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दो लघुकथाएं
नंदलाल
भारती
राखी
मम्मी चाचा का
गाँव से फ़ोन है कहते हुए रागिनी फोन अपनी मम्मी शोभा के हाथ
में थमी दी।
शोभा-प्रेम बाबू
रोशनी बीटिया की राखी नही भेजे क्या । उसके तीनों बडे भाई जान
खा रहे हैं । कह रहे हैं रोशनी की राखी नही आयी ।
प्रेमबाबू-भेजी
तो है पन्द्रह दिन पहले । भौजी रोशनी की माँ से बात करो ।
रोशनी की माँ
सुधा- दीदी क्यो नाराज़ हो रही हो । बडी दीदी तो बोल रही थी कि
भाई साहेब का पता ठिकाना उनके पास नही है । कैसे राखी भेजती ।
रोशनी ने तो भेज दी है ।
शोभा-क्या जब
ज़रूरत पडती हैं तो पता मिल जाता है । राखी भेजने के लिये पता
नही है । वाह रे ननद लोग। भाई बहन का तो यही एक उत्सव होता है
जिससे भाई बहन के स्नेह की डोर और मज़बूत होती है । इस पवित्र
त्यौहार की याद ना आयी । जिन भाइयों की बहनें नहीं वे रो रहे
हैं । जिन बहनो के भाई है उन बहनों को याद ही नहीं ।
सुधा-दीदी राखी
का शौक तुमको भी चढ गया ।
शोभा-होश में तो
हैं सुधा । भाई बहन के इस पवित्र त्यौहार को शौक कह रही है ।
तुम अपने भाइयों को राखी नही बांधती क्या कहते हुए फ़ोन रख दी
।
परदेशी
सफ़ेद
की
कालिख
तो
जगजाहिर
हो
चुकी
है।
अब
ये
कालिख
रिश्तों
की
जडों
तक
पहुँचने
लगी
है।
नतीज़न
परिवार
टूटने
लगे
हैं।
विश्वास कमज़ोर
होने
लगा
है....
-चिन्ता
जाहिर
करते
हुए
कालीचरण
बाबू
जर्जर
सोफ़े
में
धँस
गये
। कालीचरण
बाबू
की
हाँ में
हाँ
मिलाते
हुए
ध्यानचरण
बाबू
बोले
-
लाख
टके
की
बात
कह
रहे
हो
बाबू । मुझे
ही
देखो
उम्मीद
के
आक्सीजन
पर
ही
तो
जी
रहा
हूँ । नन्हीं-सी
नौकरी,
घर
परिवार
की
बडी-बडी
ख़्वाहिशें,
महँगाई
की
त्रासदी,
बच्चों
की
पढाई,
खान
-ख़र्च
का
भारी
भरकम
बोझ
इन
सबके
बावजूद
पेट
काटकर
घर
परिवार
को
देखने
के
बाद
भी
गाँव
घर
परिवार
को
अविष्वास
का
भूत
पकडे
ही
रहता
हैं
।
वे
सोचते
है
शहर
जाकर
स्वार्थी
हो
गया
हैं
। बेचारा
परदेसी
शहर
में
अकेला मुश्किलों
से
जूझता
है। बडी
मेहनत
के
बाद
तनख्वाह
मिलती
हैं
और
पन्द्रह
दिन
के
बाद
उधारी
पर
काम
चलने
लगता
है। क्या
बाल
बच्चो
को
भूखे
रखकर
हर
महीने
मनिआर्डर
करना
ही
अपनापन
है
।
कालीचरण
बाबू-
परदेसी
की
पीडा
को
गाँव
घर
परिवार
वाले
कहाँ
समझते
हैं
।
उनकी
रोज़-रोज़
की
माँगों
की
पूर्ति
करते
रहो
पेट
में
भूख
लेकर
तब
श्रवणकुमार
हो
वरना
नालायक
।
ध्यानचरण-गाँव
घरपरिवार वालो को परदेसी के दर्द को समझना होगा। तभी रिश्ते का
सोंधापन बरक़रार रह पायेगा । गाँव से हज़ारों किमी दूर परदेसी
वनवासी का जीवन जीता है। इसके बाद भी परदेसी के दर्द को लोग
नही समझते बस रूपया रूपया रूपया........।
कालीचरण-कुटुम्ब
के लिये त्याग करना तपस्या है भइया ।
ध्यानचरण- कुटुम्ब के लोग परदेसी के दर्द को समझे,
विश्वास करे तब ना ।
नंदलाल भारती
आज़ाददीप-15, एम, वीणानगर,
इंदौर, म.प्र. - 452010
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