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सृजनगाथा

 

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वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

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।। संस्मरण ।।

 

 

विजय तेन्दुलकर का होना आज उनके न होने से बहुत बडा है...


सत्यदेव त्रिपाठी

 

ज विजय तेन्दुलकर हमारे बीच नहीं हैं...इसका दुख तो पूरे नाट्य-संसार को है और हमेशा रहेगा..., पर उनका होना इतना सशक्त व जीवंत है, कि नाट्य-संसार में उनके न होने पर अफ़सोस करने की बात वैसे ही नहीं है - जैसे तुलसीदास के अनुसार राजा दशरथ के लिए नहीं थी - सोच जोग नहिं कौसलराऊ, भुवन चारि दस प्रकट प्रभाऊ...। जी हाँ, नाटककार विजय तेन्दुलकर का भी प्रभाव चौदहों भुवन में विख्यात है।

 

उनकी विश्व-ख्याति का डंका घासीराम कोतवाल ने बजाया था, जो फिर कभी रुका नहीं - सखाराम बाइंडर, कन्यादान, खामोश अदालत जारी है, अंजी, पंछी ऐसे आते हैं...आदि के रूप में देश-देशांतर में गूँजता ही रहा...। महाराष्ट्र प्रदेश के विविध लोकरंगों के माध्यम से बुने गये घासीराम कोतवाल से तो प्रभावित होकर 1985 में इसे अग्रेजी में यूँ तैयार किया गया, कि उसमें चीन, जापान, रूस, सिंहल, मोरक्को व भारत के कलाकारों ने अभिनय किया। अमेरिका के विभिन्न शहरों में 16 शोज़ हुए। स्वयं तेन्दुलकर के ही शब्दों में - बहुत बडे पैमाने पर अमेरिकन दर्शकों ने नाटक देखा - अच्छी तरह देखा। बाद में आते उनके ओवेशंस बहुत ज़ोरदार होते थे। हो सकता है कि यह अमेरिकन दर्शकों की आदत हो, पर नाटक के दौरान उनके इनवॉल्वमेंट देखते ही बनते थे। फिर फॉर्म व विषय के बारे में जो बोलते थे, बडी समझदारी से बोलते थे...। भाषा की अडचन भी वहाँ नहीं आयी’’। विदेश में यह आलम, तो देश का क्या कहना..!

 

आरम्भ में तेन्दुलकरजी एक प्रखर पत्रकार-स्तम्भकार रहे। उन्होंने फिल्म व टेलीविज़न में भी अपनी विरल प्रतिभा का लोहा मनवाया। गोविन्द निहलानी की फिल्म आक्रोश की पटकथा व संवाद तथा अर्धसत्य के लेखन के लिए फिल्मफेयर व आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर प्रोड्यूसर एमरेटस जैसे प्र्ख्यात सम्मान उन्हें मिले। दूरदर्शन के लिए वे निर्माता भी बने। और भी बहुत से काम किये... लेकिन उनका मूल क्षेत्र नाटक ही रहा और मराठी के होते हुए भी हिन्दी में उनके नाटक किसी भी हिन्दी नाटककार से कम न खेले जाते। स्व. गुरुवर वसंत देव जैसा श्रेष्ठ अनुवादक भी उन्हें मिला। असल में हिन्दी में आने के बाद ही तेन्दुलकर, गिरीश कर्नाड व बादल सरकार जैसे तमाम भारतीय नाटककार राष्ट्रीय स्तर पर जाने गये और फिर अंतरराष्ट्रीय क्षितिजों तक पहुँचे। और इसका श्रेय सबने सहर्ष हिन्दी को दिया भी है।

 

तेन्दुलकरजी को सह्स्त्राब्दि का नाटककार घोषित होने का गौरव हिन्दी में ही दिया गया। इस कीर्त्ति को अपने कानों सुनने व इसके निमित्त हुए समारोहों को अपनी आँखों देखने का अवसर उन्हें मिला...। विजयजी अपने जीतेजी ही लीजेंड बन गये । हालांकि वे अपनी तारीफ़ सुनना सचमुच पसन्द नहीं करते थे - कई बार ऐसे अवसरों पर उन्हें सभागार से उठकर जाते हुए मैंने देखा है, लेकिन व्यावहारिकता के नाते काफ़ी कुछ सुनना-करना तो होता ही था...।

