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।।सृजनगाथा।।

 

  ई-पताः srijangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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 मूल्यांकन

 

परंपरा और आधुनिकता का सही समन्वय


सीताराम गुप्ता

 

ब भी लीक से हटकर कोई घटना घटित होती है या कोई नया निर्णय लिया जाता है तो प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। कोई उसे अच्छा कहता है तो कोई बुरा। कुछ लोगों का तो कार्य ही है विरोध करना। विरोध भी सही तरीके से नहीं ग़लत तरीके से करना जिससे समाज में अव्यवस्था तो फैलती ही है साथ ही भारी आर्थिक नुकसान भी होता है। स्कूलों में यौन शिक्षा का मुद्दा हो, अंतर्जातीय या अंतर्धार्मिक-विवाह की घटनाएँ। हों, राष्ट्रीय अथवा धार्मिक प्रतीकों का अपमान या ग़लत इस्तेमाल का मामला हो अथवा फ़िल्मों में या फिल्मी-हस्तियों द्वारा अश्लीलता अथवा अभद्र प्रदर्शन का मामला हो, देश और विभिन्न समाज फौरन दो हिस्सों में बँट जाते हैं। एक उसकी वकालत में तो दूसरा लानत-मलामत में। एक आधुनिकता व प्रगतिशीलता की दुहाई देता है तो दूसरा नैतिकता व परंपरा की। दोनों ही अपने आपको उचित ठहराते हैं तथा दूसरे को सरासर ग़लत लेकिन क्या ये संभव है कि एक पक्ष ठीक हो और दूसरा ग़लत या दोनों पक्ष ही ठीक हों या दोनों पक्ष ही ग़लत? शायद नहीं।

 

क्या ठीक है और क्या ग़लत ऊपरी तौर पर या फिर मात्रा किसी एक घटना से इसका निर्णय कर पाना बड़ा मुश्किल है। शेक्सपीयर ने कहा है कि कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं है अपितु हमारी सोच उसे अच्छा या बुरा बनाती है और हमारी सोच हमारे परिवेश द्वारा निर्धारित और नियंत्रित होती है। हमारे संस्कार, हमारी शिक्षा-दीक्षा सब हमारी सोच को प्रभावित करने वाले तत्व हैं। इस प्रकार हम अपने मन की कडीशनिंग के अनुसार ही प्रतिक्रिया करते हैं और यह स्वाभाविक भी है। यदि हममें कट्टरता अथवा परंपरा के प्रति आग्रह है तो ये भी स्वाभाविक है तथा यदि हममें आधुनिकता और प्रगतिशीलता का प्रति आग्रह या झुकाव है तो ये भी असंभव नहीं लेकिन घटनाओं और स्थितियों को किस रूप में लिया जाए जिससे परस्पर विरोध और टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो यह जानना अनिवार्य और महत्वपूर्ण है।

 

परंपरावादी परंपरा को श्रेष्ठ मानते हैं। जो चीज़ सदियों-सहस्त्राब्दियों से चली आ रही है और जिससे हमारी संस्कृति का विकास हुआ है उसे कैसे एकदम छोड़ा जा सकता है? अपनी संस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यों की उपेक्षा असंभव है। इसके विपरीत आधुनिकता वादी या प्रगतिशील हर क्षेत्रों में आमूलचूल परिवर्तन या नयेपन को ही एकमात्र विकल्प मानते हैं। उनकी सोच का अनुसार आगे बढ़ने के लिए परिवर्तन अनिवार्य है। घिसी-पिटी परंपराओं का पालन निरर्थक और विकास में बाधक है - व्यक्ति के विकास में भी और अर्थव्यवस्था का विकास में भी। बंदरिया की तरह मृत शिशु को छाती से चिपकाए रहने से क्या लाभ? बिल्कुल ठीक है। दोनों का ही अपने-अपने तर्क हैं। दोनों ही ठीक प्रतीत होते हैं लेकिन यदि दोनों ही ठीक हैं तो टकराव क्यों? वस्तुत: दोनों ही आंशिक रूप से ठीक हैं और दोनों ही ज़्यादातर ग़लत। इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

कालिदास ने कहा है :

            पुराणमित्येव न साधु सर्व न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।

            संत:  परीक्ष्यान्तरद्  भंजते,   मूढ:  परप्रत्ययनेयबुद्धिधः ।।

 

जो पुराना है वह सभी उत्तम अथवा उपयोगी नहीं है और जो नया साहित्य है वह नया होने मात्रा से त्याज्य अथवा निंद्य नहीं है। समझदार व्यक्ति उचित परीक्षा करके ही उसकी अच्छाई-बुराई अथवा उपयोगिता-अनुपयोगिता स्वीकार करते हैं। मूढ़ व्यक्ति दूसरे के मत पर अवलंबित रहते हैं। यही मूढ़ व्यक्ति प्राय: ग़लत विरोध का लिए उत्तरदायी होते हैं। और ये जिन लोगों का मत पर अवलंबित रहते हैं वे अपने लाभ का अनुसार किसी घटना को सही या गलत ठहराते हैं।

 

