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लघु प्रत्रिकाएँ : जनोन्मुखता का सवाल शंभुनाथ
व्यावसायिक पत्रिकाओं के इस विषाक्त ढाँचे के खिलाफ़ ही लघु-पत्रिकाओं ने बिद्रोह किया था। नये रचनाकारों ने आवाज़ बुलन्द की थी ‘सरस्वती’, ‘हंस’, ‘चाँद’, ‘मतबाला’, इन्दु’, ‘रंगीला’,‘रुपाभ’, ‘कृति’, ‘प्रतीक’, ‘नई कविता’, ‘हिमालय’, ‘कल्पना’,‘पत्रिकाएँ’, ‘अतीत में निकल चुकी थी। इनका उद्देश्य व्यावसायिक न होकर सार्थक साहित्य का प्रकाशन था । समाज में कला का विकास करना था। नये रचनाकारों को अभिव्यक्ति के अवसर देना तथा साहित्यक आंदोलनों को मुखर करना था। इसमें सम्पादक आमतौर पर वे होते थे, जो साहित्य रचना में संलग्न हों । सन् 60 के बाद लघु पत्रिकाओं का एक ऐसा उभार आया, जो पहले से व्यापक था। अधिक क्रुद्ध और विध्वंसक भी ।
‘माध्यम’, ‘उत्कर्ष’, ‘लहर’, ‘वातायन’, ‘नागफनी’,‘ रूपांबरा’, ‘समवेत’, ‘कृति’, ‘परिचय’, ‘युयुत्सा’, ‘सन्दर्भ’,‘हसताक्षर’,‘दर्पण’, ‘तनाव’,‘बासंती’, ‘सम्बोधन’,‘समीक्षा’,‘अकविता’,‘शताब्दी’, ‘क खग’,‘सलीब’,‘अप्रस्तुत’, ‘अक्षर’, ‘अप्रस्तुत’, ‘शब्द’, ‘अर्थ’, ‘बिम्ब’, ‘ऐसी ढेरों लघु पत्रिकाएँ थीं।’,‘कल्पना’ जैसी दो एक पत्रिका पहले से निकल रही थी। इन्होंने व्यावसायिक पत्रिकाओं को जबर्दस्त चुनौती दी। इस चुनौती का यह अर्थ नहीं है कि लघु पत्रिकाओं के आंदोलन ने व्यावसायिक पत्रिकाओं की बिक्री कम कर दी या इनकी बाढ़ रोक दी। यह चुनौती साहित्य के मूल्यों तथा इनकी समझ के स्तर पर थी। इस आंदोलन ने साबित कर दिया कि नया साहित्य व्यावसायिक पत्रिकाओं का मुँहताज नहीं है। यह लघु पत्रिकाओं के माध्यम से ही अपना विकास कर सकता है। तो लघु इसीलिए कहा जाता था कि ये अव्यावसायिक स्तर पर, सहयोगी प्रयासों द्वारा तथा अनियमित रूप से निकलती थीं। अन्यथा इनका मूल स्वरूप ऐसी गणतांत्रिक पत्रिकाओं का था, जिनमें एक व्यापक लेखक-वर्ग अभिव्यक्त हो रहा था। इनका महत्व कदापि लघु नहीं था। क्योंकि इन पत्रिकाओं के माध्यम से मौजूदा व्यवस्था, परम्पराओं और सामंती संस्कारों के खिलाफ़ बौद्धिक चेतना का उदय हुआ। नई पीढ़ी सामने आई । निःसन्देह इस पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि यह दिशाहीनता, कुंठा और व्यक्तिवादी भ्रमों की शिकार थी, लेकिन अपने समय में इसने शासन-व्यवस्था के प्रति जिस विक्षोभ-क्रोध का परिचय दिया, उसका अपना महत्व है। लघु पत्रिकाओँ की सबसे बड़ी उपलब्धि उस नई पीढ़ी को सामने लाने में है, जो आगामी दिनों नये जनवादी पथ पर एक निर्णायक भूमिका ग्रहण करने वाली थी।
साहित्य के क्षेत्र में व्यक्तिवादी महत्वाकांक्षाओं का मिलना बहुत आम बात है। लेकिन इससे साहित्यिक धारा को क्षति पहुँचती है। दो-चार लेखक मिलकर आखिर-कार कब तक अपना जेब खर्च काट कर लघु पत्रिकाएँ निकाल पाते । फिर अधिक समय तक सम्बन्धों में परस्पर निर्वाह नहीं हो पाने के कारण फूट पड़ जाती थी। एक साथ काम कर रहे लेखक रूठकर अलग-अलग हो जाते थे। