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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

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 मूल्याँकन

 

राष्ट्रपिता गाँधी का साहित्यकार रूप


डॉ. सुशीला गुप्ता

 

Mahatma Gandhi (महात्मा गाँधी)ह बात सर्वविदित है कि महात्मा गाँधी पर जितना साहित्य लिखा गया, उतना शायद ही किसी अन्य मनीषी, चिन्तक, विचारक या साहित्यकार पर लिखा गया है। गाँधी पर सबसे पहले किसने पुस्तक लिखी, इसके बारे में कुछ कहना तो कठिन है, लेकिन हाल ही में प्रकाशित पुस्तकों में से एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित 'आस्था पुरुष', जिसके लेखक हैं त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद।

 

इस लेख का प्रयोजन गाँधी-साहित्य पर विमर्श का नहीं, बल्कि महात्मा गाँधी द्वारा लिखित साहित्य के अवलोकन का है। वस्तुत महात्मा गाँधी ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने सत्य के अपने प्रयोग के बारे में अनवरत लिखा। संसार का शायद ही ऐसा कोई जीवनोपयोगी विषय होगा, जिस पर गाँधीजी ने प्रयोग नहीं किया हो और शायद ही उनका कोई प्रयोग हो, जिस पर उन्होंने लेखनी नहीं उठायी हो। प्रोअ सिद्धेश्वर प्रसाद ने लिखा है, ''मानव जीवन की शायद ही कोई प्रवृत्ति हो, जिसे उन्होंने अपने कार्यक्रम में शामिल न किया हो और जीवन के किसी भी पक्ष की, छोटी-से-छोटी, शायद ही कोई बात हो, जिस पर उन्होंने क़लम न चलायी हो। इस रूप में वे मानव-इतिहास के सबसे बड़े प्रबंधक और प्रवृत्ति-प्रवर्त्तक के साथ-साथ संप्रेषक थे। किसके जीवन को, किस कार्य को, किस प्रवृत्ति को उन्होंने अपना स्नेह-सिंचन नहीं दिया? हर व्यक्ति में छिपे देवत्व को उन्होंने जगाने की कोशिश की, हर पतित को उन्होंने उठाने की कोशिश की। 'जे पीड़ पराई जाने रे' उनके लिए भजन नहीं, बल्कि कण-कण में व्याप्त ईश्वर की प़ीड़ा का जीवित अनुभव था।''

 

महात्मा गाँधी द्वारा लिखित पुस्तकों की संख्या कुल मिलाकर चालीस के आसपास है, जिनका प्रकाशन सर्व सेवा संघ, सस्ता साहित्य मण्डल, नवजीवन और सर्वोदय मण्डल आदि ने किया है। उनकी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तकें हैं-'सत्य के प्रयोग' अथवा 'आत्मकथा', 'अनासिक्त योग', 'सर्वोदय', 'मेरे सपनों का भारत', 'विद्यार्थियों को संदेश', 'महिलाओं से', 'पंचरत्न' आदि। ये सारी पुस्तकें गुजराती भाषा में हैं, जिनके हिन्दी अनुवाद उपलब्ध हैं।

 

महात्मा गाँधी की पुस्तकों को पढ़ने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वे आवश्यकता पड़ने पर अपने पुराने विचारों को त्याग कर नये विचार बड़ी तत्परता से अपना लेते थे। उन्होंने एक जगह लिखा है, ''जब किसी को मेरे दो लेखों में विरोध जैसा लगे, तब अगर मेरी समझदारी में विश्वास हो तो वह एक ही विषय के दो लेखों में से मेरे बाद के लेख को प्रमाणभूत माने।'' हमें गाँधीजी के इस विचार से सहमत होना पड़ेगा कि नित नये प्रयोग के कारण विचारों में नवीनता का आना स्वाभाविक है।

 

महात्मा गाँधी के जीवन, सिद्धान्त और कार्यपद्धति की पूरी झाँकी उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा' में मिलती है। अपने प्रति इतनी ईमानदारी और अन्तर्मन के विचारों का ऐसा बेबाक उद्घाटन विश्व के शायद ही किसी ग्रंथ में मिलेगा। यह विशेषता लेखक के पारदर्शी व्यक्तित्व के कारण है। इस पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है, ''यदि मुझे केवल सिद्धातों का अर्थात् तत्त्वों का ही वर्णन करना हो, तब तो यह आत्मकथा मुझे लिखनी ही नहीं चाहिए। लेकिन मुझे तो उन पर रचे गये कार्यों का इतिहास देना है और इसीलिए मैंने इन प्रयत्नों को 'सत्य के प्रयोग' जैसा पहला नाम दिया है।...यह सत्य स्थूल वाचिक सत्य नहीं हैं। यह तो वाणी की तरह विचारों का भी सत्य है। यह सत्य केवल हमारा कल्पित सत्य नहीं है, बल्कि स्वतत्र चिरस्थायी सत्य है।''

