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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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व्यंग्य

 

 

धृतराष्ट्र का मुक्तिबोध 


मुरली मनोहर श्रीवास्तव

 

धर्म क्षेत्रे कुरुक क्षेत्रे  सामवेता युयुत्सव:  माम का  पांडवा श्चयव किम कुरुत: संजय  

हे संजय, महाभारत की कथा सर्वयुगींन है, तुम अपने दिव्य नेत्रो से देख कर वर्तमान महाभारत का आँखो देखा हाल सुनाओ।

संजय न्यूज सेंटर में बैठा था हर बडे छोटे शहर में उसके सूचक लगे थे और वह छाँट- छाँट कर खबरें एडिट कर रहा था

संजय उवाच हे श्रेष्ठ पुरुष  आपकी पीढियाँ कुरुक्षेत्र  (वर्तमान दिल्ली ) के रण भूमि में वाक् युद्ध करने को तैयार हैं । वर्तमान युद्ध धर्म युद्ध की श्रेणी में आता है कि नहीं इसका निर्णय मैं नहीं  समय करेगा। मैं निरपेक्ष भाव से एक दृष्टा की तरह मात्र इसका वर्णन करूँगा।

हाँ संजय तुम मुझे एक एक क्षण और घटना का सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हाल मुझे सुनाओ । मैं धॄतराष्ट्र हूँ पर ये जो सन्तानें हैं यह मेरे कुल की ही हैं  अत: मैं इनके गुण अवगुण धर्म अधर्म  जानने का अधिकारी हूँ  । धृतराष्ट्र बोले।

 

संजय ने बोलना प्रारंभ किया हे श्रेष्ठ पुरुष देश काल परिस्थितियों के अनुसार युद्ध का समय सायंकालीन बेला में साढें सात बजे सुनिश्चित हुआ है। आज यह प्रेस क्लब के मैदान पर लडा जायेगा। सभी मीडिया कर्मी अपने अपने हथियार अर्थात्  कैमरा मोबाईल टेपरिकार्डर फ़्लैश माईक आदि लेकर रणभूमि में प्रतीक्षा रत हैं । 

 

पांडव की सेना के प्रतिनिधि शीघ्र ही अपने मेक अप रूम से बाहर आ स्वच्छ धवल हाई टेक कुर्सियों पर बैठने वाले हैं । नि: संदेह पांडव वनवास झेल रहे हैं किन्तु वे भी अपनी नैतिक मर्यादा का पालन नहीं कर रहे हैं । जैसी की भीतर खानें खबरें आ रही हैं अपने अल्प कालिक शासन अवधि में इन्होने भी वही सब अनैतिक कार्य किये हैं जो कौरव वर्षो  से करते रहे हैं । अत: आज जब ये अपना वनवास समाप्त कर पुन: सत्ता की दावेदारी प्रस्तुत  करना चाहते हैं तो कौरव सेना के प्रमुख ने अपने गुप्तचरों द्वारा इनके कारनामों की फ़ाईल देश की जनता के सम्मुख प्रस्तुत कर दी है और आरोप लगाया है कि जब पांडव भी हमारी तरह भ्रष्ट निरंकुश और लम्पट हैं तो हस्तिनापुर में शासन करने का अधिकार हमें ही है। देश क्या हम इन्हें एक पंचायत का राज्य भी नहीं लेने देंगे। अपने ऊपर लगे इन आरोपों को निराधार बताते हुये तथा इनका जोरदार खंडन करते हुये पांडव सेना के प्रवक्ता आज मीडिया से मुखातिब होंने वाले हैं।  

 

धन्य हो दुर्योधन हे संजय तुम दुर्योधन के विजयी होंने की कामना करो और उसे रणभूमि में डटे रहने के लिये प्रेरित करो। मेरा आशीर्वाद सदैव उसके साथ है। जो अन्याय नेंत्रहींन होंने का कारण मेरे साथ हुआ वही अन्याय मैं, अयोग्य होंने के कारण अपने पुत्र के साथ नहीं होंने दूंगा। धॄतराष्ट्र बोले।

 

संजय अपने टेक्निशियनों को दुर्योधन से सम्पर्क करने का आवश्यक निर्देश दे पुन: धृतराष्ट्र से मुखातिब हुआ हे महाभारत के युगपुरुष अभी-अभी सूचना मिली है कि मोहग्रस्त हो अर्जुन ने शस्त्र उठाने से मना कर दिया है और वह पांडवों के कृत्यों के लिये बचाव में वाक् युद्ध नहीं करना चाहता । उसका कहना है कि अपनी गठबंधन सेना के कुकृत्यों का वह निरंतर अपने वाक् कौशल से बचाव करता रहा है, यहाँ तक कि अब  उसे आभास हो रहा है  गठबंधन ने उसके अचूक तीरों  का  अत्यधिक दुरुपयोग किया है।

 

संजय यह अत्यन्त प्रसन्नता प्रदान करने वाली खबर है। निश्चय ही अब मेरे पुत्र दुर्योधन की सत्ता अक्षुण्ण रहेगी। तुम्हें क्या लगता है इस अवसर पर कृष्ण फ़िर गीतोपदेश देंगे । 

 

हे श्रेष्ठ भारत वंशी पांडव खेमें लम्बे समय से उपेक्षित पडे मुरली मनोहर बिना प्रतीक्षा और आग्रह के अपना दायित्व निभाने को व्याकुल हैं । अब मैं सीधे आपको प्रेस क्लब के रणभूमि में लिये चलता हूँ । संजय ने कहा ।

 

अचानक धृतराष्ट्र का अट्टहास गूँजा हे संजय तुम अपना यह प्रसारण बंद करो मुझे नहीं सुनना यह प्रहसन । उधर रणभूमि से आवाज़ें आ रही हैं -

न खंजर उठेगा न तलवार इनसे

ये बाजू मेरे आजमाये हुये हैं

 

संजय चौका - हे स्वामीं आप आगे की कथा क्यों नहीं सुनना चाहते।

 

संजय मेरा विचार था कि नेत्रहींन होंने के कारण मेरे साथ अन्याय हुआ है  और मैं सदैव ही इस अन्याय का बदला सत्य बोलने वालों और धर्म पर चले वालों से लेना चाहता था किन्तु  जब पांडव और  कौरव के चरित्र एक से हो गये हैं तो इस युद्ध में मेरी रुचि समाप्त हो गयी है। पांडव जीतें या कौरव आज जीत इम्मेटिरियल हो गयी है। संजय ने इतना सुनने के बाद जैसे ही सिर से हेड फ़ोंन निकाला तो देखा धृतराष्ट्र अंतर्ध्यान हो गये हैं। 

 

विश्वस्त्र सूत्रों से पता चला है कि धृतराष्ट्र की आत्मा भारत के आम नागरिक में प्रवेश कर गयी है।  

 

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

 

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