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि वे अशक्त हो जाते थे और ग़लतफ़हमी में एक दूसरे को ही अपना प्रधान शत्रु मान बैठते थे इससे व्यवस्था को फ़ायदा पहुँचता था। व्यावसायिक पत्रिकाएँ खुश होती थीं। आमतौर पर थक-हारकर लेखक अंततः इनकी शरण में चले जाते थे। पूँजीपति वर्ग और इनके दलालों को लगता था कि यह उनकी विजय है। लेकिन यह उनका भ्रम होता था। कईयों को यह भी लगा कि समाज में साहित्य की उपयोगिता समाप्त होती जा रही है और किसी के लिए भी अब यह एक बुनियादी आवश्यकता की वस्तु नहीं रह गई है। अगर राजनीतिक बहसें चलती रहें अथवा व्यावसायिक धन्धों में मुनाफ़ा बढ़ता जाए, तो फिर साहित्य की ओर उलट कर देखने की किसे फ़ुर्सत है ? लेकिन जनप्रतिरोधों के साथ-साथ साहित्यिक पत्रिकाएँ एक नये और प्रखर तेवर के साथ पुनः तेजी से उभरने लगीं इनके साथ एक नया खून अभिव्यक्त होने लगा। जनवादी पत्रिकाओं का नया रूप सामने आया।
लघु पत्रिकाओं को लेखकों में कुछ बिखराव आया था, लेकिन सातवें दशक के उत्तरार्द्ध से इन लेखकों ने अपनी इस कमजोरी का थोड़ा-बहुत अनुभव कर लिया कि लघु पत्रिकाओं की मूलभूत विफलता यह थी कि इनके पास पाठक वर्ग का अभाव था। उधर व्यावसायिक पत्रिकाओं का क्षेत्र महिलाओं, बच्चों, परिवारों, युवकों के बीच बढ़ता जा रहा था और इधर लघु- पत्रिकाओं के उतने ही पाठक थे, जितने इनके रचनाकार । अब सवाल यह है कि इनके पाठक कैसे मिल सकते हैं ?
साहित्य को जीवित रखना हो, तो जनता में साहित्यिक रुचि को जीवित रखना पड़ेगा। साथ ही साहित्य को जनसंघर्ष में हिस्सेदारी ग्रहण करनी पड़ेगी। न केवल इसकी समस्याओं से जुड़ना होगा, बल्कि रचनाकारों को इसके बीच रहकर काम करना होगा सिर्फ लिखने की मेज़ से बँधें रहने पर पाठक नहीं मिल सकते । जिस रूप (फार्म) में जनता रचनाकारों की बात समझ सकती है, उस रुप का नया कलात्मक विकास करना चाहिए । इसके लिए ‘लोकरूपों’ को माँजना तथा इन्हें अपनी अभिव्यक्ति के लिए उपर्युक्त बनाना होगा । हम अपनी बातें समझेंगे और पत्रिकाएँ खरीदेंगे। लेखकों को अपनी कोई खास बात कहनी हो, तो व्यक्तिगत चिट्ठियों के माध्यम से कह सकते हैं. इसके लिए किसी साहित्यिक विधा को बिगाड़ कर उन्हें क्या मिलेगा। बात अगर अपनी हो तो उसमें दूसरों के लिए भी कुछ हो। तभी रचना की पीड़ा सार्थक होती है।
जनवादी पत्रिकाओं में ‘आमुख’, ‘उत्तराद्ध’, ‘पहल’, ‘पश्यन्ती’, ‘क्यों’, ‘कथा’, ‘ओर’, ‘आवाम’, ‘मित्र’, ‘कंक’, ‘सर्वनाम’, ‘भंगिमा’, ‘बोध’, ‘बहस’, ‘युग-परिबोध’, ‘आवाज़’, ‘पुरुष’, ‘आईना’, ‘बीजपत्र’, ‘रक्तबीज’, ‘यथार्थ’, ‘दस्तावेज’, ‘कथन’, ‘आवेग’, ‘ज़मीन’, ‘सोच’, ‘प्रतिमान’, ‘सम्भावना’, ‘साहित्य-निर्झर’, ‘दीर्घा’, ‘सम्प्रेषण’, ‘उत्तरगाथा’, ‘अभिव्यंजा’, ‘इबारत’, ‘तत्काल’, ‘प्रतिबद्ध कविता’, ‘समझ’, ‘हिरा-वल’, ‘इसलिए’, ‘इस बार’, ‘उत्तरशती’, ‘गवाह’, ‘मंच’, ‘युवा’, ‘सिर्फ’, ‘हथियार’, आदि पत्रिकाएँ विभिन्न स्तरों पर निकलीं। इससे लोकतांत्रिक चेतना को बढ़ावा मिला। कुछ पत्रिकाओं में इस चेतना से भटकाव भी हुआ लेकिन ये पुनः संभल गईं । लेकिन इधर जनपत्रिकाओं में पुनः एक उतार आ गया है तथा बहुत-सी पत्रिकाएँ बन्द होती जा रही हैं।
