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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। व्यंग्य ।।

 

 

मुझ पर करो पीएचडी


काशीपुरी कुंदन

 

प्रो. फिसद्दीलाल के ऊपर एक शोधार्थी ने शोध पूरा किया, उसके लिजलिजा व्यतित्व से उसे क्या मिला होगा। काश कोई कलमुँहा, कलमुँही मुझ जैसा महान रहस्यवादी व्यंग्यकार के व्यक्तित्व एवं कृतिकार पर पी.एच.डी. करता तो उसे पता चल जाता कि लब्ध प्रतिष्ठित सफल व्यंग्यकार कैसे बना जाता हैं, उनकी रचनात्मक शैली कैसी होती हैं, व्यंग्य विधा है या शैली, व्यंग्य विसंगति समर्थक हैं या विरोधी आदि महत्वपूर्ण बाते मुझसे पता चलता कि जैसे चार किताबें पलटों और निर्दयतापूर्वक दो-दो पंक्तियाँ उड़ाकर विस्तार अपने शब्दों में देकर जिससे कभी चोरी डक्कैती का आरोप लग तो सापु बरी हो जाओ, पीटो मौलिकता का ढोल, जितनी ज़ोर से हो सके। इसी प्रकार एक ही रचना को अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कैसे छपवाया जाता है। संपादक व पाठक को नई रचना का झाँसा कैसे दिया जाता है, आदि रहस्यों से पर्दा उठाता, बता देता कि हम भी किसी से कम नहीं है। बस ज़रा सा ऊपर का नीचे, नीचे का ऊपर कीजिए माल वहीं रहेगा। लेबल बदल दीजिए यानी शीर्षक बदल दीजिए और धर दो संपादक की मेज़ पर, मजाल हैं उस रचना को खेद सहित लौटा दे या आप पर कोई आरोप लगा दें कि एक रचना को पच्चीस जगह छपवा रहा है। यही आज का ट्रेंड हैं। साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

      

इसी सिलसिले में संपादक को कैसे पटाया-सटाया जाता है, यह भी लगे हाथ बता देता हूँ। सर्वप्रथम उसकी अख़बार की तारीफ मेंभले ही वह अख़बार दो पन्ने का ही क्यों न हो उसकी छपाई स्तर को नज़र अंदाज करते हुए लोकवाणी के लिये निरंतर लंबे-लंबे पत्र अपने छद्म नामों से भेजिए, यही गुर उनकी संपादकीय लेख आदि पर भी अपनाईये। यहाँ पर एक बात महत्वपूर्ण नहीं हैं कि संपादकीय या लेख विशेष दलगत नीति समर्थक है या त्रुटिपूर्ण है। महत्वपूर्ण बात हैं कि उसे संपादक ने या संपादक के नाम किसी ओर ने लिखी हैं। मेल जोल बनाए रखना भी ज़रूरी हैं। कभी घर भी जा धमके कि साहब इधर से गुज़र रहा था सो आपका दर्शन लाभ लेते चलूँ, थोड़ा सा शुद्ध घर का घी और चावल लाया हूँ। हो सके तो संपादक जी का नागरिक अभिनंदन अपने ही पैसों से किसी परिषद द्वारा करवा कर उन्हें अखिल भारतीय ही नहीं अर्न्तराष्ट्रीय स्तर का पत्रकार घोषित कर दीजिए ओर आप अपनी रचनाओं के साथ जो मौलिक भी न हो सुर्खियों मे रहिये।

      

यही फ़ार्मूला आजकल आकाशवाणी, दूरदर्शन के लिए लागू होता है। प्रसारित कार्यक्रम आपके पत्र से लेकर कुचीपुड़ी नृत्य की प्रशंसा कीजिए यह अलग बात हैं कि आप नृत्य के बारे में कखग नहीं जानते हों। इसी प्रकार प्रकाशक को कैसे भिड़ना, प्रकाशन के क्षेत्र में दलाली का धंधा अपने ही पैसे से किताब छपवाकर बड़ा चढ़ा कर रायल्टी का हल्ला करना साथ ही यह जुमला जोड़ दे कि प्रकाशक को गरज थी पांडुलिपि मँगवाकर छापा और अपनी रचनाएं भी बारबार पढ़ने को जी चाहता है। शीघ्र ही दूसरा संस्करण निकल रहा है। शोध यहीं तक सीमित नहीं रहता, बस उकेरने की देरी है परत दर परत खुलता जाता है। हमारे व्यक्तित्व के सामने नामी गिरामी लोग बौने सिद्ध हो जाते हैँ। जैसे-जैसे जहाँ शोधार्थी तह मे पहुँचेगा उसे चमत्कृत कर देने वाले तथ्यों से रूबरू होना पड़ेगा, मसलन अभिनंदन स्वयं अपने पैसों में करवाओ, अभिनंदन ग्रंथ खुद लिखो बकलम और का हो तो इस बहाने सदैव सुर्खियों में रहो।

      

धुँआधार कवि सम्मेलन पीटने के गुरू भी हम बता देते हैं, आयोजकों से बिना उत्तर की आशा उसके सम्पन्न कार्यक्रमों के तारीफ के पुल जितना बड़ा बांध सके, बांधो। आयोजक चंदाखाऊ पारिश्रमिक हड़पू क्यों न हो एक दिन पत्थर भी पिघल जाता है। कवि सम्मेलन में यात्रा व्यय भी नसीब न होता तो मगर बताओ चार अंको का मानेदय, आप उधारी वालों के डर से घर में दुबके पड़े हो मगर आपके बाल बच्चे तहाजे वाले या मिलने वालों को कवि सम्मेलन में गए हैं, बताएँ। इसी प्रकार कवि सम्मेलन में कैसे जमना, विरोधी को किस प्रकार उखाड़ना मंच को मयखाना में तब्दील कैसे किया जाता है, कैसे कवि गोष्ठी मे अध्यक्षता का लाभ उठाना, प्रेमिका क्यों रखी जाती है, आदि राज़ की बातों का खुलासा करता तो आगे चलकर ऐतिहासिक दस्तावेज हो जाता। लोग मुझे ऐतिहासिक पुरूष के रूप मे याद करते। काश कोई मुझ पर पी.एच.डी. करता तो उसके सात पुरखे तर जाते। अभी भी समय हैं बेवकूफ़ों, मेरे पाँव कब्र मे नहीं लटके हैं आ जाओ वरना मेरे मरने के बाद पछताओंगे।

   काशीपुरी कुंदन

रामलीला मैदान, राजिम, रायपुर

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