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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

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 व्याकरण

 एक शब्द

खोदना


डॉ.गंगा प्रसाद बरसैया

 

खोदने का काम कहीं भी हो सकता है-ज़मीन में, दीवाल में, कुये में, तालाब में । खोदने के उद्देश्य भी अलग होते हैं । कोई मिट्टी खोदता है, कोई घास खोदता है, लेकिन अर्थ एकदम भिन्न । मिट्ठी खोदने में एक स्थान से मिट्टी खोदकर दूसरे स्थान पर डालना है, पर जब कोई आदमी निरर्थक काम करता है या बेकार रहता है और उससे पूछें क्या कर रहे हो ? उत्तर होगा घास खोद रहा हूँ । यह घास मुख्यतः जानवरों के काम की है लेकिन आजकल आदमी भी चारा घास खाने लगे हैं ।

 

कुछ लोग श्मशान में कब्र खोदकर मुर्दे गाड़ते हैं और कुछ लोग ज़िंदा आदमियों की कब्र खोदने में लगे रहते हैं ताकि उन्हें नष्ट या बरबाद कर सकें। कभी व्यक्ति स्वयं कहता है - मैं तुम्हें कब्र खोदकर गाड़ दूँगा और कभी दूसरे उसकी हरकतें देखकर कहते हैं कि वह अमुक की कब्र खोदने में लगा रहता है। इसी से मिलता-जुलता मुहावरा जड़ें खोदने का है। लोग अपने दुश्मनों को कमजोर करने के लिए दंद-फंद करके उनकी जड़ें खोदते रहते हैं। कुछ लोग गड्ढा खोदकर गाड़ देने की धमकी देते हैं । यह कब्र खोदने का ही समानार्थी है। पुरानी घटनाओं की चर्चा करना पुराने घाव खोदना या कुरेदना कहा जाता है और अतीत प्रसंगों पर विवाद करना गड़े मुर्दे उखाड़कर कटुता पैदा करना अच्छा नहीं माना जाता । इससे पुराने घाव हरे हो जाते हैं।

 

खोद-खोद कर पूछना कुछ लोगों का स्वभाव होता है। वे दूसरों की भीतरी बातों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। किसी की जड़ पर या मूल आधार पर प्रहार करने को नींव खोदना कहते हैं। राम श्याम की नींव खोदने पर तुला है। दूसरों को खोदिया-खोदिया कर चिढ़ाना भी कुछ लोगों की आदत होती है। यद्यपि यह आदत अच्छी नहीं है। दैनिक मजदूरी से जीवन-यापन करने वाले प्रायः कहते सुने जाते हैं - भइया, रोज खोदना और रोज खाना है अथवा रोज कुआ खोदो, रोज पानी पियो, यही ज़िंदगी है। ईर्ष्या और दुर्भावनावश जो दूसरों के लिये गडढ़ा खोदता है वह स्वयं गड्ढ़े में गिरता है क्योंकि बुराई का फल बुराई और भलाई का फल भलाई ही मिलता है। वैसे चूहों के खोदने से पहाड़ नहीं गिरते। कहाँ चूहा जैसा छोटा जीव और कहाँ विशाल पर्वत । छोटा आदमी बड़ों का कुछ बिगाड़ नहीं सकता। वैसे यदि आदमी पूरे संकल्प से जुट जाये तो पहाड़ खोदकर पानी निकाल सकता है। संसार में कुछ भी असंभव नहीं है। खोदते-खोदते पहाड़ भी खतम हो जाते हैं। 

  डॉ. गंगा प्रसाद बरसैया

एम.आई.जी. 12

चौबे कॉलोनी, छतरपुर, मध्यप्रदेश 

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