यदि पूर्वाग्रह से रहित होकर विश्लेषण या परीक्षा करें तो हम पाते हैं कि हमारी हजारों वर्षों की परंपरा अत्यंत समृद्ध होते हुए भी आज समग्र रूप से प्रासंगिक और उपयोगी नहीं है। मनुष्य लगातार बदल रहा है। संस्कृति भी मनुष्य द्वारा निर्मित है अत: परिवर्तनशील है और बदल रही है और इस बदलाव को स्वीकार करना अनिवार्य है। परिवर्तित मूल्यों को स्वीकार करें लेकिन पुराने मूल्य जो आज भी उपयोगी और प्रासंगिक है उनको भी स्वीकार करना होगा। हाँ,  जो मान्यताएँ और मूल्य आज प्रासंगिक और उपयोगी नहीं हैं, जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का संतुलित विकास में बाधक हैं तथा जिनसे विभिन्न समुदायों और मतों का मानने वालों में वैमनस्य फैलता है उन्हें त्यागना ही श्रेयस्कर है। शरीर का कोई अंग रुग्ण हो जाए तो उसकी चिकित्सा अनिवार्य है और कभी-कभी तो पूरे शरीर को बचाने का लिए उस अंग को काटना भी पड़ता है। जूता फट जाने पर उसकी मरम्मत करवाना अनिवार्य है लेकिन घिसकर टूट जाने पर उसे पेंफक देना ही समझदारी है। संस्कृति और मूल्यों की तुलना जूते से नहीं की जा सकती लेकिन उसका वर्तमान में अनुपयोगी और अप्रासंगिक तत्व टूटे जूते का समान त्यागने योग्य ही है।

 

परिवर्तन और नयापन विकास का अनिवार्य तत्व हैं। इससे नई संस्कृति और नई नैतिकता का जन्म होता है। इसको ही कुछ लोग अपसंस्कृति और अनैतिकता मान लेते हैं लेकिन आधुनिकता और परिवर्तन के नाम पर अनुशासनहीनता तथा उच्छृंखलता भी तो ठीक नहीं। आज संस्कृति, नैतिक मूल्य और उनसे प्रभावित जीवन शैली सब तेज़ी से बदल रहे हैं। इस परिवर्तन से जो निकल कर आया है क्या वह सारा का सारा स्वीकार्य हो सकता है? कदापि नहीं। आज परिवर्तन की गति अत्यंत तीव्र हो गई है। पहले जितना परिवर्तन सैकड़ों सालों में होता था अब कुछ दशकों में हो रहा है और दशकों का परिवर्तन सालों में। इतनी तीव्र गति से हो रहे परिवर्तन को आँखें मूँद कर आत्मसात करना उचित नहीं कहा जा सकता। यह परिवर्तन जो सुखद लग रहा है उसमें दुखद तत्व भी हैं जो कुछ समय के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे। वैज्ञानिकों ने अनेक दवाओं का आविष्कार किया लेकिन उनमें से अनेक दवाओं पर प्रतिबंध भी लगे क्योंकि उनका उपयोग से बाद में पता चला कि ये उपचारक होने का साथ-साथ हानिकारक भी थीं। जंक फूड और फास्ट फूड का दुष्परिणाम हमारे सामने हैं। डिब्बाबंद खाना और पेय हमारे स्वास्थ्य का लिए हानिकारक हैं तो फिर क्यों आधुनिकता के नाम पर इनका उपभोग बढ़ता ही जा रहा है? उचित सोच के अभाव में ही न।

 

आधुनिकता अथवा प्रगतिशीलता का अर्थ परंपरागत नैतिक मूल्यों का ह्वास, अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता तथा नग्नता नहीं। इसकी अपेक्षा सोच अधिकाधिक आधुनिक, प्रगतिशील और वैज्ञानिक हो। जब सोच अधिकाधिक आधुनिक होगी, विचार प्रगतिशील होंगे तथा दृष्टिकोण वैज्ञानिक होगा तो ऐसे में व्यक्ति और समाज में संकीर्णता की अपेक्षा धैर्य, सहनशीलता और स्वीकार्यता जैसे गुणों का ही विकास होगा। अच्छे और बुरे में अंतभेद करने और उपयोगी तथा सही चुनने की क्षमता का विकास भी होगा। यदि वास्तव में सुसंस्कृत बनना है तो सोच को आधुनिक बनाना होगा और साथ ही संकीर्णता का साथ-साथ उच्छृंखलता तथा अनुशासनहीनता से भी बचना होगा।

 

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पुरुषार्थ माने गए हैं जिनका पालन अनिवार्य है। धर्म का पालन तभी संभव है जब हम दूसरों का धर्म अथवा विचारों का प्रति भी सहिष्णु हों। अर्थोपार्जन भी अनिवार्य है लेकिन जीविका सम्यक हो। जीविका उपार्जन में दूसरे का हितों पर प्रहार या आघात न हो तथा साथ ही प्रकृति और परिवेश भी नष्ट न हों। सृष्टि का विकास का लिए ही नहीं मनुष्य का विकास का लिए भी काम सबसे महत्वपूर्ण तत्व है लेकिन उसका संयमित और मर्यादित रूप ही स्वीकार्य है। काम में जहाँ उच्छृंखलता होगी वहीं समस्याए। पैदा होने लगेंगी। नैतिक मूल्यों की स्थापना काम का विकृत स्वरूप को रोकने के लिए है, काम को रोकने का लिए नहीं। धर्म, अर्थ और काम का संतुलन ही मोक्ष है। जिस प्रकार जीवन को संपूर्णता से जीने का लिए चारों पुरुषार्थों का अनुपालन और संतुलन अनिवार्य है उसी प्रकार श्रेष्ठ समाज की स्थापना का लिए परंपरा और आधुनिकता का उचित समन्वय भी अनिवार्य है। विरोध विरोध के लिए न होकर ग़लत के लिए होना चाहिए। अपने प्रिय या हितैषी की भी ग़लत बात का विरोध हो और अपने विरोधी की भी सही बात का समर्थन तभी समाज सही उन्नति कर सकेगा।

  सीताराम गुप्ता

ए एन डी.-106-सी, पीतमपुरा,

दिल्ली-110034

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