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विश्वास
स्वर्ण
ज्योति
एक
समय की बात है,
पाँच गहरे दोस्त थे। जिनमें एक हिन्दु,
एक मुसलमान,
एक ईसाई और एक सिख धर्म का अनुयायी था। पर पाँचवा दोस्त किसी
भी धर्म का अनुयायी नहीं था। शेष चार दोस्त उसे नास्तिक कह कर
चिढाते थे पर वह हँस कर टाल देता था। यूँ तो सभी
अलग-अलग धर्म को मानने वाले थे पर उनकी दोस्ती पर इसका प्रभाव
नहीं के बराबर था।
अपने-अपने समयानुसार सब अपनी-अपनी प्रार्थना करते अपने-अपने
धर्म और कर्म के प्रति निष्ठावान थे। फ़ुरसत के समय मिल-जुल कर
रहते और समय बिताते थे। पाँचवा दोस्त जो किसी धर्म को नहीं
मानता था उससे भी उन चारों की बहुत निभती थी। इसी प्रकार दिन
गुज़रते गए।
पर समय हमेशा एक-सा नहीं रहता है । किसी बात पर उन चारों में
वाद-विवाद प्रारंभ हुआ और वह विवाद बढ़ते-बढ़ते इस हद तक बढ़
गया कि उनकी दोस्ती में दरार पड गई और वे चारों अलग-अलग हो गए।
पाँचवा दोस्त सभी को समझाता पर उसकी कोई नहीं सुनता।
उसने हिन्दु के पास जाकर कहा" भाई नाराज़ क्यों होते हो आख़िर
वे भी तो भगवान को मानते हैं उनकी राह भी तो मुक्ति पाने की ही
है कृष्ण भगवान ने भी तो यही कहा कि कर्म करो शेष मुझ पर छोड
दो तब हिन्दु ने चिढकर कहा" नाराज़ क्यों न रहूँ आख़िर वे
अपने-आप को समझते क्या हैं मेरे भगवान को पत्थर कहते हैं पर
तुम तो चुप ही रहो क्यों कि तुम्हें धर्म के विषय में कुछ
जानकारी नहीं है।
यह सब सुनकर वह अपने सिख दोस्त के पास गया और कहा" पापाजी
गुस्सा थूक दो उनकी क्या ग़लती है अपने-अपने धर्म को सभी मान
देते हैं"
सिख ने नाराज़ होकर कहा" गुस्सा कैसे थूक दूँ मेरे बाबा पर
मेरा भरोसा यूँही नहीं है उन लोगो को समझना चाहिए पर तुम तो
कुछ न ही कहो तुम क्या जानो बाबा की महिमा"
इस बार वह अपने मुसलमान दोस्त के पास गया और बोला" भाई साहब
इतने ख़फ़ा क्यों हो ख़ुदा के वास्ते सभी को माफ़ कर दो और राजी
हो जाओ"
इतना सुनना था कि उसने सख्त आवाज़ में कहा "कैसे माफ़ कर दूँ,
उन लोगो की औक़ात ही क्या है ख़ुदा की इबादत कोई खेल नहीं है
दीन-ओ-ईमान की बाज़ी लगाने पर ही ख़ुदा मेहरबान होता है पर तुम
क्यों उनकी इतनी हिमाक़त कर रहे हो तुम्हें तो ख़ुदा की ख़ुदाई
पर यकीं ही नहीं है"
आख़िर में वह अपने ईसाई दोस्त के पास गया और कहा " बिग ब्रदर
इतने परेशान क्यों होते हो जिस तरह ईसा ने ख़ुद को सलीब पर
चढाने वालों को भी माफ़ कर दिया उसी तरह तुम भी अपने दोस्तों को
माफ़ कर दो"
इस पर उसने कहा" कैसे माफ़ कर दूँ मैं ईसा जैसा महान नहीं हूँ
उन्होंनें ईसाई धर्म पर प्रश्न उठाया है पर तुम्हें इस से क्या
तुम को क्या मालूम"
चारों ने उसे डाँट कर भेज दिया। पर उनमें से किसी को भी यह
ध्यान में नहीं आया कि उसने सभी धर्मों के विषय में सभी के
भगवान के विषय में बातें की हैं जब कि वे समझते थे कि उसको कुछ
भी जानकारी नहीं है। उसी दिन अचानक से वे चारों दोस्त राह में
मिले तो अनजाने में ही चारों अपनी नाराज़गी भूल कर इस बात पर
चर्चा कर बैठे कि उनका पाँचवा दोस्त उन्हें समझाने आया था। सभी
एक स्वर में बोले पर उसे क्या मालूम धर्म के विषय में?
पर अचानक उन्हें ख्याल आया कि उसने धर्म की बातें ही की है तब
वे उसके पास गए और पूछा " भाई तुम तो किसी धर्म को नहीं मानते
फिर कैसे हमें धर्म की बातें समझाने आए?
इस पर उसने कहा
भाई यह सच है कि मैं किसी भी एक धर्म को नहीं मानता पर मैं एक
ऐसी शक्ति को मानता हूँ जो सर्वोपरि है जिस पर मैं विश्वास
करता हूँ उसका कोई रूप या धर्म मैंने नहीं माना है। मैं इस बात
पर विश्वास करता हूँ कि एक ऐसी शक्ति है जो सारे ब्रह्मांड को
चला रही है। मदर मेरी के साथ दुर्गा को भी मानता हूँ मेरी
दृष्टि में दोनों ही माँ हैं इसी तरह गुरुग्रंथ साहेब के साथ
साई बाबा को भी मान देता हूँ क्योंकि दोंनों ही गुरु हैं।
अब तुम कृष्ण कहो,
ईसा कहो,
गुरु कह लो या अल्ला कहो तुम्हारी मर्जी। पर तुम सब भी इसी
ब्रह्मांड के कर्त्ता-धर्त्ता की ही तो बात करते हो। इसी जीवन
की,
इन्हीं कष्टों की और इन सब से मुक्त होने की चाह में ही तो
आरती-पूजा करते हो प्रार्थना करते हो नमाज पढते हो और गुरुबानी
गाते हो। गीता हो या कुरान,
गुरु ग्रंथ साहेब हो या बाइबिल सभी का सार एक ही तो है। मेरे
लिए विश्वास ही सबसे बडी ताक़त है उस परम शक्ति में विश्वास जो
इस सारे जीवन को निर्देशित करता है । बही मेरा भगवान है। मैं
मानता हूँ अहं ब्रह्मास्मि कि प्रत्येक इंसान भगवान है भगवान
स्वयं उसके भीतर ही वास करता है उसपर विश्वास करना ही भगवान है
विश्वास ही भगवान है"।
इतना सुनना था कि चारों को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उन
लोगों ने उससे अपने दुर्व्यवहार के लिए माफ़ी माँगी और सभी अपने
सारे गिले-शिकवे भूलकर एक हो गए और पहले की भाँति दोस्त बन गए
।
स्वर्ण ज्योति
पांडिचेरी
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