साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच SRIJANGATHA
।।सृजनगाथा।।
ई-पताः srijangatha@gmail.com
वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007
अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार
मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक
बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ
कविता
बुरका
तुम बार-बार कहते हो
और मुझे ज़रा भी
यकीन नहीं होता
इसे मेरे लिए
ख़ुद ख़ुदा ने बनाया है
तुम्हारे हुक़्म पर जब भी
पहनती हूँ इसे
कतई स्वीकार नहीं करती
मेरी नुची हुई देह
स्वीकार नहीं करती
हर बार चीख-चीखकर
कहती है
नहीं इसे ख़ुदा ने नहीं
तुमने बनाया है
मेरा ख़ुदा कहलाने के लोभ में
मुझे इसे तुमने पहनाया है
पवन करण
सावित्री, आई-10, साइट न.1
सिटी सेंटर, ग्वालियर,
मध्यप्रदेश - 474002
◙◙◙
इस अंक के कवि
डॉ. बलदेव वंशी
सुभाष नीरव
हीरामन सिंह ठाकुर
माह के कवि
डॉ. महेंद्र भटनागर
प्रवासी कवि
शकुंतला बहादुर - युएसए
अजय त्रिपाठी - इंग्लैंड
बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ
संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति
तकनीकः प्रशांत रथ
WWW http://www.srijangatha.com