जनता की साहित्यिक पत्रिका या जनवादी पत्रिका के उपरोक्त आदर्श रूप पर आज कौन सी पत्रिकाएँ चल रही हैं और कौन-सी-नहीं-इस पर हम अभी नहीं जाते हैं। इतना अवश्य कहेंगे कि लघु पत्रिकाओं की गुटबन्दी और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हिन्दी की कई जनवादी पत्रिकाओं में भी प्रवेश प्रवेश कर गई है। जब राजनीति के स्तर पर जनवाद और वामपंथ की चेतना सुविधावाद, अवसरवाद, संकीर्णता तथा भटकाव की शिकार हो जाती है तो साहित्य में भी इसके अत्यन्त वीभत्स रूप देखने को मिलते हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं को कभी भी गन्दी संसंदीय राजनीति के समीकरणों पर नहीं चलना चाहिए, बल्कि हमेशा संघर्षशील जनवर्ग के पक्ष में खड़ा होना चाहिए, सच को सच, गलत को गलत कहना अच्छे साहित्य का प्रधान गुण है। लेकिन कई लोग यथार्थ स्थिति से कतरा कर चलने में अभ्यस्त हो जाते है। कई जनवादी पत्रिकाओं में दादा-गीरी और महंती चल रही है, छुआछूत बरता जा रहा है, व्यक्तिगत पसन्द-नापसन्द को बढ़ावा दिया जा रहा है, तो ये सभी इस बात के संकेत हैं कि हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं में अभी भी जनवादी आंदोलन अपने वास्तविक रूप में उभर नहीं पाया है तथा इनमें साहित्यिक चीज़ों को अधिक महत्व देने के साथ लघु पत्रिकाओं के ही कई दोषों को राजनैतिक आवरण डालकर अपना लिया गया है। फलतः साहित्यिक रचनाकारों पर जिस तरह के अत्याचार व्यावसायिक पत्रिकाओं की ओर से होते हैं, वैसे ही कई जनवादी पत्रिकाओं के कठमुल्ले सम्पादकों की ओर से भी होते हैं। चूँकि ये संपादक भी छोटे व्यावसायिक घरानों के चाटुकार होते हैं, अतः पत्रिका निकालने के लिए पूँजी जुटाने के धूर्ततापूर्ण कौशल और साहित्यिक तीर्थयात्राओं के कारण ये जनवादी रचनाओं के न्यायाधीश बन जाते है। जो इनकी चमचागीरी करते हैं, उन्हें ये छापते हैं, अन्यथा बाकी को तरह-तरह के झूठे आरोप लगाकर खारिज कर देते हैं। किसी व्यावसायिक पत्रिका के सम्पादक से कम दम्भ इन छद्म जनवादी सम्पादकों में नहीं होता। तथा ये कम भ्रष्ट नहीं होते । जिस प्रकार लघु पत्रिका के नाम पर सम्पादकों ने अपना छोटा-मोटा व्यावसाय भी चलाया और विज्ञापनों से आमदनी की, कुछ जनवादी पत्रिकाओं के नाम पर वैसे ही लघु उद्योग चल रहे हैं। इस पत्रिकाओं के कुछ सम्पादकों का लक्ष्य सरकारी और औद्योगिक क्षेत्र में विज्ञापन-दाताओं तथा जन-सम्पर्क अधिकारियों से सम्पर्क बनाना तथा नाम और धन कमाना रहता है। ये व्यवस्था के मूल्यों के पक्षधर होते हैं और क्रांतिकारी या साहित्य-प्रेमी बनने का भी ढोंग करते हैं। ऐसी पत्रिकाओं को लघु या जनवादी पत्रिका नहीं कहा जा सकता ।
