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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। बाल कविता ।।

 

 

जग जा तू

 

मुर्गा करता कुक - डूं - कूं

भोर हुई अब जग जा तू ।

बच्चे बोले, अरे सोने दे

हमें सपनों में खोने दे ।

शोर मचाता है तू क्यों ?

चिड़िया गाती चीं-चीं-चीं ।

खुशियों से जी भर लो जी

बच्चे बोले चुप हो जा

सोने दे हमें जा-जा-जा

मुर्गा तो शोर मचाती है

बाज़ न आए क्यों तू भी ?

कउआ बोला काएँ-काँए

सोया पडा है हाय-हाय

अब तक़दीर तुम्हारी सो जाएगी

कर देगी तुम्हें बाय-बाय

बच्चे बोले न-न-न

भैय्या ऐसा करना न

ताजा तन और मन पायेंगे

बस माफ़ हमें तू कर दे न ।।

तोता बोला टाएँ-टाएँ

चलो अपने-अपने काम पे जाएँ

जग के ज़ल्दी सुबह सवेरे

ताज़ा तन और मन पाएँ

स्कूल में पढना एबीसी

बात जो मेरे साथी बतलाएँ

चलना इन पे न टलना जी ।।

   सुशील कुमार पटियाल

गाँव मसलाणा खु्र्द, डाक घर झञ्जियाणी

तहसील बडसर, जिला हमीरपुर

हिमाचल प्रदेश - १७४३०५

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