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रायपुर में स्वामी विवेकानन्द स्वामी आत्मानंद
रायपुर में नरेन्द्रनाथ बूढापारा में रहा करते । तब रायपुर में अच्छा विद्यालय नहीं था। इसलिए नरेन्द्रनाथ पिता से ही पढ़ा करते थे। यह शिक्षा केवल किताबी नहीं थी। पुत्र की बुद्धि के विकास के लिए पिता अनेक विषयों की चर्चा करते। यहाँ तक कि पुत्र के साथ तर्क में भी प्रवृत्त हो जाते और क्षेत्र-विशेष में अपनी हार स्वीकार करने में कुंठित न होते। उन दिनों विश्वानाथ बापू के घर में अनेक विद्वानों और बुद्धिमानों का समागम हुआ करता तथा विविध सांस्कृतिक विषयों पर चर्चाएँ चला करतीं । नरेन्द्रनाथ बड़े ध्यान से सब कुछ सुना करते और अवसर पाकर किसी विषय पर अपना मन्तव्य भी प्रकाशित कर देते । उनके बुद्धमत्ता तथा ज्ञान को देखकर बड़े-बूढ़े चमत्कृत हो उठते, इसलिए कोई भी उन्हें छोटा समझ उनकी अवहेलना नहीं करता था। एक दिन ऐसी ही चर्चा के दौरान नरेन्द्र ने बँगला के एक ख्यातनामा लेखक के गद्य-पद्य से अनेक उद्धरण देकर अपने पिता के एक सुपरिचित मित्र को इतना आश्चर्यचकित कर दिया कि वे प्रशंसा करते हुए बोल पड़े, “बेटा, किसी-न-किसी दिन तुम्हारा नाम हम अवश्य सुनेंगे ।” कहना न होगा कि यह मात्र स्नेहसिक्त अत्युक्ति नहीं थी - वह तो एक अत्यन्त सत्य भविष्यवाणी थी। नरेन्द्रनाथ बंग-साहित्य में अपनी चिरस्थायी स्मृति रख गये।
नरेन्द्र में पहलेसे पाकविद्या के प्रति स्वाभाविक रुचि थी। रायपुर में हमेशा अपने परिवार में ही रहने के कारण तथा इस विषय में अपने पिता से सहायता प्राप्त करने तथा उनका अनुकरण करने से वे इस विद्या में और भी पटु हो गये । रायपुर में उन्होंने शतरंज खेलना भी सीख लिया तथा अच्छे-अच्छे खिलाड़ियों के साथ वे होड़ लगा सकते थे। फिर रायपुर में ही विश्वनाथ बाबू ने नरेन्द्र को संगीत की पहली शिक्षा दी। विश्वनाथ स्वयं इस विद्या में पारंगत थे और उन्होंने इस विषय में नरेन्द्र की अभिरुचि ताड़ ली थी। नरेन्द्र का कंठ-स्वर बड़ा ही सुरीला था। वे आगे चलकर एक सिद्धहस्त गायक बने थे और उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष भी रायपुर में ही विकसित हुआ था । फिर, नरेन्द्र को कसरत और खेल-कूद में भी बचपन से रुचि थी। इसलिए यह भी अनुमान किया जा सकता है कि बूढ़ा तालाब उनकी तैराकी का स्थान रहा होगा। अतः उसका नामकरण जो ‘विवेकानन्द-सरोवर’ किया गया है, वह सामयिक और समीचीन है।
रायपुर में घटी दो और घटनाएँ नरेन्द्रनाथ के व्यक्तित्व के विकास की दृष्टि से बड़ी महत्त्वपूर्ण है। विश्वनाथ ने पुत्र को संगीत के साथ-साथ पौरुष की भी शिक्षा दी थी। एक समय नरेन्द्रनाथ पिता के पास गये और उनसे पूछ बैठे, “आपने मेरे लिए क्या किया है ?” तुरंत उत्तर मिला, “ जाओ, दर्पण में अपना चेहरा देखो।” पुत्र ने तुरंत पिता के कथन की मर्म समझ लिया, वह जान गया कि उसके पिता मनुष्यों में राजा है।
एक बार नरेन्द्र ने अपने पिता से पूछा था कि संसार में किस प्रकार रहना चाहिए, अच्छी वर्तनी का मापदण्ड क्या है ? इस पर पिता ने उत्तर दिया था, कभी आश्चर्य व्यक्त मत करना । क्या यह वही सूत्र था, जिसने नरेन्द्रनाथ को विवेकानन्द के रूप में समदर्शी बनाकर, राजाओं के राजप्रसाद और निर्धनों की कुटिया में समान गरिमा के साथ जाने के समर्थ बनाया था ?
