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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

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  बचपन

फूलों की पाठशाला

 

खुली पाठशाला फूलों की

पुस्तक-कॉपी लिए हाथ में

फूल धूप की बस में आए

 

कुर्ते में जँचते गुलाब तो

टाई लटकाए पलाश हैं,

चंपा चुस्त पज़ामें में है -

हैट लगाए अमलताश है ।

 

सूरजमुखी मुखर है ज़्यादा

किंतु मोंगरा अभी मौन है,

चपल चमेली है स्लेक्स में

पहचानों तो कौन-कौन है ।

 

गेंदा नज़र नहीं आता है

जुही कहीं छिपाकर बैठी है,

जाने किसने छेड़ दिया है -

ग़ुलमोहर ऐंठी-ऐंठी है ।

 

सबके अपने अलग रंग हैं

सब हैं अपनी गंध लुटाए,

फूल धूप की बस में आए -

मुस्कानों के बैग सजाए ।

 

डॉ. तारादत्त निर्विरोध

254, पद्मावती कॉलोनी, ए

अज़मेर रोड़, जयपुर

राजस्थान 302019

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 बाल कविताएँ

डॉ. तारादत्त निर्विरोध की कविता

फूलों की पाठशाला

चिट्ठी का भूगोल

भालू बोला

हरीश दुबे -

नानाजी का चश्मा

 

 

 

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