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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

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।। अपनी बात ।।

 

 

 

।। साहित्य की सदाशयता ।।

पिछले दिनों मुझे 70 वर्षीय एक वयोवृद्ध लेखक की चौंथी किताब के विमोचन-विमर्श समारोह में वक्ता के रूप में जाना हुआ । उनकी किताब पर समीक्षा लेख पढ़ते वक्त मुझे एक ही भय सताये जा रहा था और चिंता भी यह कि क्या सचमुच साहित्य का प्रभाव अब क्षीण या शून्य हो चुका है जो एक अनुभवी लेखक के आत्मकथ्य को इतना तल्खी से लिखने को विवश कर देता है - "सैकड़ों वर्ष से लिखा जा रहा है । सैकड़ों हज़ारों लेखकों द्वारा फटकारा रहा है । फिर भी है कि कहीं कोई ऊभ या चुभ नहीं दिखायी देती ।....."

 

ऐसे कैसे हो सकता है कि साहित्य सामाजिक परिवर्तन का वातावरण न दे सके ?  क्या साहित्य धर्मच्युत हो चुका है ? क्या वह वाग्विलास मात्र है ?  मनुष्य की यात्रा में हमारे भीतर आज जो कुछ भी है, क्या उसमें साहित्य की कोई हिस्सेदारी नहीं है ? हमारा पृथ्वी को माँ कहना, सूर्य को प्रतिदिन बिलानागा जल रितोना, वृक्ष को देवता कहना, हाड़तोड़ मिहनत के बाद सीधे घर की ओर लौटना क्या साहित्य की उपस्थिति और उसकी प्रेरणा का प्रतिफल नहीं है । क्या साहित्य की इतनी भी उपलब्धि नहीं कि हम ऐसे प्रश्नों को खड़े पा रहे हैं एक सभ्य इंसान बनकर......

 

मुझे उनके दुःख में सहभागी होते समय संस्कृत के किसी कवि की कुछ पंक्तियाँ याद आ गई -

एकस्य तिष्ठति कवेगृह एव काव्य -

मनस्य गच्छति सुहृद्भवनानि यावत् ।

 

इसका आशय है - कुछ ऐसे कवि होते हैं जिनकी पहुँच अपने घर-द्वार तक होती है । कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपनी कविताओं को अपने मित्रों तक पहुँचा सकते हैं । इस श्लोक की मीमांसा करें तो बात स्पष्ट हो जाती है कि 'पहुँच' सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है - साहित्य से परिवर्तन में । ऐसे में यह भी क्या स्वाभाविक प्रश्न नहीं होगा कि जब साहित्य लोगों या समाज के मध्य पहुँचेगा ही नहीं तो फिर किस मुँह से उससे परिवर्तन की अपेक्षा रखी जा सकती है ? हम परिवर्तन या सामाजिक परिवर्तन से पूर्व प्रभाव की बात जब करते हैं तो पहले पहुँच का प्रश्न खड़ा होता ही है । जब किसी कवि या रचना की पहुँच ही सार्वजनिक या कारगर नहीं है तो उसका प्रभाव कैसा और क्योंकर सार्वजनिक या कारगर होगा ? जिसकी उपस्थिति श्रवणकर्ता के पड़ोस तक भी नहीं, उसे सुननेवाले क्या स्वर्ग से आयेंगे या स्वतः वे इतनी जादू जानते होंगे कि अपने आप उसके मुखारविंद सुनने पहुँच जायेंगे । रचनाकार का यह आग्रह रोमानी ज़रूर हो सकता है पर उतना ही असंभव, फिर कोरे श्रवण और रसग्रहण दो भिन्न स्थितियाँ हैं ।

 

साहित्य की पहुँच और साहित्यकार की पहुँच को भी बिलगाकर देखा जाना चाहिए । कवि स्वयं में ब्रह्मसहोदर हो सकता है, उसकी कविता नहीं । यह जो ब्रह्मसहोदर का अहं है वह कई-कई बार कविता की गति को बाधित करने लगता है । ब्रह्मसहोदरता यदि कवि को स्वांतः सुखाय का गुमान देता है तो संभव है वह समाज में रहकर भी ब्रह्म की तरह अनुपस्थित माना जाय । और समाज में कवि की ऐसी उपस्थिति का औचित्य को क्या कहें ? हाँ, उसे आत्मचेतस् भी कह सकते हैं किन्तु समाज में उसकी (साहित्य) उपादेयता का जवाब सिफ़र भी संभाव्य है । साहित्य को ब्रह्मांड तक पहुँचाने के उद्यम से यदि साहित्यकार को परहेज है और वह साहित्य को परिवर्तन की कारकता के रूप में भी देखता है तो उसे यह क्षमता पहले अर्जित करनी होगी, जिससे वह अपने साहित्य में सुर्खाव के पर भी उगा सके । पांडुलिपि से मुद्रित या ध्वनित या चाहे किसी भी रूप में तब्दील हुए बिना साहित्य एकाकी भी है, गोया उसमें समाज केंद्रतः क्यों न हो । बादलों का होना और उसका बरसना अलग-अलग क्रियायें हैं - साहित्य बादल हो सकता है पर उसका बरसना भी ज़रूरी है । यह जो साहित्यकार की पहुँच है वह बारिश जैसी है, जो तपन का शमन कर दे, चिरई-चिरगुन की व्याकुलता निःशेष हो जाये, बीज अँकुआ उठे, धरती शस्य श्यामला हो उठे तथा दूर कहीं से आती चिड़िया की चीं-चीं और हलवाहे का गुनगुनाहट में कोई अंतर न रह जाये ।

