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संजय ग्रोवर की पाँच ग़ज़लें चार हक़ीकत में नहीं कुछ भी दिखा है क़िताबों में मगर सब कुछ लिखा है
मुझे समझा के वो मज़हब का मतलब- डर औ' लालच में आए दिन बिका है
जो रात और दिन पढ़ा करते हो पोथेकभी उनका असर ख़ुदपर दिखा है !
जब हाथों से नहीं कुछ कर सका वो तो बोला ये ही क़िस्मत में लिखा है
असल में रीढ़ ही उसकी नहीं है वो सदियों से इसी फन पे टिका है
'संवादघर' एल-76ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-95 ◙◙◙ |
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