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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

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।। प्रसंगवश ।।

 

 

ठाकरे परिवार : यह कैसी देशभक्ति


निर्मल रानी

 

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अर्थात् 1857 से लेकर स्वतंत्रता के वर्ष 1947 तक के लम्बे सफ़र में देश के नेताओं ने भारत माता की स्वतंत्रता हेतु क्या कुछ बलिदान नहीं दिया। 1857 में फूटी स्वतंत्रता की चिंगारी का असर 1930 के पश्चात नज़र आना शुरु हुआ। उस समय यह महसूस होने लगा था कि भारत की स्वतंत्रता के दिन अब दूर नहीं हैं। हम कह सकते हैं, हो सकता है कि 1930 के बाद राजनीति में सक्रिय विशेषकर आज़ादी की लड़ाई में कूदने वालों का उद्देश्य कहीं-न-कहीं स्वतंत्र भारत की सत्ता में साझीदारी करना भी रहा हो। परन्तु महारानी लक्ष्मी बाई जैसे आज़ादी के उन मतवालों को देशभक्तों की किस श्रेणी में डाला जाए जिन्होंने कि अपनी सत्ता, अपना राजपाट सब कुछ देश की आज़ादी के लिए न्यौछावर करते हुए अँगरेज़ी शासन के विरुद्ध अपनी तलवारें म्यान से बाहर निकाल लीं थीं। इन आज़ादी के मतवालों को मज़बूत ब्रिटिश फ़ौजों से लड़ने के परिणामस्वरूप मौत के सिवा आख़िर और कुछ नहीं हासिल होने वाला था फिर भी इन्होंने स्वतंत्रता की वह बुनियाद डाली जिसपर आज स्वतंत्र भारत गर्व महसूस करता है। ऐसे थे 150 वर्ष पूर्व के वे देशभक्त जिन्होंने भारत माता की स्वतंत्रता के संग्राम को अपने लहु से सींचा तथा इसी संघर्ष के सिलसिले को आगे बढ़ाने वाली अपनी भावी पीढ़ी हेतु 1947 में सत्ता तक पहुँचने का रास्ता हमवार किया।

             

अब नज़र डालिए आज के तथाकथित देशभक्तों पर और ग़ौर फ़रमाईए सत्ता तक पहुँचने के उनके तीसरे दर्ज़े के हथकण्डे। बाल ठाकरे, भारतीय राजनीति में क्षेत्रवादी राजनीति करने वाले उस नेता का नाम है जिसने शिवसेना नामक एक क्षेत्रीय राजनैतिक दल का गठन कर मुम्बई में उत्तर भारतीयों के विरोध का प्रदर्शन कर अपनी आवाज़ बुलंद की थी। कितने आश्चर्य की बात है कि उत्तर भारतीयों के विरोध का प्रदर्शन कर मराठों के प्रति अपना प्रेम दर्शाने वाला ठाकरे परिवार स्वयं भी मराठी नहीं है। बताया जाता है कि बाल ठाकरे के पिता कामकाज की तलाश में अपने मध्य प्रदेश स्थित पैतृक निवास से कूचकर मुम्बई पहुँचे थे। बाद में वे मुम्बई के ही होकर रहे गए। मुम्बई में रहकर तथा वहीं पल बढ़कर उनके पुत्र बाल ठाकरे ने जहाँ और अनेक विशेषताएँ अर्जित कीं, वहीं उन्होंने बाँटो और राज करो की राजनीति का भी गहरा पाठ पढ़ा। पहले हिन्दुत्व और फिर मराठों का हमदर्द बनते हुए उन्होंने सपरिवार मराठा रूप धारण कर लिया और बन बैठे मराठों के स्वयंभू एकछत्र रहनुमा।

             

सत्ता को केंद्रित करते हुए बाल ठाकरे द्वारा अपनी व्यापक राजनीति की शुरुआत शिवसेना के बैनर तले शुरु की गई। शिवसेना पहले तो महाराष्ट्र में साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाकर साम्प्रदायिक आधार पर मत विभाजन कराने जैसे दुष्प्रयासों में लगी रही। परन्तु जब यह फ़ार्मूला भी ठाकरे को पूरी तरह रास न आया तब उन्होंने केवल मराठा हितों की बातें करनी शुरु कर दीं। महाराष्ट्र राज्य विशेषकर मुम्बई में आने वाले उत्तर भारतीयों का विरोध किया जाने लगा। उनके व्यवसाय को निशाना बनाया जाने लगा। बाल ठाकरे से प्रेरणा प्राप्त उनके भतीजे राज ठाकरे ने भी अपने राजनैतिक अस्तित्व को मराठा हितों की पैरवी तथा उत्तर भारतीयों का विरोध करने में ही सुरक्षित समझा। अभी कुछ माह पूर्व तो इसी ठाकरे परिवार की इन्हीं विभाजनकारी हरकतों की वजह से ऐसा महसूस होने लगा था कि गोया भारत की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुम्बई नगरी पर ग़ैर मराठियों का कोई अधिकार ही न हो। मुम्बई में बसे अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा मुम्बई छोड़कर चले जाने की बातें की जाने लगी थीं। अमिताभ बच्चन जैसे महान अभिनेता के मुम्बई निवास पर दो बार शरारती तत्वों द्वारा काँच की बोतल फेंके जाने की घटना अन्जाम दी गई। अनेकों मेहनतकश कामगारों की मात्र इसलिए पिटाई की गई क्योंकि वे उत्तर भारतीय थे। परन्तु मराठों को भड़काने की ठाकरे परिवार की यह ज़हरीली योजना अधिक दिन तक नहीं चल सकी। अब इस नकारात्मक, घटिया एवं तीसरे दर्ज़े की ओछी राजनीति के मंथन का परिणाम क्या निकला, यह महाराष्ट्र में होने वाले भविष्य के चुनावों के पश्चात ही पता लग सकेगा।

