साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच                                                                             SRIJANGATHA

।।सृजनगाथा।।

 

  ई-पताः srijangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

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 अमेरिका की धरती से

 

जहाँ पे सवेरा हो, बसेरा वहीं है


लावण्या शाह

 

लावण्या शाह - लावण्या शाह हिंदी के शलाका पुरुष पं. नरेंद्र शर्मा की पुत्री हैं । वर्षों से अमेरिका में रह रही हैं । गीत और छंद के अनुशासन में निरंतर सक्रिय और रचनात्मक लेखन से नयी प्रवासी पीढ़ी  का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं । इन दिनों अपने पिता स्व. नरेंद्र शर्मा समग्र को प्रकाशित करने के ऐतिहासिक कार्य में संलग्न हैं । बड़ी पीढी के लिए वे मिसाल हैं कि कैसे अंतरजाल पर हिंदी की प्रतिष्ठा स्थापित की जा सकती है, जो उनके हिंदी ब्लॉग अंतरमन से साबित होती है । प्रस्तुत है - सृजनगाथा के पाठकों के लिए  'अमेरिका की धरती से' नामक कॉलम - संपादक


      कहते हैं जहाँ पर सबेरा हो, बसेरा वहीं है । मनुष्य की नियति में प्रवास । कई बार प्रवास ही स्थायी आवास बन जाया करता है । मनुष्य वहीं का होकर रह जाता है । यदि वहाँ मन की संवेदनायें न मरें या न मार डाले जायें तो वह अपनी विरासत को पूरी तरह निरंतर बनाये रख सकता है । भारतीय मूल के प्रवासी भी विश्व में जहाँ कहीं पहुँचते हैं अपने परिवार के साथ बस जाया करते हैं। परिवार साथ जाता है तो संस्कृति भी अपने आप चली जाती है । वह मनुष्य और परिवार के साथ सतत् प्रवहमान होती है । दरअसल मूल संस्कृति मन-मनीषा में इतनी रची-पची होती है कि उसे दूर रहने का प्रयास करके भी उससे दूर नहीं रहा जा सकता । यही मानव-जीवन का सत्य है । जो अपनी संस्कृति से जानबूझकर परे चले जाते हैं वे अपनी जड़ों से भी कट जाते हैं न वे नयी संस्कृति में जम पाते हैं न ही अपनी संस्कृति के होकर रह पाते हैं। पर सच्चा भारतीय जहाँ कहीं भी होता है वह अपनी सांस्कृतिक धरोहर साथ के ही निवसता है ।

 

आज सारे मुल्कों में भारतीय परिवार दिख जाते हैं । भारतीय ग्राम्य जीवन या शहरी तड़क-भड़क से निकल कर, कई परिवारों ने, मॉरीशस, जावा सुमात्रा, इन्डोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, हांगकांग, जैसे पूर्व द्वीपीय संस्कृति में जा कर अपनी नई गृहस्थी बसाईं हैं, जिनकी दूसरी या तीसरी पीढियाँ भी वहीं बसी हुईं हैं। वे भारत आते-जाते रहते हैं पर घूमने। अधिकांश स्थायी रूप से भारत नहीं लौटते । वहीं के होकर रह जाते हैं । शत प्रतिशत तो खैर नहीं कह सकते, कुछेक लौट कर आये भी हों परंतु अधिकांश "अप्रवासी" ही बने रहे। ये "अप्रवासी" भी बडी अजीब क़िस्म की शख्सियत होती है ! सोचिये, रुप-रंग, सोच, मानसिकता, सांस्कृतिक झुकाव, सभी, सर्वथा भारतीय होते हुए भी, इन्सान, परदेश के परिवेश से तालमेल बिठाने की आजीवन कोशिश करते-करते, वहीं परदेश में प्राण त्याग देता है । उसकी माटी पराये देस में, पराई माटी में घुल मिल जाती है और अगली पीढी, जीती है यादों के सहारे... सगे संबंधी भी तस्वीरों और यादों के सहारे, अपने स्वजनों को याद करते रहते हैं ! क्या इन्हें गाँव की अमराई याद नहीं आती होगी ? क्या इनके सपनों में आँगन में फूदकती हुई गौरया नहीं दिखाई देती होगी ? क्या सावन में सखी-सहेलियों की चुहलबाजी की आवाजें नहीं सुनाई देती होंगी ? खैर....

 

ये मेरे मन की बातें, मैं आप को बतला कर, पूर्व भूमिका स्वरुप आपसे बाँट रही हूँ क्योंकि अब आप से कुछ, चित्रमय झलकियाँ बाँटने का मन है -

 

ये चित्र-दीर्घा है "गणेशोत्सव" की जो न्यूयोर्क के पास के न्यू जर्सी शहर में सम्पन्न हुआ  था, जिस तरह भारत के हर शहर में गणेश प्रतिमा की श्रद्धापूर्वक स्थापना होती है, ठीक उसी तरह, पूरी श्रद्धा और आनंद के साथ, अमेरिका में भी ऐसा उत्सव प्रवासी भारतीय जो अमेरिका में घर बसा कर रहते हैं द्वारा सम्पन्न होता है ।

      

प्रथम अंतराष्ट्रीय भारतीय प्रवासी दिवस समारोह की चित्रदीर्घा भी आपको लिये चलती हूँ, जो न्यूयोर्क शहर में सम्पन्न हुआ था । ज़रा आगे बढ़ते हैं अभूतपूर्व भारत की झलकियाँ देखने और यह तीसरी दीर्घा है " साठ वर्ष - और ६० प्रतिभाएँ "

 

 यह चित्रमय कहानी है भारतीय बुजुर्ग समाज की - ब्रीज वोटर इलाके से इन्हें पिकनिक या एक दिन की सैर के लिये इकट्ठा करके घूमने ले जाया गया था। युवापीढी काम-काज में व्यस्त रहतीं हैं और इन्हें भी मनोरंजक पर्यटन की आवश्यकता है जिसे पूरा करना ज़रूरी है।  

 

Jersey City: "The Number One Indian Ice Cream In The World"

भारत में जगह-जगह आइस्क्रीम पार्लर खुल चुके हैं । जिस तरह भारतीय परिवारों में माता पिता बच्चों को आइस्क्रीम खिलाने ले जाते हैं बिलकुल उसी तरह, अब भारत की मशहूर कंपनी 'क्वालिटी " की दूकान अमेरिका में भी खुल गई है ! तो म़जे हो गये ना बच्चों के और बडों के भी! अब अमेरिका में भी बहुतेरे आइस्क्रीम मिलते हैं पर, 'क्वालिटी का ब्रान्ड मिलने से खुशी बढ़ जाती है और अहमदाबाद के वाडीलाल वाला ब्रान्ड भी भारतीय सौदा बेचनेवाली दुकानों में अब मिल ही जाती है आसानी से । भारतीय वस्तु के प्रति भारतीय लोगों का मोह है और अमेरिकन प्रजा भी शौक से इसे चखती है और पसंद करती है।  इस प्रकार भारतीय सामग्री का व्यापार बढता जा रहा है। पसंद अपनी-अपनी और व्यक्तिगत आज़ादी का सर्वव्यापी विकास प्रजातंत्र की गाडी का एक पहिया है जिस की तेज दौड से आज विश्व निकट आकर सिकुड़ता जा रहा है ।

 

आज इतना ही, फिर मिलेंगें । कुछ और बातों के साथ....अमेरिका की पाती । आपसे अब विदा लेती हूँ । राम.. राम भाइयों को और बहनों को भी । स्नेह सहित : लावण्या ।                         

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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