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संजय ग्रोवर की पाँच ग़ज़लें दो जबकि इक वलवला-सा रहता था मुझमें तब भी ख़ला-सा रहता था
पैर धरती से बात करते थे जीभ पर आबला-सा रहता था
आज उसने दबी ज़ुबां में कहा कल मेरा दबदबा-सा रहता था
वो जो अपने हैं, काम आएंगे कम-अज़-कम ये दिलासा रहता था
उसने मेरे लिए कहा होगा एक लड़का भला सा रहता था
'संवादघर' एल-76ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-95 ◙◙◙ |
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