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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

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।।मॉरीशस की डायरी।।

 

 

स्वतंत्रता बनाम मोह-भंग


विनय गुदारी

 

स्वतंत्रता मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है–यही विचार थे बालगंगाधर तिलक जी के। बात पूरी तरह से सार्थक है। किसी भी व्यक्ति के अधिकारों में शीर्ष स्थान पाता है उसकी स्वतंत्रता। तिलक जी ने आगे भी कहा था कि स्वतंत्रता माँगने से नहीं मिलती है, उसे छिनना चाहिए। यह भी उतने ही उपयुक्त है जैसे कि पहले कहा गया है। परंतु इसमें एक विशेष बात है कि व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता कितने प्रिय हो जिसे प्राप्त करने के लिए उसे छिनने की स्थिति में पहुँचना पड़े। सतही तौर पर सभी को स्वतंत्र होना अच्छा लगता है। और यदि किसी को उसके इस जन्मसिद्ध अधिकार बिना किसी संघर्ष से अर्पित कर दिया जाए तो सामूहिक अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि उस स्वतंत्रता के साथ वैसा रागात्मक सम्बन्ध नहीं रह पाता जैसे कि किसी को उसे संघर्ष करने पर मिलता है और सामूहिक स्वतंत्रता की फलक कहीं अधिक विस्तृत हो जाती है।

 

मॉरीशस ने 12 मार्च 2008 को अपनी स्वतंत्रता की 40वीं वर्षगांठ बहुत ही गर्व और आनन्द के साथ मनाया। साथ ही अपना 16वाँ गणतंत्र दिवस भी मनाया। राष्ट्रप्रेम की लहरें जैसे अचानक हर मॉरीशसवासी के मन में उभर गईं। चारों तरफ़ उल्लास उडम़ उठा था । सभी अपने चौरंगे को घर, गाड़ी ऑफ़िस आदि में लगाने पर अपने देश-प्रेम को व्यक्त करने से नहीं चुकना चाहते थे । किसी भी राष्ट्र के आंतरिक शांतिमय वातावरण को सुरक्षित रखने के लिए उसकी जनता के मन में राष्ट्र-प्रेम को सुदृढ़ बनाना आवश्यक है। इसी लक्ष्य के साथ मॉरीशस की इस ऐतिहासिक तिथि को यादगार बनाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर शाँ-दे-मार्स में एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें करीब 13 मार्च के ढाई बजे तक अनेक देशों से आए हुए कलाकारों के शो का आनन्द मॉरीशसीय जनता ने उठाई और इस प्रकार से अपने ‘मॉरीशन’ होने का गर्व महसूस करता रहा ।

 

आज के मॉरीशसवासी अपने देश की स्वतंत्रता का अनुभव तभी करता है जब उसके सामने ऐसे भाव को जागृत करने के साधन रखे जाते हैं। विशेष अवसरों पर ही कुछ ख़ास तत्त्वों से साक्षात्कार करते हुए उसे (और हमें) अपने देश-प्रेम को व्यक्त करने का अवसर मिलता है। जो वस्तु हमें छिनने से नहीं मिली उसके महत्त्व के गूढ़ अर्थ को समझने की क्षमता भी हमारे हाथ से निकलता गया। आज मात्र कुछ ऐसे ही तत्त्व अथवा प्रतीक रह गए हैं हमारे पास जिनके माध्यम से हम स्वदेश की गरिमा का अनुभव करते है। वरना जीवन उसे सुविधा या ‘comfort zone’ में गुज़ारते हुए आगे बढ़ते जा रहे हैं। हम प्राय: भारतीय देश-प्रेम का उदाहरण देते हैं और उसके साथ हमारा जुड़ाव स्वाभाविक ढंग से स्थापित हो जाती है। भारत अपनी भौगोलिक विशालता एवं विविधता के साथ-साथ अपने सामूहिक त्याग, संघर्ष और एकता के लिए प्रसिद्ध है। इसीलिए भारतवासियों ने अपनी स्वतंत्रता के संग्राम को भावात्मक स्तर पर छेड़ा।

 

मॉरीशस अपनी सांस्कृतिक विविधताओं के लिए चर्चित है। यहाँ पर अनेक संस्कृतियों का समानांतर प्रचलन है। सभी एक-दूसरे के साथ प्रेम एवं सहभाव से जीते हैं। धार्मिक विभिन्नता की उपस्थिति के होने के बावजूद सभी एक-दूसरे के धार्मिक विचारों का समादर करते हैं। परंतु राष्ट्रीय स्तर पर एकता स्थापित कर पाने की अनेक चुनौतियाँ हैं।

 

Jean Jacques Rousseau अनुसार man is born free and yet he is in chains everywhere. इसी परतंत्रता का शिकार हैं सभी। कभी शासन के, कभी नियम के, कभी अनुशासन के, कभी प्रेम-ममत्त्व के हर प्रकार से मानव बंधा हुआ है। और संभवत: इसी बंधन के घेरे में जीवन बिताने के आदी आज का मानव इसी परिसीमा में अपना आनन्द ढूँढता रहता है। इसी परिधि में रहते हुए किसी भी प्रकार की सत्ता समय-समय पर स्थितियों के अनुकूल असका उपयोग करता जाता है। तब भी वह विरोध करने के अपने जन्मसिद्ध साहस के साथ समझौता करके किसी अहिंसा-प्रशंसक की तरह अपने ऊपर उस अज्ञात शोषण को सहता चला जाता है। हमारा स्वतंत्रता दिवस कुछ-कुछ इसी स्वतंत्रता-माहौल का समानार्थी बनता जा रहा है जहाँ पर अधिकतर मॉरीशसवासी को अपने राष्ट्र-प्रेम अभिव्यक्त करने को बाध्य किया जाता है। और इस प्रकार इसमें अपने ऊपर किए गए कल्याण के रूप में स्वीकारते हुए वह खुशी से और गर्व से कहता जाता है कि ‘proud to be a Mauritian’!

 

Vinaye Goodary

Senior Lecturer (Hindi Studies),

Dept of Languages,

Mahatma Gandhi Institute

Moka, Mauritius

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