 

एक अनुभवजन्य उदाहरण अपरिहार्य होगा – मेरा सौभाग्य है कि मैं एक ऐसे सुप्रसिद्ध कवि, उपन्यासकार के पडोस में रहता हूँ, जिस पर समकालीन आलोचना की दुनिया फ़िदा है । बड़ी-बड़ी ( पता नहीं कितनी बड़ी ) साहित्यिक पत्रिकाओं के लगभग अंकों में ये शुमार किये जाते हैं । यह एक बात है । दूसरी बात यह भी कि वे अपने पडोस में ही साहित्यकार के रूप में नहीं पहचाने जाते ना ही इनकी कोई कविता मेरे शहर के किसी गैर साहित्यकार के पास है । वैसे यहाँ भी साहित्य की 'पहुँच' दिखाई देती है पर साहित्यकार की शर्त पर । हो सकता है यहाँ निरक्षरता और पाठकीय संभावना और समझ भी प्रश्नांकित न हो । पर यह कैसे हो सकता है कि कोई वैश्विक पहुँच रखता हो किन्तु उसकी जनपदीय पहुँच लगभग शून्य हो ? और यह भी नहीं तो इतना ज़रूर प्रश्नों के घेरे में आ ही जाता है कि क्या साहित्य अपने धर्म से विचलित हो गया है, क्या वह विशिष्ट वर्गीय यानी कि अभिजात संस्कृति का संवहन में ही आत्ममुग्ध है ? क्या यह निहित वर्ग स्वार्थ का संपोषक नहीं है और इस रूप में वह प्रभुता केंद्रित मूल्यों को अपना अनुसमर्थन नहीं दे रहा है ? वाल्टर बेंजामिन शायद ऐसे ही स्थितियों के लिए कह गये हैं - "सभ्यता का कोई भी ऐसा अभिलेख नहीं है जो साथ ही बर्बरता का अभिलेख न हो ।" तो साहित्य में अभिनवता कारक हो या कुछ और भी, पर साहित्य की 'पहुँच' की एक तस्वीर यह भी है ।

 

जब हम साहित्य से सामाजिक परिवर्तन और उसके सरोकार की सिद्धि पर विमर्श करते हैं तब हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए समाज का क्षेत्र असीमित होता है और प्रभाव्य समय भी अनियत । प्रभुत्वपूर्ण साहित्य वही जो बहुसंख्यक जन को अपने वृत में लपेट ले और यह भी कि वह समय को अतिक्रांत कर शताब्दियों को, सहस्त्राब्दियों को अपनी उपस्थिति से अधिनियमित करता रहे । कबीर, तुलसी, शेक्सपीयर, लियो टालस्टॉय प्रभृति रचनकारों के साहित्य को इसी

 

साहित्य की पहुँच और प्रभाव पर एक रोचक प्रसंग याद आता है । भारत भवन, भोपाल में नई 'कविता की वापसी' पर व्याख्यान था । प्रखर आलोचक नामवर सिंह जी सिद्ध कर रहे थे - नई कविता आ गई, पुनः स्थापित हो कर चारों तरफ़ छा गई.... । व्याख्यान के पश्चात जाने-माने समाजशास्त्री और विचारक प्रो.श्यामाचरण दुबे को एक वरिष्ठ कवि मिल गये, उन्होंने बताया - "देखिए, प्रोफ़ेसर साहब, मैं जो कविता लिखता हूँ उसे कुल आठ लोग समझ सकते हैं ।"

 

यह प्रो. दुबे के लिए अचरज भरा था । उनका जिज्ञासा भरा प्रश्न था - "अगर सिर्फ़ आठ लोग ही समझ सकते हैं तो उसे छपवाते क्यों है ? कार्बन पेपर लगाइये या टाइप कर दीजिए । अपनी रचना आप कवि सम्मेलन में सुनाते क्यों हैं। अगर आठ ही लोग समझते हैं तो आप अपनी छोटी-सी गोष्ठी अलग कर लीजिए, हमें बोर करने से क्या फ़ायदा जब आप जानते ही हैं कि मैं वो समझूँगा ही नहीं तो फिर क्या फ़ायदा ?......"

