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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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रम्य रचना

 

  अशोक वाजपेयी की दो रम्य रचनाएं   

प्रार्थना में ख़ाली


ल हम रज़ा के साथ उनके घर से थोड़ी दूर पर गिरजाघर गए। इतवार था और मुझे याद था कि वे हर इतवार को वहाँ जाते रहे हैं :  कुल दस मिनटों के लिए ही । जानीन का बपतिस्मा इसी गिरजाघर में हुआ था।

 

गिरजाघर में कोई सीट ख़ाली नहीं थी । रज़ा आँखें बंद किए हुए थोड़ा-सा झुके से एक खम्भे के सहारे खड़े रहे। धर्मोपदेशक फ्रेंच में कुछ लगातार बोलता रहा फिर लगभग आधा मिनट की शांति हुई।  रज़ा ने बाद में कहा कि यही ज़रा-सी शांति अर्थ रखती है। लौटते हुए वे बोले कि प्रार्थना में भी बिल्कुल ख़ाली होना बहुत कठिन है हालाँकि बिना ख़ाली हुए प्रार्थना करना व्यर्थ है।

 

प्रार्थना में अकसर कुछ न कुछ कामना लिए ही जाते हैं। कई बार तो प्रार्थना कामना का ही एक रूप होती है : उल्कट, पवित्र, दुर्निवार । उसमें शुभाशंसा या अनुग्रह पाने का भाव भी सन्निहित होता है। वह दूसरे से तदाकार होने की एक शुभाकांक्षी चेष्टा है। पर अगर ख़ाली होना है तो इस दूसरे से भी ख़ाली होना चाहिए, फिर वह दूसरा ईश्वर ही क्यों न हो । ईश्वर अंततः परम दूसरा है।

 

कविता प्रार्थना नहीं हो सकती क्योंकि वह दूसरे से ख़ाली नहीं हो सकती। वह कामना को तजकर किसी तदाकारिता की इच्छा ही नहीं कर सकती। शायद वह अकसर बिलकुल ख़ाली हो जाने का आसक्ति-भरा प्रतिरोध है। उसे भरे-पूरेपन की तलाश होती है। उसी में रिक्ति की भी, स्थगन और निश्चलता की भी। उससे अलग या उसे भूल-तजकर नहीं।

 

कविता को संसार चाहिए : वह संसार को उचित और आवश्यक मानती है। स्वर्ग-नरक से भी वह जूझती है। पर मोक्ष उसकी आकांक्षा नहीं। शून्य उसका घर नहीं। उसका अध्यात्म अपरिग्रह से नहीं उपजता। कविता मनुष्य की बहुतायत का पक्ष है। वह कुछ भी छोड़ना नहीं चाहती : उसे सबकुछ चाहिए। अपनि लिप्सा को लेकर उसे कोई संकोच या लज्जा भी नहीं। संसार का, उसकी नश्वरता और निरंतरता का, उसकी बहुलता का वह सहज स्वीकार है। कविता संसार के साथ ग़ैर-वफ़ादारी नहीं कर सकती। संसार कविता का ईश्वर है : वह उसी का अनुष्ठान है, सैलीब्रेशन है।

 

लोग चले गए हैं, सिर्फ शब्द बचे हैं


लोग चले जाते हैं। जगहें छोड़कर, और कहीं। कई बार खँडहर रह जाते हैं। कई बार जगहें ख़ाली नहीं रहतीं, बस्ती बनी रहती है। कोई और आ जाते हैं जो पहलेवालों की जगह ले लेते हैं। पर जगह लोगों की गंध को, स्मृति को बहुत दिनों तर सम्हाले रखती है। वह भले नयी गंधों और घटनाओं से घिरती, भरी जाती रहती है पर यह गंध मिटती नहीं जैसे जगह वहीं बनी रहती है और उन लोगों के साथ भी जाती है जो उसे छोड़कर चले गए या कि उसे छोड़ने पर विवश हुए।

 

हम लोग बचपन में बल्कि मेरे ब्याह और काका-दिदिया की मृत्यु तक किराए के एक मकान में रहते थे।  अब तो उस सड़क से निकलने का मन नहीं होता क्योंकि हमें एक मुक़दमें में हार जाने के कारण वह मकान छोड़ना पड गया था।  वह मकान अब काफ़ी बदल गया है पर उसे हम सब, हमारा बचपन, हमारे झगड़े और प्रेम, हमारे भोजन की सुगंध, हमारे अवसाद और अँधेरे, हमारी उम्मीद और अपमान सब याद होंगे। पता नहीं वहाँ अब कौन रहता है और उसे हमारे इतने बरस के जीवन का ज़रा भी पता है या नहीं। पर कुएँ को, आँगने को, पिछवाड़े को, उस सामने की जाफरी को, दिदिया के भंडार और पूजाघर को हम याद होंगे हालाँकि हम वहाँ बीत चुके हैं। हम वहाँ से बहुत दूर चले आए हैं और अब उस जगह पर जाना असम्भव है पर उसे शब्दित करना सम्भव है।

 

कविता सिर्फ़ लोगों के ही नहीं जगहों के बारे में भी होती है। बिना भूगोल के कविता अपनी जीवित सत्ता नहीं पा सकती । ज़रूरी नहीं कि कविता किसी जाने-पहचाने भूगोल को ही चुने। बल्कि अकसर वह उसे नहीं चुनती । वह अपना भूगोल, अपना देश गढ़ती-रचती है। कविता में कल्पना सिर्फ़ अपना इतिहास ही नहीं खोजती : कल्पना अपना भूगोल भी पाती है।('कविता का गल्प' से चयन) 

अशोक वाजपेयी

नई दिल्ली

 

 

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