 

विदेश और हिन्दी के अलावा देश की तमाम भाषाओं में तेन्दुलकरजी के नाटक खेले गये। सभी नामचीनों ने खेला...और जिसने नहीं खेला, उसने कहीं न कहीं, कभी-न-कभी बताया ज़रूर कि क्यों नहीं खेला...। यह क्या उनके बडे नाटककार होने का छोटा प्रमाण है? उल्लेख्य है कि राष्ट्रीय स्तर के जितने भी सम्मान्य पुरस्कार हैं, प्राय: सब उन्हें मिले। संगीत नाटक अकादमी (1971), सरस्वती सम्मान (1993), पद्मभूषण (1984). नेहरू फ़ेलोशिप (1973-74), सर्वश्रेष्ठ नाट्यकृति के रूप में शांतता कोर्ट चालू आहे को कमलादेवी चट्टोपाध्याय पुरस्कार (1970) के अलावा मध्यप्रदेश का प्रतिष्ठित कालिदास सम्मान, रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. की मानद उपाधि। अपने महाराष्ट्र प्रदेश में तो कतिपय नाटकों को राज्य पुरस्कार व कुसुमाग्रज प्रतिष्ठान के जन्मस्थान पुरस्कार’’ के साथ ढेरों मान-सम्मान मिले ही...।

 

लेकिन उनके जन्म प्रदेश (महाराष्ट्र) ने उन्हें उन पुरस्कारों से नवाजने में भी कोई कसर नहीं छोडी, जो किसी भी ज़हीन सर्जक के समक्ष घनघोर चुनौती बनकर खडे होते हैं, पर अंतत: उसे महान बनने के कारक भी सिद्ध होते हैं । तेन्दुलकरजी के प्राय: सभी नाटक उच्चकुलीन सामंती मूल्यों पर मर्मांतक प्रहार करते हैं, जिसके कारण शुरुआती दिनों में उन्हें घोर उपेक्षा सहनी पडी। जब उनके पहले नाटक गृहस्थ (दामू केंकरे निर्देशित) के पहले शो में सिर्फ़ दस-पाँच दर्शकों को देखकर काशीनाथ घाणेकर(जो बाद में सुपरहिट अभिनेता हुए) ने शो करने से इनकार कर दिया, तो तेन्दुलकरजी ने कभी नाटक न लिखने तक की बात सोच ली थी। फिर दामूजी ने ही उनका पहले का लिखा हुआ नाटक खेला - माणूस नावांचे बेट, जो चल निकला...। और विजयजी का विश्वास बढा, पर प्रबल विरोध का सामना तो उन्हें सतत करना पडा...। क्योंकि जैसे-जैसे उनका नाट्यलेखन आगे बढता रहा, सामंती व ब्राह्मणवादी (ध्यातव्य है कि वे स्वयं ब्राह्मण थे) मूल्यों पर आघात धारदार-से-धारदार होता गया। लोगों की नींदें हराम होती गयीं और तेन्दुलकरजी को अपने जान-माल पर भी हमले झेलने पडे। ऐसी अराजकताएँ उनके व उनके नाटकों के साथ हुईं और विडम्बना यह कि अनार्किस्ट का तमग़ा भी तेन्दुलकरजी पर ही लगा। परन्तु ऐसी अराजकतायें भी अपने विचारों पर दृढ इस कलमकार की आग को दबा न सकीं। और ऐसे पुरस्कार तो साहित्य में (हिन्दी के परसाईजी जैसे) कम ही लोगों को नसीब होते हैं कि एक तरफ़ विशाल जनसमूह आप की रचनाओं पर फ़िदा है और दूसरी तरफ़ एक ख़ास मानसिकता की ऐसी नंगई...।

 