 

साहित्य के परिवर्तनकारी क्षमताओं को एकबारगी नक़ारना ज़रा कठिन होगा । उसे पूरी तरह ख़ारिज़ करना मानवीय संवेदना को भी ख़ारिज़ करने जैसा होगा । साहित्य में जो 'हित' का भाव या भावना है, वह समाज के लिए ही है । समाज निरपेक्ष साहित्य चिरस्थायी नहीं होता । साहित्य का यही चिरस्थायित्व सच्चा और ईमानदार बनाता है । सच्चा साहित्य उदात्त मानवीय सत्ता का व्याकरण है ।  सच्चे साहित्य के लिए समाज में सदैव आदर्य बना रहता है । और वही आदर्य भाव परिवर्तन के लिए मनुष्य को ऊर्जात्मक प्रेरणा बनता है । दो पंक्तियों के लघुछंद- दोहे में विन्यस्त ऊर्जा के बल पर ही तुलसी भारतीयता की पुनर्स्थापना मे सफल होते हैं या कबीर भारतीय समाज की क्षुद्रताओं के ख़िलाफ़ उथल-पुथल मचा देते हैं । साहित्य की गंभीर उपस्थिति से विश्व के सारे समाजों में परिवर्तन देखा गया है । वह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में मुक्तिकामी वाणी रहा है । उसने यूरोप में जातीय स्वातंत्र्य के बीज बोया, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के भावों को भी उसी ने पाला-पोसा । उसने पोप की प्रभुता को न्यून किया । फ्रांस में प्रजा की सत्ता का उन्नयन उसी के खाते में जाता है । नतशीश इटली के माथे को किसी ने गर्वोन्नत बनाया तो वह साहित्य ही है । सारे विश्व के मज़दूरों, बूर्जूओं, बिचौलियों को नयी सोच और सकारात्मक क़दम उठाने के लिए यदि दृष्टि दी है तो उसकी कारकता में मार्क्स और मार्क्सवादी साहित्य ही है । इधर सारे समाज के भीतर दलित अपने संघर्ष को तेज़ करने के लिए संगठित हो रहे हैं तो इसमे दुनिया भर के दलितवादी साहित्य का भी कहीं-न-कहीं योगदान है ।

सामाजिक परिवर्तन का उत्तरदायित्व अकेले साहित्य के कंधे पर नहीं डाला जा सकता ?” – भले ही यह स्वयं में वास्तविकता हो परन्तु ऐसे उद्गारों में कामचोर चाकर जैसे मनधारी की लाचारी भी सम्मिलित हो जाया करती है । इस लाचारी को चाहें तो साहित्य की सीमा कह सकते हैं और चाहें तो साहित्यकार की सीमा भी । शायद ऐसी सिचुएशन को ही ध्यान में रखकर कभी कहा गया है, जिसमें साहित्यकार के बहाने साहित्य के प्रभाव का वास्तविक आकलन भी संकेतित है –

 

सुर सूर तुलसी शशि, उडुगन केशवदास

अब के कवि खद्योत सम, जहँ-तहँ करत प्रकाश

 

कवि वही जो सूर्य-सा हो । यानी उसकी कविता प्रकाशमय हो । खद्योत कवियों से जहाँ-तहाँ ही उजास बगरायी जा सकती है । संपूर्ण समाज की परिधि पर तमस को छेंकने के लिए कविता का सूर्य-सा होना लाज़िमी है । कलाकर्म सहित स्वयं को प्रश्नों के भँवर में देख साहित्यवाले कुतर्क की नाव में सवार होकर बचाव का रास्ता अख्तियार करने लगते हैं – साहित्य की विपुल कुनैन के बाद भी समाज मलेरियामुक्त नहीं हो सका तक किस मुँह से पुनः साहित्य में रोग-निदान जैसी आस्था रखें । वे यह भी पूछ सकते हैं – क्या धर्मवान भी स्वयं परिवर्तन ला सके ? ” क्या दर्शन, राजनीति आदि ज्ञानश्रेणियों ने समाज के निष्कलुष बनाने में सफलता हासिल की ? विमर्श आगे बढ़ाते हुए कदाचित् यह प्रश्न भी उभार दें तो आश्चर्य नहीं कि जवाब-तलब केवल साहित्य से ही क्यों हो ? ऐसे समय उनकी ओर से यह उदाहरण भी सुना जा सकता है – महाभारतकार ने दोनों हाथ उठाकर कहा था, धर्म के मार्ग पर चलो, पर चले क्या कोई ? जब उनकी बात कोई नहीं सुनता तब मुक्तिबोध या भवानी भाई की आवाज़ क्योंकर अनसुनी ना हो ।

 

साहित्य के पक्ष में जब हम 'वागर्थ प्रतिपत्तये' पर विश्वास करते हैं तो भी हम 'रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्द काव्यम्' जैसे निष्कर्षों के साथ भी अडिग रहते हैं । जाहिर है कि यह जो रमणीयता है, उसकी अनुभूति है, वह एकाकी या अकेले नहीं साहचर्य में संभव होता है । सहमत हुआ जा सकता है कि रमणीयता, साहित्य का सामान्य धर्म है तो वागर्थ की प्रतिपत्ति के रूप में वह सामाजिकता का सृजन भी है । आनन्द कुमार स्वामी तो साहित्य को समाज का अनुवाद ही कहते रहे । साहित्य अनादि काल से सतत् स्वीकृत सत्य और मूल्य की स्थापना, नैरंतर्य की प्रतिष्ठा की चेष्ठा है ।  

  जयप्रकाश मानस

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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