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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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ललित निबंध

 

     

पंक ज


रंजना अरगड़े

म प्रसाद से बच सकते हैं, कर्मण्यता से बच सकते हैं, अकर्मण्यता से भी, प्रभावों से-अच्छे-बुरे चाहे जैसे हों - पर ऋतुओं से नहीं बच सकते हैं। कैसे बच सकेंगे भला ? और ऋतुओं की चपेट में आना, यानी उनका अच्छा-बुरा, सभी झेलना ! यानी.....यानी......,जनाब !!

 

अब जैसे अभी बारिश के दिन हैं। फुहार अच्छी लगती है तो कीचड़ भी भुगतना ठहरा ! आप इतना ही कर सकते हैं कि कमलवत् बनें या पंक बनें।

 

कमल बनना तो लगभग असंभव है, क्योंकि वह तो जन्म से होना होता है। आप कमल हैं, तो हैं, वरना नहीं। आप कुछ और हैं मसलन लिलि, गुलाब या गुले-अब्बास-तो आप कमल नहीं बन सकते । कमलवत् बनने की अपनी कोशिश जारी रख सकते हैं। कमल बनने की पहली शर्त है - कीचड़ से पैदा होना।(यह बात नहीं कि कीचड़ से पैदा होने वाली हर चीज़ कमल हो) पर कमल बनने के लिए तो कीचड़ अनिवार्य है। हाँ, दुर्गंध न बनें - कमल बनें। यहाँ तक आते-आते सारी बारें प्रतीकात्मक होने लगीं। मैं ऐसा क़तई नहीं चाहती थी। पर कहना मैं इतना ही चाहती हूँ कि ऋतुओं में जीकर उनके प्रभावों से बचने की बात करना यानी कमल बनना चाहकर कीचड़ से बचना। मेरा यह तर्क ऋतुओं को कीचड़ और हमें कमल बना रहा है और यह तो ऋतुओं के साथ अन्याय है।

 

लेकिन उनकी पड़ी किसे है ? जब तक कि कोहराम न मचा दें, या त्राहि-त्राहि न कर दें, ऋतुओं की तरफ़ ध्यान देता है ? उनका आना पता किसे चलता है। इतने संवेदनहीनता आ गई है कि पूरी-की-पूरी ऋतु गुज़र जाती है हम पर से और हम हैं कि किस क़दर बेख़बर रहते हैं ? चिकने, औँधे घड़े की तरह हम....कि कितनी भी आर्द्रता, भीगापन चारों तरफ़ हो ....पर कुछ बूँदें ही टिकती हैं हम पर...वह भी कुछ ही देर के लिए। मैं तो कहती हूँ कि इन्हीं कुछ बूँदों को समो लें हम अपने भीतर...उन्हीं की बात कर सकें....यह भी कम नहीं है !

 

मैं बहुत निराश इसलिए नहीं हूँ कि यह दौर अब बदलेगा। अब इन बूँदों की फ़िक़्र करने वाले-गीली मिट्टी से सिर उठाने लगे हैं। अब हर छोटी बात के लिए अपने आपको गलियाकर वक़्त बरबाद करने के दिन नहीं रहे हैं। अब अपने ज़मीर को जगाने का दौर शुरू हुआ है। (अगर यह भी राजनीतिक छल-छंद से तब्दील न हुआ तो कह सकते हैं कि) जो बीज कभी पड़े थे, अब अंकुरित होने की सतह पर आ गए हैं। परिवर्तन का दौर कितने ही दलदलों से अँटा पड़ा है। यहाँ औरतें अगर जलाई जा रही हैं या नंगी की जा रही हैं, तो कहीं बहुत चमत्कारिक रूप से ईमानदारी की क़ीमत पर नौकरी व परिवार को गौण समझने वाले भी दिखाई दे रहे हैं। आप देखिए, बहुत आश्चर्यजनक रूप से परगेशन की क़िया हो रही है। सभी अपनी वास्तविकता दिखाने को मजबूर हो रहे हैं। चाहे साधु हों, या नेता, । अब अपना काम न करने वालों के दिन लद जाएंगे। ये बातें अभी मामूली लगेंगी, अपवाद जैसी-पर अलग-थलग बिखरी इन घटनाओं को मिलाकर अगर देखें, तो लगता है उम्मीदों का दौर शुरू होगा। बल्कि शुरू होने...होने .....को है। वरना तमाम पैसा और ट्यूशन वालों, ट्यूशन क्लासों को जोरदार तमाचा मारते हुए शमशेर बानो बोर्ड में अव्वल न आती। कितनी तसल्ली की बात है अध्यापकों के लिए - ये जाकर पूछिए उनसे जो अभी पेशेवर अध्यापक नहीं हुए हैं। स्थिति ऐसी है कि यह ख़याल आम है कि अध्यापकों के न पढ़ाने के कारण ट्यूशन क्लासें भेजनी पड़ती है, वहाँ शमशेर बानों यह कहती हैं कि अध्यापकों के कारण वह सफलता हासिल कर सकी। कितना गौरवान्वित होता है अध्यापक । यह समय जिस तरह का है - यह अतिरिक्त गौरव बहुत सहज है। पर अब समय अच्छा आएगा।... कल फ़तहयाब निश्चित....

 

आज जो अपना परचम गाड़े हुए है, वह कल कहाँ डोलता नज़र आएगा नहीं जानते ....!..... इतिहास गवाह है, ऐसा ही होता आया है। आज दुनिया, एक दूसरे अर्थ में ग्लोबल विलेज है। बहुत सँकरी मानसिकता हो गई है। रंग, जाति, देश सभी के दायरे कसते जा रहे हैं। हम दास-बीस साल पहले जितनी खुली सोच रखते थे, आज नहीं रखते। जो असल में हैं हम, वो बजकहिन नहीं हैं हम..जिस पर राजनीति ने ऐसी गड़-मड़-गुड़गोबर.....कर दी है चीज़ें कि वह सब irrepairable हो गई हैं। अब व्यक्तियों की नीतियाँ काम आएँगी, सामूहिक सोच नहीं। सामूहिक सोच - यह खुद कैसा अजीब फ़िक़रा है....! समूह भला कहीं सोचता है ? वह तो करता है, उससे जो करवा ले !!

 

यह तय है कि ये दौर अपना रंग लाएगा, पर ख़तरे कम नहीं । ऐसा न हो कि देशभक्ति की दौड़ में देश ही पीछे छूट जाए !! धावक के गणवेश में इस क़दर दूर निकल आएँ कि पता ही न चले, कब दौड़ समाप्त हुई और कहाँ ?

 

अब तो अपने देश की मुट्ठी-भर मिट्टी उठाकर सूँघ लेनी पड़ेगी..कि कहीं खुशबू न भूल जाएँ । कहीं स्पर्श अजनबी न लगने लगे।

 

हम कीचड़ की जगह पंक बन सकते हैं। हमारे मित्र पंडितजी बता रहे थे कि उनके यहाँ गाँवों में खेतों की मिट्टी को पंक कहते हैं, कीचड़ अलग है। यानी वह, जो धान को धारण करें !! बाबा  की  कविता में है- पंक बना हरिचंदन...

 

कमल न सही, पंक ही सही। और  पंक बनेंगे तो कौन जाने पंकज बन ही जाएँ !! 

रंजना अरगड़े

एच-72, सचिन टॉवर्स, सैटेलाइट

अहमदाबाद, गुजरात-380015

 

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