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आस्ट्रेलिया आने के नुस्खे
हरिहर
झा
“भारत तो भारत है; वो
आनन्द आस्ट्रेलिया में कहाँ ? अब ये
भौतिक समृद्धि कहाँ इन्सान को सुखी रख पाती है?” मेरे मित्र कहे
जा रहे थे । मुझे सुन कर बड़ा आनन्द आता अगर यह बात दिल से
निकली होती ।
"तो वहाँ वापस बस जाने में
कोई परेशानी है?" मैं पूछ बैठा । उन्होंने
मुझे घूर कर देखा क्योंकि उनकी बात केवल बिना सोचे-समझे हाँ
में हाँ मिलवाने के उद्देश्य से कही गई थी । कुछ सोंच कर बोले
"फिर
यहाँ पर बच्चों का,
घर के मोर्टगेज का क्या होगा ?"
मैंने बात बढ़ाना उचित न समझा
। भले मित्र हो, व्यक्तिगत जीवन पर सवाल उठाना
यहाँ
वैसे भी अशिष्ट समझा जाता
है पर इतना तो सत्य है कि जितनी हिम्मत उन्होने
यहाँ
बसने में दिखाई उसके
दस
प्रतिशत प्रयास में
वे भारत में फिर से बस सकते हैं ।
"यहाँ आकर बड़ा दुखी हो गया
हूँ,
भारत की बहुत याद आती
है..” मेरे एक अन्य मित्र प्राय: यही
कहते हैं ।
“जैसे कि….आपका सबसे बड़ा
दुख क्या है?” एक दिन मुझसे रहा न गया। “पैरेन्ट्स को बड़ा मिस
कर रहा
हूँ|” एक अमोघ
शस्त्र - जिसके आगे हथियार डाल देने के सिवा कोई चारा नहीं।
यह अपने आप में कितनी अच्छी बात है ! माता पिता को याद करना!
अब इन महानुभाव को क्या पता कि इनके पिताजी ने मुझे
फ़ोन
करके बताया था
-
उनके लाड़ले बेटे सादा जीवन
गुजारने लायक भी पैसा नहीं भेजते। यह बात वह अपने बेटे से करने
में इसलिए
डरते हैं कि बेटा
नाराज़ होकर
फ़ोन
काट देता है।
“भारत कितना आध्यात्मिक देश
है! मेरा तो दिल करता है
-
मैं
वहाँ
जाकर मन्दिर में पूजापाठ
करके जीवन बिता
दूँ
“ एक परिचित से सुन कर मेरा
तो मुँह खुला का खुला रह गया
! आफ़िस
के काम के बाद भी शेर बाज़ार
के पचड़ों से जिसे एक मिनिट की
फ़ुर्सत
न मिलती हो उससे ऐसी बात अच्छी नहीं लग रही थी!
आफ़िस
का मामला तो खेर रोज़ी-रोटी
का है उसके बाद इन्हे पूजा-पाठ करने से किसने रोका है?
“भई यहाँ आकर तो जैसे सोने
के पिंजड़े में
क़ैद
हो गये हैं ।“ मुझे उस बूढ़े शेर की कहानी याद आ
गई जिसमें सियार ने
देखा कि शेर तक अन्य जानवरों के आने के निशान तो साफ़
हैं पर वापस लौटने
के नहीं । भारत से प्रतिवर्ष यहाँ आने वालों की संख्या हज़ारों
में है पर वापस जाकर भारत बसने वालों की संख्या नगण्य है । (वह
भी हैं वे लोग जो
यहाँ
पर नौकरी नहीं जुटा पाते ।
) इस कहानी में
फ़र्क
केवल इतना है कि भारत वापस
जाकर बस जाने में बूढ़े शेर की जगह बैठी आस्ट्रेलिया सरकार की
कोई रोक-टोक नही है । क्यों होगी भला ! पर
सिर्फ़
आने वालों का तांता बना हुआ
है ।
साहित्यिक समारोहों में यह
बात खुल कर सामने आती है – फ़िल्मी
ढर्रे पर भारत की दूध-मलाई से ले कर आबोहवा को याद कर जम कर
रोना रोया जाता है । भारत का तो चाँद-सूरज भी
आख़िर
कितना अलग है (!)
जब भारत जाता हूँ तो मुझसे
आस्ट्रेलिया आने के नुस्खे पूछे जाते हैं । यहाँ की कठिनाइयाँ
बताने पर मेरे मित्र
व परिचित समझते हैं मैं उनको जानबूझ कर निराश कर रहा हूँ और
उनकी मदद करना नहीं चाहता । कभी-कभी
हद यह हो जाती है कि कुछ लोग मुझसे आस्ट्रेलिया आने के अवैध
तरीके पूछने का दुस्साहस कर बैठते हैं; इस पर कैसे और कितनी
आक्रामक प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ
मैं सोचता रह जाता
हूँ।
हाँ, इन सबकी ललक और तमन्ना देख
कर रवीन्द्रनाथ टेगोर को याद अवश्य कर लेता हूँ-
“कह रहा है किनारे से नदी
का वह किनारा
इस किनारे पर जमा है क्यों
जगत का हर्ष सारा
यह किनारा किन्तु लम्बी
साँस
ले कर कह रहा है
हाय रे ! हर सुख उस पार ही
क्यों रह गया है ।“
हरिहर झा
2, बिल्बी स्ट्रीट,
मोराबिन,
मेल्बर्न, आस्ट्रेलिया - 3189
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