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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

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।। प्रसंगवश ।।

 

 

आतंकवाद विरोधी फ़तवा और उसकी सार्थकता


तनवीर जाफ़री

     

ज जबकि 'इस्लामिक आतंकवाद', मुस्लिम आतंकवाद व जेहादी जैसे शब्द अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा भरपूर तरीक़े से प्रचारित व प्रसारित किए जा रहे हैं, दुनिया के मुसलमानों को विशेषकर मुस्लिम धर्मगुरुओं को भी इस्लाम धर्म व मुसलमानों की बदनामी का एहसास होने लगा है। ऐसे समय में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम विद्वानों तथा प्रमुख मुस्लिम व इस्लामिक संगठनों द्वारा देर से ही परन्तु आतंकवाद के विरुद्ध लामबंद होने के गंभीर प्रयास शुरु कर दिए गए हैं। इसी वर्ष फ़रवरी माह में भारत के देवबंद में स्थित विश्व के सबसे प्राचीन इस्लामिक विश्वविद्यालय दारुल उलूम के आह्वान पर अखिल भारतीय इस्लामिक मदरसा एसोसिएशन द्वारा एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में पूरे भारत से लगभग 20000 इस्लामिक शिक्षकों, छात्रों व मौलवियों ने भाग लिया था। भारत में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर मुसलमानों द्वारा इकट्ठे होकर आतंकवाद के विरुद्ध अपने विचार रखे गए थे। कहा जाता है कि अफ़ग़ानिस्तान में प्रभावी तालिबानी विचारधारा देवबंद स्थित दारुल उलूम से ही प्रेरित है। ऐसे में जबकि तालिबानी विचारधारा को विश्व में आतंकवाद के एक पर्याय के रूप में देखा जा रहा हो। ऐसे में जबकि आज भी तालिबानियों के बर्बर आतंकवाद के क़िस्से सुनाई दे रहे हों, ऐसे समय में दारुल उलूम देवबंद द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध फ़तवा जारी किया जाना, आतंकवाद को ग़ैर इस्लामी बताया जाना तथा बेगुनाह लोगों की हत्याओं को इस्लाम व क़ुरान शरीफ़ की शिक्षाओं के विरुद्ध बताया जाना, शांतिप्रिय विश्व के लिए एक अच्छी ख़बर थी।

             

ज्ञातव्य है कि भारत विश्व की सबसे बड़ी मुस्लिम जनसंख्या वाला देश है। अत: इस देश में अन्तर्राष्ट्रीय मुस्लिम संगठनों द्वारा दिए जाने वाले फ़तवों का उस वर्ग विशेष के अनुयाईयों पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव पड़ना सम्भावित है। यही वजह है कि फ़रवरी में दारुल उलूम द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध जारी किए गए फ़तवे का वहीं अन्त नहीं हो गया। बल्कि भारत में आतंकवाद के विरोध का यह सिलसिला राष्ट्रीय स्तर पर अब भी जारी है। पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में दो अलग-अलग स्थानों पर अल्पसंख्यकों विशेषकर मुस्लिम संगठनों द्वारा आतंकवाद विरोधी दो बड़े आयोजन किए गए। इनमें से एक आयोजन में ऑस्ट्रेलिया में आतंकवादी होने के संदेह में गिरफ़्तार किए गए भारतीय मूल के डॉ मोहम्मद हनीफ़ ने भी शिरकत की। डॉ हनीफ़ सहित अनेक ज़िम्मेदार भारतीय मुसलमानों ने सामूहिक रूप से इस बात पर चिंतन किया कि आख़िर चंद गुमराह मुसलमानों की घिनौनी हरकतों से पूरा इस्लाम धर्म किस प्रकार बदनाम हो रहा है। और इन्हीं आतंकवादी घटनाओं के परिणामस्वरूप दुनिया का आम मुसलमान आख़िर कैसे प्रभावित हो रहा है। दिल्ली में आयोजित किए गए इन सम्मेलनों में भी आतंकवाद की जमकर निंदा व भर्त्सना की गई तथा आतंकवादी घटनाओं को ग़ैर इस्लामी व ग़ैर इन्सानी क़रार दिया गया। मुस्लिम विद्वानों द्वारा यह साफ़तौर पर कहा गया कि आतंकवादी घटनाओं का इस्लामी शिक्षा से कोई लेना देना नहीं है।

             

भारत में आयोजित आतंकवाद विरोधी इस सम्मेलन का पाकिस्तान के भी कई इस्लामिक संगठनों द्वारा स्वागत किया गया। परन्तु अभी दिल्ली में जमीअत-उल-उल्माए हिन्द द्वारा जारी किए गए आतंकवाद विरोधी फ़तवे की गूँज समाप्त भी नहीं हुई थी कि दिल्ली में फ़तवा जारी करने के दो दिन बाद ही पाकिस्तान में डेनमार्क दूतावास के बाहर आतंकवादियों द्वारा एक कार में भीषण बम विस्फ़ोट किया गया। जिसके परिणामस्वरूप 8 लोग मारे गए जबकि अनेक के घायल होने के समाचार हैं। आख़िर इस आतंकवादी घटना या इन जैसी भविष्य में होने वाली आतंकवादी घटनाओं को आतंकवाद विरोधी फ़तवों के परिपेक्ष्य में कैसे समझा जाना चाहिए। क्या यह फ़तवे आतंकवाद को क़ाबू कर पाने में प्रभावी साबित होंगे। या फिर इन फ़तवों को इस्लाम को बदनामी से बचाने का एक उपाय मात्र माना जाए।

