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एक शब्द |
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बनाना गंगा प्रसाद गुप्त बरसैंया
‘बनाना’ का शाब्दिक अर्थ किसी वस्तु के निर्माण या रचना से होता है जैसे- चित्र बनाना, मूर्ति बनाना। पर यह ‘बनाना’ भिन्न-भिन्न प्रसंगों पर भिन्न अर्थों में प्रयुक्त होता है। ‘मूँह बनाना’ का अर्थ किसी व्यक्ति द्वारा अपनी अनिच्छा, अरुचि, घृणा या क्रोध या क्रोध की भावना को व्यक्त करना । यदि व्यक्ति की संबंधित कार्य में रुचि नहीं है तो वह बिना कुछ कहे ही ‘मूँह बनाना’ अपनी भावना व्यक्त कर देगा। कड़वी दवा पीने के समय इस प्रकार की भंगिमा देखी जा सकती है। ‘बात बनाना’ भी एक प्रयोग है। किसी बात को टालने के लिये जिसका सहारा लिया जाता है उसे बात बनाना ही तो कहते हैं। सामने वाला तपाक से कह देता है- भाई, बात मत बनाओ । वैसे बात कोई बनाई जाने वाली स्थूल वस्तु नहीं है। ‘बहाना बनाना’ भी ‘बात बनाने’ का सगा भाई प्रतीत होता है। वैसे ‘ज्यादा मत बनाओ’ या ‘हमें मत बनाओ’ का भी आजकल धड़ल्ले से प्रयोग किया जाता है। सो हम तो बने बनाये ही हैं। सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी ने ही हमें बना दिया है। पर कभी-कभी दुनिया के चतुर लोग जब अपनी चतुराई से मूर्ख बनाना चाहते हैं तब हम इसका प्रयोग कर अपनी समझदारी का बराबरी से सामनेवाले पर इजहार कर प्रसन्न हो जाते हैं।
‘बात बनाने’ का आशय केवल बहानेबाजी या टालमटोल ही नहीं है। विशिष्ट संदर्भ में बात बनाने का अर्थ किसी को सहारा देना अथवा प्रतिष्ठा की रक्षा करने से भी होता है। क्योंकि ‘बात’ का निकट संबंध व्यक्ति की प्रतिष्ठया इज्जत से भी है। तभी तो लोग कहते है कि हमारी ‘बात बनाना’ या ‘बात रखना’ अब आपके ही हाथ है। प्रतिष्ठा की रक्षा हो पर कहा जाता है कि भइया, आपने ऐन मौके पर हमारी ‘बात रख ली’ या ‘बात बना दी’। ‘काम बनाना’ भी इसी का पर्याय है। ‘रूप बनाना’ भी इसी की पड़ौसी है जो मौके पर काम हो जाने पर कहा जाता है- आपने हमारे दरवाजे का रूप बना दिया, बात बन गई।
‘अखाड़ा बनाना’ अथवा महाभारत बनाना ‘लड़ाई-झगड़े’ का द्योतक है। इससे लोग बचते हैं क्योंकि कोई भी आदमी अपने घर को ‘अखाड़ा बनाना’ पसंद नहीं करता । यों हलुवा बहुत ही सरस और स्वादिस्ट व्यंजन है, विशिष्ट अवसरों पर विशिष्ट जनों को परोसा जाता है। नीरस से नीरस व्यक्ति उसे पाकर सरस और कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी उसे खाकर बलवान बन जाता है। नाराज व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है। पहलवान और बलवान व्यक्तियों को यह बहुत पसंद है। इसीलिये जब वे क्रोध में होते हैं तो एकदम से कह उठते हैं कि- ठहर, मैं अभी तेरा ‘हलुवा’ बनाता हूँ । यहाँ हलुवा बनाने का अर्थ है कि तुम्हारी मरम्मत यानी पिटाई करता हूँ । अब इस हलुवा बनाने की तुलना कड़ाही में शुद्ध घी डालकर बनाये जाने वाले हलुवे से कतई नहीं की जा सकती। खाना दोनों में है- एक में माल खाना है और दूसरे में मार खाना है। इसी का दूसरा भाई ‘चटई बनाना’ भी है। जिस प्रकार मीठे के साथ नमकीन या चटपटा अच्छा लगता है, उसी प्रकार हलुवा बनाने के साथ ही चटनी बनाने का भी प्रयोग होता है। अर्थ भी बहुत कुछ मिलते से हैं। यों चटनी में क्रोध का चटपटापन अधिक है। पुलिस वालों की मार के एक विशेष आसन को लोग ‘मुरगा बनाना’ भी कहते हैं। यह उनके दंड की एक प्रक्रिया है भले ही भारतीय दंड प्रक्रिया में इसका कहीं कोई उल्लेख न हो। कभी-कभी लोग ताव में कह देते हैं कि ऐसा न हो तो मैं अपनी मूँछं बनवा लूँगा। मूछें मान की प्रतीक हैं। जब बात ही चली गई तो फिर मूछों का क्या मूल्य?यहाँ मूँछ बनवाने का आशय साफ कराने से है।
‘स्थान बनाना’ भी एक महत्वपूर्ण प्रयोग है क्योंकि समाज में या जीवन में सभी साधारण लोग अपना स्थान नहीं बना पाते । आत्मीय जनों के हृदय में भी स्थान बानाया जाता है पर वह हमारी सज्जनता और सदाशयता पर निर्भर है। इसी से मिलता-जुलता प्रयोग ‘घर बनाना’ सभी के बूते की बात नहीं है, चाहे वह रहने के लिये हो या जीने के लिये । ‘तमाशा बनाने’ का लक्ष्य प्रदर्शन से भी है। ‘पहाड़ बनाना’, ‘हउवा बनाना’ जहाँ कठिनाई का बोध कराते हैं वहीं तिल को ताड़ बनाकर कहे जाने पर प्रयुक्त होता है। बिना भय के मनमानी किये जाने पर लोग ‘बनिये की दुकान बनाना’ भी कहते हैं। इसी प्रकार ‘बात का बतंगड़ बनाना’, ‘पागल बनाना’, ‘लतियल बनाना’, ‘मछली बाजार बनाना’, ‘कचरा घर बनाना’, ‘बेशर्म बनाना’ आदि तमाम शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जो संदर्भ के साथ अपने रंग बदलते हुए नया अर्थ देते चलते हैं। इस प्रकार एक बात से अनेक बातें बन जाती हैं।
एम.आई.जी-12, चौबे कॉलोनी, छतरपुर, मध्यप्रदेश
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