 

श्री कमल किशोर गोयनका का विश्वास है कि ''आदर्श पुरुषों में एक बड़ी सिफ़त यह होती है कि अपनी ग़लती तस्लीम करने में वे ज़रा भी आगा-पीछा नहीं करते।'' महात्मा गाँधी की इसी सिफ़त ने उन्हें इतना महान बना दिया कि सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टाइन को उनके बारे में यह कहना पड़ा कि आनेवाली पीढ़ियाँ मुश्किल से यह विश्वास कर सकेंगी कि हमारे बीच हाड़-मांस का ऐसा चलता-फिरता आदमी पैदा हुआ था।'' गाँधीजी मौखिक रूप से ही नहीं, लिखित रूप से अपनी ग़लतियाँ स्वीकार करते थे, ग़लतियों से सब़क सीखते थे, जो सब़क सीखते थे, वह अपने ऊपर लागू करते थे और दूसरों को स्वयं पर लागू करने के लिए प्रेरित करते थे। वे ही सब़क उनके सिद्धान्त थे - गाँधी-सिद्धान्त थे। उनकी आत्मा-कथा में इन्हीं सब बातों का वर्णन है बिना किसी लाग-लपेट के, बिना किसी दुराव-छिपाव के। चाहे विषयासक्ति की बात हो, चाहे एक सामान्य विद्यार्थी होने की हो, चाहे चोरों की तरह छिपकर मांसाहार करने की हो, चाहे जूठी बीड़ी चुराकर पीने की लत हो, चाहे गोरे अधिकारियों द्वारा बार-बार अपमानित किये जाने की हो - सब-कुछ उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है। ऐसी घटनाएँ आत्म-निरीक्षण के लिए प्रेरित करती हैं और आत्म-निरीक्षण आत्म-परिष्कार का मार्ग प्रशस्त करता है तथा आत्म-परिष्कार अपने साथ-साथ दूसरों का भी परिष्कार करता है। इन्हीं सब प्रक्रियाओं की अभिव्यक्ति का नाम है 'सत्य के प्रयोग अर्थात् आत्मकथा'

 

आत्म-परिष्कार ने ही महात्मा गाँधी को आत्मशुद्धि का मार्ग दिखाया, सत्य की अनुभूति करायी और दिखाया अहिंसा का मार्ग। अपनी आत्मकथा के अन्त में उन्होंने ये उद्गार प्रगट किये हैं, ''मन के विकारों को जीतना, संसार को शस्त्र-युद्ध से जीतने की अपेक्षा भी मुझे कठिन मालूम होता है। हिन्दुस्तान आने के बाद भी मैं अपने अन्दर छिपे हुए विकारों को देख सका हूँ, शर्मिन्दा हूँ, किन्तु हारा नहीं। सत्य के प्रयोग करते हुए मैंने रस लूटा है, आज भी लूट रहा हूँ। लेकिन मैं जानता हूँ कि अभी मुझे विकट मार्ग पूरा करना है। इसके लिए मुझे शून्यवत बनना है। जब तक मनुष्य स्वेच्छा से अपने को सबसे नीचे नहीं रखता, तब तक उसे मुक्ति नहीं मिलती। अहिंसा नम्रता की पराकाष्ठा है। और यह अनुभव-सिद्ध बात है कि इस नम्रता के बिना मुक्ति कभी मिलती नहीं।''

 

महात्मा गाँधी ने सत्य के प्रयोग के लिए जिस तरह अपनी आत्मकथा लिखी, उसी ढर्रे पर गीता का अपने ढंग से अनुवाद किया। यह स्वीकार करते हुए कि उनको संस्कृत और गुजराती भाषा का अनुवाद करने लायक ज्ञान नहीं है, उन्होंने गंदे साहित्य और नकारात्मक साहित्य की बाढ़ से जन-साधारण को बचाने के लिए गीता का अनुवाद किया और उसे 'अनासक्तियोग' नाम दिया। इस कार्य में उन्हें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के 'कर्मयोगशास्त्र' से प्रेरणा मिली। उन्होंने अपनी पुस्तक में गीता का अनुवाद करके और आवश्यकतानुसार टिप्पणी देकर जीवन के मूलभूत सिद्धान्त अनासक्तियोग का प्रतिपादन किया।

 