ताज्जुब होता है कि किसी ख़ास पार्टी या संगठन से जुडे बिना भी अकेलेदम यह लेखक सारे प्रहारों का अविचलित भाव से सामना करता रहा। टूटा नहीं, बिखरा नहीं, वरन लगता है कि उससे शक्ति ग्रहण करता रहा- नीलकण्ठ की तरह। बस, एक बात अवश्य थी कि साठ-सत्तर के दशक वाले उनके समय में आज जितना पतन नहीं हुआ था। हर क्षेत्र - यहाँ तक कि राजनीति में भी - सचाई व मूल्यवता का साथ देने वाले लोग एकदम ख़त्म नहीं हो गये थे...। लेकिन अब तो न वैसे देवता रहे, न ही वैसा अक्षत। कुछ लोगों का मानना है कि विवाद में बने रहने के लिए ऐसी स्थितियाँ वे जानबूझकर पैदा करते थे, पर यह कयास बेबुनियाद है। सच व मानवीय मूल्यों के प्रति निष्ठा व निर्भयता उनके स्वभाव में थी। उन्होंने कई बार बयान देकर भी नाजायज़ बातों का खुला विरोध किया  - शिवसेना-भाजपा व नरेन्द्र मोदी तक का...। मेरे हाथ में बन्दूक हो, तो मैं मोदी को गोली मार दूँ वाला उनका कथन काफ़ी हलचल पैदा करने वाला साबित हुआ था। इस तरह साहित्य की कथनी को जीवन की करनी में उतारने वाले विरल साहित्यकार रहे तेन्दुलकर जी।

 

यूँ मेरे ख्याल से विजय तेन्दुलकर मितभाषी व काफ़ी संयत स्वभाव के व्यक्ति रहे । उनकी साहसिकता, बेबाक़ी, ईमानदारी व दृढता निहित रह्ती - उनकी गम्भीरता में। परंतु उनकी दृष्टि व प्रतिबद्धताएँ बहुत साफ़ थीं। दो छोटे-छोटे, पर प्रत्य्क्ष उदाहरण दूँगा...। पहला है - उनसे मेरी पहली मुलाकात का। फ़ोन पर जनसता के लिए मराठी रगमंच पर एक सीरीज़ लिखने के मक़सद को बताते हुए उनसे समय माँगा, तो रंगमंच का नाम सुनते ही उन्होंने हाँ तो कर दी, पर समय तीन महीने बाद ही मिल पाया, जिस दौरान मुझे पचासों फ़ोन तो अवश्य करने पडे होंगे...।

 

इंटरव्यू लेने के लिए उन दिनों मैं तेंदुलकर के बारे काफ़ी कुछ पढ रहा था और उससे यह अहसास बन-सा गया था कि वे हर सामने वाले को परखते हैं। सो, मुझे लगा- शायद परख रहे हों और मैं डटा रहा...लेकिन जब मिला - वे सरदार फ़िल्म लिखने के लिए एकांतवास में थे, तो वहाँ लगभग डेढ़ घंटे न कोई फ़ोन आया, न कोई मिलने वाला - सिर्फ़ एक बार मेरे लिए कॉफ़ी देने वाले के सिवा...। समझ में आयी उनकी पद्धति और प्रतिबद्धता । और उन्होंने बताया भी - कि मन तो नाटक में बसता है, इसलिए आप से बात करना ही चाहता था, लेकिन व्यस्तता के कारण आपको बहुत तक़लीफ़ दे दी। मेरे पूछने के दौरान वे सवालों को बडी तल्लीनता से सुनते और मेरी तरफ़ देखती हुई उनकी पैनी आँखें मुझे अन्दर तक भेदती हुई महसूस होतीं।

 

मैंने बालठाकरे से लेकर श्रीराम लागू तक सैकडों लोगों के इंटर्व्यूज लिए हैं, पर ऐसा बेधक अनुभव कभी नहीं हुआ। सवालों के जवाब उन्होंने बडी शिद्दत से, बडी बेबाकी से, पर उतनी ही विनम्र गम्भीरता से दिये। उनके आलोक से निकलकर आते हुए का अहसास मुझे अच्छी तरह याद है - मैं वही नहीं रह गया था, जो डेढ घंटे पहले अन्दर गया था...उनकी निष्ठा व मूल्यवत्ता से बहुत मुतासिर, बहुत समृद्ध होकर निकला था...।

