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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

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  कविता

शकुंतला बहादुर की दो कविताएँ

उधेड़-बुन      

 

सलाइयों पर कुछ फन्दे डाल

मैं बिनती रही, बिनती ही रही !

कभी कुछ घटाती कभी कुछ बढाती

कभी कुछ गिराती कभी कुछ उठाती 

कभी उधेड़ देती और फिर से बिन लेती !

बिनाई को आकार देने के प्रयास में 

बार-बार भूलें सुधारती रही

निरंतर य़त्न से जुटी रही  

बिनती रही, बिनती ही रही !

 

तभी मन में बिजली -सी कौंध गई

और --- पल भर को

मैं विचारों में खो गई !

 

समय की सलाई पर

पलों के फन्दों को डाल 

निरन्तर बिनते ही तो रहते हैं !

अतीत को उधेड़ते और

भविष्य को बुनते हैं

कभी कुछ घटाते और कभी कुछ बढ़ाते हैं

कुछ याद करते और कुछ बिसराते हैं !

कभी कोई पूरा जीवन बिन जाता है

तो किसी का अधूरा छूट जाता है !

इसी उधेड़-बुन में सारा जीवन बीत जाता है !

 

मुक्ति

साँस की ज़ंजीर से ही

प्राण बंधन में बँधे हैं !

और प्राणों से सदा ही

मोह के रिश्ते जुड़े हैं !

पलक मुँदते साँस की ज़ंजीर टूटे 

मोह के ये तार भी सब  

झनझना एक साथ छूटे !

शकुन्तला बहादुर  

Dr. Shakuntala Bahadur

3855 Baldwin Drive , Santa Clara , CA 95051 U.S.A.

 

 ◙◙◙

 

 इस अंक के कवि

डॉ. बलदेव वंशी

पवन करण

सुभाष नीरव

हीरामन सिंह ठाकुर

माह के कवि

डॉ. महेंद्र भटनागर

प्रवासी कवि

शकुंतला बहादुर - युएसए

अजय त्रिपाठी - इंग्लैंड

 

 

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