             

राजनैतिक विशेषकों का मानना है कि बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने चूँकि राजनीति के गुण अपने चाचा बाल ठाकरे से ही सीखे हैं, अत: शिवसेना से विद्रोह के पश्चात राज ठाकरे ने अपनी जिस नई पार्टी (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) का गठन किया, उसने भी बाल ठाकरे के ही अंदांज़ में केवल मराठा हितों तक अपनी राजनीति सीमित रखी हुई है। ऐसे में बाल ठाकरे का चिंतित होना ज़रूरी था। इसलिए बाल ठाकरे ने अब अपनी राजनीति को एक बार फिर मराठा हितों से ऊपर उठाते हुए इसे हिन्दुत्ववादी राजनीति तक फैलाने का पुन: प्रयास शुरु कर दिया है। परन्तु इस बार सत्ता पर निशाना साधने की उनकी तरकीब अत्यन्त निराली और अफ़सोसजनक है। पहले भी कई बार हिन्दू समुदाय को आत्मघाती दस्ते बनाने की सलाह देने वाले बाल ठाकरे ने कुछ दिन पूर्व इस विषय पर अत्यन्त मुखरित होकर अपनी यही बात दोहराई है। भारत में आतंकवादियों द्वारा अंजाम दी जाने वाली हिंसक घटनाओं के जवाब में बाल ठाकरे हिन्दू समुदाय द्वारा भी आत्मघाती दस्ते गठित किए जाने की ज़ोरदार हिमायत कर रहे हैं। ठाकरे का मानना है कि यही एक तरींका ऐसा है जिससे कि आतंकवादियों को जवाब दिया जा सकता है। तथाकथित स्वयंभू मराठा भक्त एवं उत्तर भारतीयों को गिरी नज़र से देखने वाले यह बहुरूपिये नेता देश के शांतिप्रिय हिन्दू समाज से यह उम्मीद करते हैं तथा उन्हें इस बात के लिए उक्साते हैं कि वे आत्मघाती दस्तों का गठन करें तथा देश में रह रही मुस्लिम आबादी को अपना निशाना बनाएँ।

             

प्रश्न यह है कि भारत के किसी हिन्दू अथवा किसी मुसलमान नेता अथवा किसी अन्य राजनैतिक संगठन द्वारा क्या कभी किसी भी आतंकवादी घटना की हिमायत की गई है? भारत में क्या किसी ने आज तक किसी आत्मघाती दस्ते के गठन या उसकी अमानवीय कार्यप्रणाली को उचित ठहराया है? फिर आख़िर मराठा हितों की तथाकथित रूप से रक्षा करने का दम भरने वाले बाल ठाकरे को यह अधिकार किसने दे दिया कि वे उत्तर भारतीयों सहित पूरे देश के हिन्दुओं का आत्मघाती दस्ते बनाने हेतु आह्वान करे? और वह भी भारत में रहने वाले देशभक्त मुस्लिम भाईयों का ख़ून बहाने के लिए? और वह भी इस शर्त पर कि हिन्दू परिवार का सदस्य आत्मघाती बम के रूप में पहले अपने शरीर के चिथड़े करे फिर वह अन्य भारतवासियों की जान ले?

             

समाज में साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाकर सत्ता का सफ़र तय करने के बाल ठाकरे के इस घिनौने प्रयास पर टिप्पणी करते हुए एक वरिष्ठ स्तम्भकार ने बिल्कुल ठीक ही लिखा है कि यदि बाल ठाकरे को आत्मघाती दस्ते बनाने ही हैं तो वे इसकी शुरुआत सर्वप्रथम उद्धव ठाकरे के रूप में पहले आत्मघाती मानव बम के रूप में क्यों नहीं करते। और दूसरे यह कि यह आत्मघाती दस्ते कश्मीर जैसे उन स्थानों पर प्रयोग में लाए जाने चाहिए जहाँ आतंकवादियों के प्रशिक्षण शिविर चल रहे हों तथा आतंकवादी सामूहिक रूप से रह रहे हों। वास्तव में यदि ठाकरे ऐसा कर पाने का साहस दिखाएँ फिर तो उन्हें देशभक्ति में सराबोर नेता माना भी जा सकता है अन्यथा उनके इस आह्वान को दूसरों की जान पर खेलते हुए सत्ता पर नज़र रखने वाले एक ओछे और घटिया आह्वान के सिवा और कुछ नहीं कहा जा सकता।

   निर्मल रानी

1630/11,महावीर नगर, अम्बाला शहर, हरियाणा  

 

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