाने क्यूं ये लगता है
।
तू वैसा ही है
क्या जैसा दिखता है ।
रिश्ते नातों की ऊँची दुकानों पर,
हाल-चाल का भी अब
पैसा लगता है ।
भेष बदलने में वो काफी माहिर है
दिल की बस्ती में जो
धोखा मिलता है ।
अच्छा है कुछ लोग बदल भी जाते हैं,
थोड़ा-थोड़ा बोझ
उतरता रहता है ।
इतनी अच्छी-अच्छी बातें मत कर तू,
तेरे बराबर मेरा भी घर
पड़ता है ।
प्रताप सोमवंशी
स्थानीय संपादक,
अमर उजाला,
हिंदी दैनिक
८९,
इंडस्ट्रियल
इस्टेट,
फजलगंज,
कानपुर
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