उपर्युक्त विवरण प्रदर्शित करते हैं कि नरेन्द्र के व्यक्तित्व के सर्वतोमुखी विकास में रायपुर का क्या योगदान रहा है। डेढ़ वर्ष रायपुर में रहकर विश्वनाथ सपरिवार कलकत्ता लौट आये। तब नरेन्द्रनाथ का शरीर स्वस्थ, सबल और हष्ट-पुष्ट हो गया था और मन उन्नत। उनमें आत्मविश्वास भी जाग उठा था और वे ज्ञान में भी अपने स्मव्यस्कों की तुलना में बहुत आगे बढ़ गये थे । किन्तु बहुत समय तक नियमित रूप से विद्यालय में न पढ़ने के कारण शिक्षकगण उन्हें ऊपर की College Entrance यानी महाविद्यालय प्रवेशिका कक्षा में भारती नहीं करना चाहते थे। बाद में विशेष अनुमति प्राप्त कर वे विद्यालय की इसी कक्षा में भरती हुई तथा अच्छी तरह से पढ़ाई कर सभी विषयों को थोड़े ही समय में ठीक करके उन्होंने 1879 में परीक्षा दी । यथासमय परीक्षा का परिणाम निकलने पर देखा गया कि वे केवल उत्तीर्ण ही नहीं हुए हैं, प्रत्युत उस वर्ष विद्यालय से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होनेवाले वे एकमात्र विद्यार्थी हैं। यह सफलता अर्जित कर उन्होंने अपने पिता से उपहार-स्वरूप चाँदी की एक सुन्दर घड़ी प्राप्त की थी।
यही नरेन्द्रनाथ कालान्तर में स्वामी विवेकानन्द बनकर परिव्रजन करते हुए खंडवा आते हैं और मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर, इन्दौर, आदि स्थानों में भ्रमण करते हैं। वह खण्डवा ही था, जहाँ स्वामीजी शिकागो में आयोजित किये जानेवाले विश्व-धर्म-सम्मेलन में भाग लेने का निश्चय करते हैं और वहाँ जाकर भारत की युगों से सोयी हुए आस्तिकता को जगा देते हैं। इसी बीच उन्होंने कुछ समय एक गाँव में एक भंगी-परिवार के साथ बिताया था। यह पहला अवसर था, जब वे समाज में अति निम्न माने जानेवाले लोगों के साथ रहे हों। यह विवेकानन्द की क्रान्तिकारी चेतना था, अन्यथा क्या यह उस समय कल्पना की जा सकती थी कि समाज में सर्वोच्च माना जानेवाला सन्यासी समाज के निकृष्ततम् माने जानेवाले वर्ग के साथ रहे और उनके साथ ही खान-पान करे ? यह हिन्दु समाज को एक नयी दिशा थी, जो विवेकानन्द अपने आचरण के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।
स्वामीजी ने उनकी दयनीय स्थिति देखी, पर साथ ही गरीबी में पलता हुआ उनका विशाल हृदय देखा । वे नीच कहे जानेवाले लोगों के सौजन्य को देख अभिभूत हो गये। ऊँचे कहलानेवाले लोगों के शोषण और अत्याचार से उन लोगों की हुई दुर्दशा का स्मरण कर स्वामीजी के नेत्र गीले हो आये । उन्होंने देखा कि इन बेचारे गरीब को सब प्रकार के मानवधिकारों से वंचित रखा गया है। पुरोहितों ने जनसाधारण को धर्म के उदात्त तत्त्वों से अनभिज्ञ रखा है, जिससे कि वे अपने अर्थलाभ के लिए सबका शोषण कर सकें । स्वामीजी के हृदय की यह वेदना जूनागढ़ के दीवान साहब को बम्बई से 4 अगस्त 1892को लिखे पत्र में फूट पड़ी थी - “इस अंचल में एक बात देखकर मुझे बहुत दुःख होता है, वह है संस्कृत और अन्य शिक्षा का नितान्त अभाव । देश के इस भाग के लोग धर्म के नाम पर जो कुछ जानते हैं, वह है खाने-पीने और नहाने को लेकर