 

और दूसरा उदाहरण है - मुम्बई में एन.एस.डी. से निकले लोगों के संगठन सांग के नाट्योत्सव के उद्घाटन समारोह का...। तेन्दुलकरजी मुख्य अतिथि थे। संयोगन वही मेरा अंतिम अवसर सिद्ध हुआ- उन्हें देखने-सुनने का...। समारोह देर से शुरू हुआ और कारण बना था - ओम पुरी, राज बब्बर, पंकज कपूर आदि का इंतज़ार, जिन्हें वहाँ उत्कृष्ट रंगकर्म के लिए सम्मानित किया जाना था। अपने उद्घाटन-भाषण में तेन्दुलकरजी ने कहा- स्टारों को सम्मानित करते हुए हमें स्ट्रग्लरों को नहीं भूलना चाहिए...। बडी विनम्रता से सहज ही समझा दिया उन्होंने अपने मंतव्य तथा एक गम्भीर असलियत को - कि जो लोग संघर्ष करके नियमित थियेटर कर रहे हैं, उन्हें छोडकर इस रंग-कला के मंच से टी.वी-फिल्म के उन स्टारों को सम्मानित करना बेमानी है, जो बीसों वर्षों से थियेटर करने तो क्या, देखने तक नहीं आते। यह बात तो सबके मन में चल रही थी, पर उनके कह देने के बाद खुल सकी और तभी मैं इसी उक्त वाक्य को अपने लेख का शीर्षक बनाकर आसानी से उजागर कर सका...।

 

 

ऐसा सब देख लेने की तेज़ नज़र उनके पास थी, जिससे वे नये से नये नाटककार-निर्देशक के काम को देखते ही नहीं, बडी सटीक व स्पष्ट प्रतिक्रिया भी देते थे। उनकी इस नज़र व सक्रियता का कायल रहा है यह ज़माना और जिसके चलते वे थियेटर-जगत में चलती हर कारग़र गतिविधि को जान लेते थे। फिर करणीय को करने का भी भरसक प्रयत्न करते थे। जब वे असाध्य रोग से ग्रस्त होकर पूना के प्रयाग अस्पताल में पडे थे, मुम्बई के मराठी रगपटल पर घटी एक घटना को लेकर उससे सम्बद्ध रंगकर्मी को फ़ोन करके पूना बुलाया। अपनी प्रतिक्रिया तो व्यक्त की ही, अपने प्रतिकार का निर्णय भी सुनाया - उस संगठन से वे कभी सक्रिय रूप से जुडे थे। यह सुनकर मैं उनकी प्रतिबद्धता व सरोकार को बस, सलाम ही कर सका। इसके चन्द दिनों बाद ही उनका अवसान भी हो गया...।

 

ऐसी ही तेज़ नज़र, ऐसी ही सरोकारजन्य प्रतिबद्धता और इससे अधिक बेबाकी से बने हैं तेन्दुलकरजी के नाटक। हर नाटक किसी ज्वलंत सामाजिक समस्या से बावस्ता हैं। पुरुष व उच्च वर्ग द्वारा निर्मित समाज में मुख्यत: नारी व अंशत: पिछडों के साथ होते अत्याचार उनके नाटकों के मुख्य स्वर रहे हैं। एक तरह की राजनीतिक चेतना का धागा सबमें पिरोया हुआ देखा जा सकता है। और सेक्स का आधार व मारक आक्रामकता (हिंसा) का नाट्यमय व्यवहार इस स्वर के स्वरूप व दिशा के नियामक होते हैं। श्रीमंत में कुमारी के माँ बनने की समस्या है, तो गिधाडे में इसके साथ अन्यान्य पेचीदे मसले भी हैं। दोनो ही प्रतिष्ठित उच्च वर्गीय परिवार से बावस्ता हैं। अंजी में सयानी व अपने पैरों पर खड़ी लड़की की शादी को लेकर, तो ख़ामोश,  अदालत जारी है में एक स्त्री के स्वातंत्र्य को लेकर पूरे समाज की ख़बर ली गयी है। इसी को कुत्ते में अलग तरह से उठाया गया है।

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