महात्मा गाँधी दावे के साथ कहते हैं कि ''गीता ऐतिहासिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि इसमें भौतिक युद्ध के बहाने प्रत्येक मनुष्य के हृदय के भीत होते रहनेवाले द्वद्व-युद्ध का ही वर्णन है, मानुषी योद्धाओं की रचना हृदयगत युद्ध को रोचक बनाने के लिए गढ़ी हुई कल्पना है।'' उनके अनुसार ''मनुष्य का शरीर ही धर्मक्षेत्र रूपी कुरुक्षेत्र है, जिसमें अच्छी और बुरी वृत्तियों का युद्ध चलता रहता है। महाभारत के पात्र अपने मूल रूप में ऐतिहासिक भले ही हों, उनका उपयोग व्यास भगवान ने केवल धर्म का दर्शन कराने के लिए ही किया है।''

 

जो अनगिनत लोग अपने जीवन में काम को महत्त्व नहीं देते, बिना परिश्रम किये अपना व़क्त गुजारते हैं, गाँधीजी उनकी आँखें खोलने का प्रयत्न करते हैं। उनके अनुसार कर्म किये बिना मनुष्य का कल्याण हो ही नहीं सकता। वे कहते हैं, ''जहाँ शरीर है, वहाँ कर्म तो है ही'' - जो लोग कर्म को बन्धन मानते हैं, गाँधीजी उन्हें ढोंगी मानते हैं - ऐसे ढोंगी लोगों को अपनी चारपाई से उतरना भी गवारा नहीं, वे ढोंगी हाथ से लोटा उठाना भी कर्म-बन्धन मानते हैं - ऐसे लोग अपने कर्म को त्यागकर अपने जीवन का क्षय करते हैं। गाँधीजी के अनुसार ''कर्म-बिना किसी ने सिद्धि नहीं पायी, जनक आदि भी कर्म द्वारा ज्ञानी हुए। यदि मैं भी आलस्य-रहित होकर कर्म न करता रहूँ तो इन लोकों का नाश हो जाय।'' वे कर्म की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि ''हमारी शारीरिक और मानसिक सभी चेष्टाएँ कर्म हैं।'' गीता में जिस तरह कर्म करते हुए भी बन्धन-मुक्ति का रास्ता बताया गया है, वह अन्य किसी ग्रंथ में नहीं मिलता। कर्म को धर्म से जोड़ने का काम गाँधीजी ही के बस का था, उन्होंने कर्म की भावना को धर्म के स्तर तक लाकर धर्म को संकीर्णता के घेरे से बाहर निकाला और कर्म को निष्काम कर्म का दर्जा दिया। वे कर्म करते हुए भी बन्धन-मुक्त रहने पर ज़ोर देते हैं। उन्हीं के शब्दों में गीता का उपदेश है - ''फलासक्ति छोड़ो और कर्म करो, निष्काम होकर कर्म करो। जो कर्म छोड़ता है, वह गिरता है, कर्म करते हुए भी जो उसका फल छोड़ता है, वह चढ़ता है। फल-त्याग का मतलब यह नहीं कि परिणाम के सम्बन्ध में लापरवाह रहे, परिणाम और साधन का विचार और उसका ज्ञान अति आवश्यक है। ज्ञान होते के बाद जो मनुष्य परिणाम की इच्छा किये बिना साधन में तन्मय रहता है, वह फलत्यागी है।''

 

महात्मा गाँधी यह मानते थे कि ''गीताकार की भाषा के अक्षरों से यह बात भले ही निकलती हो कि सम्पूर्ण त्यागी द्वारा भौतिक युद्ध हो सकता है, किन्तु गीता की शिक्षा को पूर्ण रूप से अमल में लाने के बाद चालीस वर्षों तक सतत प्रयत्न करने पर मुझे तो नम्रतापूर्वक ऐसा जान पड़ा कि सत्य और अहिंसा का पूर्ण रूप से पालन किये बिना सम्पूर्ण कर्मफल-त्याग मनुष्य के लिए असम्भव है।''

 

गाँधीजी का दृढ़ मत था कि ''गीता में ज्ञान की महिमा सुरक्षित है, तथापि गीता बुद्धिगम्य नहीं है, वह हृदय-गम्य है। अत वह अश्रद्धालुओं के लिए नहीं है। वह विधि-िनषेध बतानेवाला ग्रंथ नहीं है - हाँ, निषिद्ध केवल फलासक्ति है, विहित है अनासक्ति।''

 

मिअ पोलाक ने महात्मा गाँधी को रस्किन की पुस्तक 'अंटु दिस लास्ट' उस समय दी, जब वे जोहानिसबर्ग से ट्रेन द्वारा नेटाल के लिए रवाना हुए। चौबीस घंटे के सफ़र में उन्होंने पूरी पुस्तक पढ़