स्थानीय अंधविश्वासों की एक गठरी; बस यही उनका सारा धर्म है।” तथाकथित अहम्मन्य धर्मनेताओं ने वेदों के नाम पर जो कुछ सिखाया, उसी का अनुसरण ही, स्वामीजी के मतानुसार, जनसाधारण की अधोगति का कारण था। तभी स्वामीजी के मानस में एक संकल्प उठा- “इन नीच कहे जानेवाले लोगों को उठाकर सबके समकक्ष लाने का, उन्हें भी सबके समान ही अपनी उन्नति के लिए अवसर प्रदान करने का और छुआछूत के कलंक को मिटा देने का।”
स्वामीजी चाहते थे कि उच्च वर्ण के कहलाने वाले लोग अपने इस पाप का प्रायश्चित करने के लिए स्वयं आगे आएँ और असमानता तथा छुआछूत की भावना को मिटा देने के लिए कमर कस लें। उन्होंने भारत का कल्याण इसी में देखा था। तबी तो वे उच्च वर्ण के कहलाने वाले लोगों को लताड़ते हुए बोल उठे थे- “भारतवर्ष के कृषक, चर्मकार, मेहतर तथा ऐसे ही अन्य जातिवालों में कार्य करने की शक्ति एवं आत्मविश्वास तुम्हारी अपेक्षा अधिक है। वे युगों से चुपचाप काम करते आये हैं। और वे ही देश की सम्पूर्ण सम्पत्ति बिना चूँ तक किये कमाते आये हैं। ...इस सहनशील जनता का तुमने इतने दिनों तक दमन किया है, अब उसके प्रतिकार का समय आ गया है।....यदि मजदूर लोग काम करना बन्द कर दें, तो तुम्हें अन्न-वस्त्र मिलना भी बन्द हो जाय और तुम उनको नीच जाति के मनुष्य मानते हो और अपनी संस्कृति की शेखी बघारते हो !आजीविका के संग्राम में व्यस्त रहने के कारण उन्हें अपने में ज्ञान की जागृति का अवसर नहीं मिला । वे इतने दिनों तक मानव-बुद्धि द्वारा चलनेवाले यंत्र के समान सतत काम करते रहे हैं और चतुर शिक्षित मनुदाय ने उनके परिश्रम के फल का सार अंश ले लिया है।...पर अब ज़माना बदल गया है।....अब उच्च जातिवाले नीच जातिवालों को और अधिक समय तक दबा नहीं सकते, चाहे वे इसके लिए कितनी ही कोशिश क्यों न करें। उच्चतर जातियों का कल्याण अब इसी में है कि वे निम्न जातियों को उनके यथोचित अधिकार प्राप्त करने में सहायता दें।”
यह था विवेकानन्द का हृदय, जिसमें केवल भारत ही नहीं, बल्कि समस्त विश्व के पीड़ितों और पददलितों के लिए संवेदना भरी है।
कविता का शीर्षक है-To the Fourth of July अर्थात् चौंथी जुलाई के प्रति। स्वामीजी ने इसकी रचना 4 जुलाई, 1898 को ‘अमेरिकन स्वातंत्र्य घोषणा दिवस’ की जयंती मानाने के निमित्त की थी। तब वे अपने कुछ अमेरिकन शिष्यों के साथ काश्मीर का पर्यटन कर रहे थे। इस कविता में सर्वहारा वर्ग की बेबसी और असहायता के प्रति उनकी तीव्र कसम और छटपटाहट दर्शनीय है। साथ ही उन्होंने उस चौथी जुलाई का अभिनन्दन भी किया है, जो अमेरिका में समस्त भेदभाव और असमानता के अन्धकार को दूर कर मानवाधिकार की समानता के स्वर्णिम विहान का सूत्रपात करती है तथा मानव-मात्र को मुक्ति का सन्देश देती है। और क्या यह मात्र एक संयोग था कि इसके चार वर्ष बाद, 1902 ई. में ठीक 4 जुलाई के ही दिन वे अपने देहबन्धन को काटकर मुक्त हो गये ?
विवेकानंद विद्यापीठ रामकृष्ण परमहंस नगर, कोटा रायपुर, छत्तीसगढ़ - 492010 ◙◙◙
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