             

दरअसल आतंकवादी सरगना भी तथाकथित धर्मगुरुओं का ही रूप धारण कर चुके हैं या अनेक कट्टरपंथी तथाकथित धर्मगुरु स्वयंभू तरीक़े से आतंकवादियों के संरक्षक बन बैठे हैं। उदाहरण के तौर पर ओसामा बिन लाडेन, ऐमन अल जवाहिरी तथा कभी-कभी सद्दाम हुसैन भी मुस्लिम जगत को सम्बोधित करते हुए फ़तवा जारी करते दिखाई देते थे। आख़िर किस हैसियत से यह स्वयं को दुनिया के मुसलमानों का रहबर समझते थे या समझते हैं? इन्हें आख़िर क्या अधिकार था कि किसी राजनैतिक युद्ध को यह धर्मयुद्ध या इस्लामी जेहाद का नाम दे दें? लाडेन, जवाहिरी अथवा मुल्ला उमर द्वारा अमेरिकी विरोध के नाम पर बेगुनाह लोगों की हत्या कराए जाने का अधिकार आख़िर उन्हें किसने दे दिया। समय-समय पर यह आतंकवादी सरगना इस्लामी धर्मगुरु के वेश में गुप्त वीडिया के माध्यम से मुस्लिम जगत का आख़िर क्योंकर आह्वान करते दिखाई देते हैं। ऐसे शीर्ष आतंकवादी तथा शीर्ष आतंकवादी संगठनों के सरगना भारत में जारी किए गए इन फ़तवों से क्या सीख लेंगे, यह एक विचारणीय प्रश्न है।

             

अमेरिकी नीतियों से मतभेद रखना केवल मुस्लिम आतंकवाद की ही विचारधारा नहीं है। दुनिया के अनेक शांतिप्रिय देश तथा शांतिप्रिय नेता व संगठन, यहाँ तक कि कई पश्चिमी देश भी  अमेरिकी उप साम्राज्यवादी नीतियों के विरोधी हैं। परन्तु इसका अर्थ यह क़तई नहीं है कि अपने अमेरिकी विरोध को 9/11 जैसी घटना जैसे भयानक हादसे तक ले जाया जाए। आतंकवादी संगठनों विशेषकर अलक़ायदा नेताओं द्वारा 9/11 के हमले को भले ही अमेरिकी स्वाभिमान पर किया गया प्रहार क्यों न बताया गया हो परन्तु इस्लामी शिक्षा ऐसे किसी हमले को जायज़ नहीं ठहराती जिसके परिणामस्वरूप बेगुनाह लोग अपनी जान गँवा बैठें। लिहाज़ा 9/11 की घटना भी एक बड़ी आतंकवादी घटना थी तथा यह भी वैसी ही ग़ैर इस्लामी आतंकवादी घटना थी जैसी कि भारत व पाकिस्तान जैसे देशों में प्राय: देखने को मिलती हैं। अत: आतंकवाद विरोधी फ़तवों के अन्तर्गत सभी ऐसी आतंकवादी घटनाएँ शामिल हैं जिनमें बेगुनाहों को निशाना बनाए जाए या जिसके परिणामस्वरूप बेगुनाह लोग मारे जाएँ।

             

यहाँ फिर एक सवाल यह पैदा होता है कि आख़िर 9/11 के आरोपियों द्वारा सज़ा-ए-मौत दिए जाने की माँग क्यों की जा रही है। गुवान्तानामो जेल में क़ैद 9/11 हादसे के अपराधियों द्वारा यह कहते हुए मृत्युदंड की माँग की गई है कि ऐसा होने पर उन्हें 'शहीद' का रुतबा हासिल होगा तथा उनके अनुसार यह 'शहादत' के बाद भी जन्नत के ही हक़दार होंगे? कट्टरपंथी विचारधारा की इसी पराकाष्ठा ने तथा इस्लाम के नाम पर आतंकवाद का परचम बुलंद करने वाले ऐसे ही तथाकथित ढोंगी धर्मगुरुओं व इस्लामिक ठेकेदारों ने इस्लाम को आज दुनिया के सबसे संदेहपूर्ण पंथ के रूप में बदनाम कर रखा है।

             

लिहाजा यदि आतंकवाद विरोधी फ़तवों को सार्थक होते हुए देखना है तो इन स्वयंभू फ़तवा घोषितकर्ताओं को तथा मानवीय अपराधों के बाद भी जन्नत की आरज़ू लिए बैठे हैवान पसन्द लोगों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर प बेनक़ाब करना होगा। मौलाना मसूद अज़हर व इन जैसे तथाकथित धर्मगुरुओं को मुस्लिम समाज द्वारा बहिष्कृत व बेनक़ाब करना होगा जोकि अपने निजी अथवा राजनैतिक लाभ के लिए कभी अमेरिकी विरोध के नाम पर तो कभी स्वयं को सच्चा इस्लाम परस्त बताकर मुस्लिम नवयुवकों को धन व जन्नत की लालच देकर बड़ी से बड़ी आतंकवादी घटना को अंजाम तक पहुँचाते हैं। परिणामस्वरूप इस्लाम, क़ुरान शरीफ़ व इस्लामी शिक्षा सभी कुछ संदेह के दायरे में आ जाता है।

        तनवीर जाफ़री

सदस्य, शासी परिषद,हरियाणा साहित्य अकादमी

22402, नाहन हाऊस, अम्बाला शहर, हरियाणा

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