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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 लघुकथा

 

असमंजस

 

क खूबसूरत प्रेमी प्रेमिका, चाँदनी रात में, यमुना नदी के किनारे बैठे, यमुना के जन में पड़ रही ताजमहल की परछाई को मुग्ध होकर देख रहे थे।

 

उस परछाई को देखकर प्रेमी के मन में शायर की यह आ गई। फिर वह सोचने लगा कि, एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल सारी दुनियां को मोहब्बत की निशानी दी है। या एक शहंशाह ने बनवा के हसीन ताजमहल हम गरीबों के मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक।

 

देखने के क्रम में सोचने का क्रम भी अचानक जुड़ गया, सोचते-सोचते वह असमंजस में पड़ने लगा और विचारों  के द्वंद में घिरने लगा। जब कोई हल निकल नहीं पाया, तो उसनें एक कंकड़ उठाकर शांत यमुना में फेंक दिया, नहीं में तरंगों की हचलच बिखर गई, उस हलचल को देखकर वह नाच-नाचकर, गाने लगा कि - मैने ताजमहल को हिला दिया, जमुना के जल में एक कंकड़ फेंककर

राम पटवा

एन-3 साकेत बसंत पार्क कॉलोनी,

महावीर नगर, न्यू पुरैना, रायपुर-6

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 समकालीन लघुकथाएँ

राम पटवा

डॉ. विद्याबिन्दु सिंह

भगवान देव चैतन्य

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