जनवादी पत्रिकाओं के अलावा कई ऐसी साहित्यिक पत्रिकाएँ भी है, जो व्यावसायिक क्षेत्रों से निकलती हैं ‘आलोचना’, ‘नई कहानियाँ’, ‘कहानी’, ‘नया प्रतीक’ ऐसी ही पत्रिकाएँ थीं। सरकारी क्षेत्रों से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं में ‘पूर्वग्रह’,‘साक्षात्कार’ वगैरह हैं। व्यापक अर्थों में इन पत्रिकाओं के योगदान को झुठलाया नहीं जा सकता लेकिन यह साहित्यकारों के जनवादी आन्दोलन की विफलता है कि अभी तक हमारी दस नियमित पत्रिकाएँ भी नहीं निकल पा रहीं । इससे अधिक लज्जाजनक बात और क्या है कि अभी हिन्दी में एक भी मासिक साहित्यिक पत्रिका नहीं है। यहाँ लोकतांत्रिका पद्धति से बहस की जा सके, ऐसी बहुत कम पत्रिकाएँ हैं । कई पत्रिकाएँ तो कुछ इने-गिने रचनाकारों की रखैल बनकर रह जाती हैं। ‘अणिमा’ और ‘कहानीकार’ जैसी पत्रिकाओं के उदाहरण हैं, जो प्रारम्भ तो लघु पत्रिकाओं के रूप में हुई थीं, लेकिन धीरे-धीरे व्यावसायिक पत्रिका बन गई। अतःस्पष्ट कर लेना चाहिए कि लघु पत्रिका, जनवादी पत्रिका, व्यावसायिक पत्रिका, रखैल पत्रिका के बीच हम सीमा रेखा किस प्रकार और किस आधार पर खींचेंगे । सरकारी साहित्यिक पत्रिकाओं को किस रूप में लेंगे ? व्यावसायिक पुस्तक-प्रकाशनों से हमारा क्या सरोकार होगा ? ये बातें बहस से तय होंगी।
आज की हालत में साहित्यिक पत्रिकाओं का दायित्व बढ़ गया है। इन्हें व्यावसायिकता और कठमुल्लेपन दोनों से संघर्ष करना है। रचनात्मक साहित्य को महत्व देना है। और जनवादी मूल्यों का सही विकास करना है। किसान फसल पैदा करता है, मजदूर परिश्रम करता है, उसी प्रकार रचनाकार लिखता है। जब वह लिखता है, तो उसे छपने के स्थल की ज़रूरत पड़ती है। वह कहाँ छपे? कैसे अधिक पाठकों तक उसकी बात पहुँचे ? किस प्रकार उनसे लेखन का उचित पारिश्रमिक मिले ? ये ऐसी समस्यायें हैं, जो हमारे देश में अभी भी बहुत विकट रूप में हैं। कई लोग यह उपदेश देंगे कि लेखक को अपनी रचनाओं के छपने की इतनी चिन्ता क्यों होनी चाहिए। और पारिश्रमिक का भी ऐसा आग्रह क्यों? ऐसे लोग नहीं समझ सकते कि रचनाकार के मन में कितनी पीड़ा होती है कि उसकी रचनाएँ छपें। इस छपने की पीड़ापूर्ण इच्छा के आगे वह अपने पारिश्रमिक के अधिकार को भी दबा देता है। लघु पत्रिकाएँ के आगे वह अपने पारिश्रमिक के अधिकार को भी दबा देता है। लघु पत्रिकाएँ या जनवादी साहित्यिक पत्रिकाएँ उसे पारिश्रमक नहीं दे सकतीं। लेकिन प्यार और सम्मान तो दे सकतीं हैं। वे देती भी हैं। इस तरह लेखकों का एक कितना सुन्दर परिवार बनता है, जिसके सदस्यों के अलग-अलग विचार, अनुभव, विधाएँ, स्तर हो सकते हैं, लेकिन ये लेखक कुछ न्यूनतम मुद्दों पर साथ जुड़े रहते हैं, साथी-भाव से संघर्ष करते हैं, एक दूसरे के जीवन के दुखों को बाँटते हैं। बहस करते हैं और जनता के स्वप्नों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ जाते हैं। ये लघु पत्रिकाएँ ही सृजनशील लेखकों के क्रांतिकारी घर होते हैं। इस दिशा में अगर संयुक्त और असरदार प्रयास किए जाएँ, तो लेखक आखिरकार इधर-उधर भटककर मुँह क्यों मारे। साथ-साथ चलते हुए ही हम अपने को बदल सकते हैं। अतः किसी भी रचनाकार को हीन मत समझो । कल वह हमारा साथी बन सकता है ।
कोलकाता ◙◙◙
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