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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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  कविता

सर्वशक्तिमान

स्वतः खंडित करता है सूर्य

सर्वशक्तिमान होने का दंभ

यद्यपि अवतरित होता है

पूर्व की अपूर्व लालिमा से

हो जाता है मध्यान्ह में प्रचंड

अरुणिम ऊर्जा से भरता है ब्रह्मांड

 

कालचक्र के व्यूह में गिरफ़्त

हो जाता है पल में वर्ण-विवर्ण

सिमट जाता है सारा आकाश

हो जाता है अंधकार क्षितिज के पास

 

सिंदूरी आभा, बोझिल कंधे

छुप जाता है दंभ का अवसाद

सारे प्रश्न रह जाते हैं अनुत्तरित

रह जाता है केवल मौन

फिर से मथती है मनीषा

ब्रह्मांड का नियंता जाने कौन

आख़िर इसको जाने कौन

 

टूट ही जाता है सारा अभिमान

कौन ब्रह्मांड का सर्वशक्तिमान

स्वतः खंडित कर देता है सूर्य

सर्वशक्तिमान होने का मिथ

  हीरामन सिंह ठाकुर

संपादक, राष्ट्रीय समचार एजेंसी

जी - 2, ए.ई.सी. कॉलोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़ - 492001

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 इस अंक के कवि

डॉ. बलदेव वंशी

पवन करण

सुभाष नीरव

हीरामन सिंह ठाकुर

माह के कवि

डॉ. महेंद्र भटनागर

प्रवासी कवि

शकुंतला बहादुर - युएसए

अजय त्रिपाठी - इंग्लैंड

 

 

 

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