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अमेरिका से अभिनव शुक्ल
की कविताएं
हिन्दी भाषा
रग
रग में जो है बसी हुई,
इस जीवन की अभिलाषा है,
वह स्वप्न सुंदरी नहीं
कोई,
मेरी माँ सी हिन्दी भाषा
है,
जबसे
नयनों को खोला है,
इसकी गोदी में खेला हूँ,
इसके भावों पर बड़ा हुआ,
इसकी नज़रों का मेला हूँ,
यह
संस्कृत की है पुत्री,
उर्दू की सखी सुनयना है,
यह तमिल तेलगू बांगला
की,
सबसे प्यारी बहना है,
यह
बड़ी व्यवस्थित भाषा है,
विज्ञान भी अद्भुत अनुपम
है,
कविता के गहनों से
शोभित,
नव गद्य समय का परचम है,
कितनों नें इस पर वार किए,
कितनों नें चोटें मारी हैं,
यह अडिग शिला सी
खड़ी रही,
यह देवलोक अधिकारी है,
यह
आँखें हैं,
यह आँसू हैं,
यह पूजा है,
यह भक्ति है,
यह गौरव है,
यह शक्ति
है,
यह राष्ट्र की अभिव्यक्ति
है,
  
दाँव
सिखा देती है
वक्त
की झील में तस्वीर बना देती है,
दर्द दे दे के उम्मीदों की
दुआ देती
है,
कभी
आंखों में सजाती है सुनहरे सपने,
कभी ख्वाबों के चिरागों को
बुझा देती
है,
दिन
उगेगा तो ये सूरज की बाँह थामेगी,
अंधेरी रात में दीपक को
जला देती
है,
हर
सबक कैद नहीं होता है किताबों में,
ज़िन्दगी भी बहुत से दाँव
सिखा देती
है।
  
खून बहाया
मासूमों का
खून
बहाया मासूमों का फूलों और बहारों का,
देखा नहीं गया क्या तुमसे
खुश
रहना बेचारों का,
बात
खु़दा तक पहुँच गई है जलने वाली बस्ती की,
आज इबादतगाहों में भी
चर्चा
है हथियारों का,
छोटे
बच्चों को भी राम कहानी का अंदाज़ा है,
ताजपोशियाँ खेल सियासत
धंधा है
मक्कारों का,
इन
खबरों की सच्चाई पर ऐतबार कैसे कर लें,
रोम रोम तो बिका हुआ है अब
सारे
अखबारों का,
एक
कयामत नाज़िल होने वाली है जाने क्यूँ लगता है,
आज समन्दर तोड़ रहा दिल
साहिल की दीवारों
का,
ये मत
सोचो उम्र बिताएगा कोई इस डेरे में,
आते जाना जाते जाना मज़हब
है
बंजारों का,
बालों
की चांदी भी कैसे कैसे खेल दिखाती है,
हाल नहीं अब कोई पूछता
हमसे
इश्क के मारों का,
मेरे
पीछे हंसने वाला मुझसे आकर कहता है,
कमज़ोरों की हंसी उड़ाना
शौक है
इज्जतदारों का,
तलवे
चाट रहे थे अब तक जो बदनाम हुकूमत के,
वो फरमान सुनाएँगे अब लुटे
हुए
दरबारों का,
दफ्तर,
बिजली,
सड़कें,
टीवी, चाय,
फोन,
चप्पल, जूता,
बच्चे,
रोटी,
पानी,
कपड़ा किस्सा है घर बारों
का,
आग
मुहब्बत की जिसकी हर गाम हिफाज़त करती हो,
डर दिखलाता है उस 'अभिनव'
को
कैसे अंगारों
का।
  
ख़बर ढूँढता
हूँ
सुबह
की ख़बर में ख़बर ढूँढता हूँ,
कभी दोपहर में ख़बर ढूँढता
हूँ,
पचासों हैं चैनल हज़ारों रिसाले,
मगर मैं शहर में ख़बर
ढूँढता हूँ,
नदी
का तो चर्चा सभी कर रहे हैं,
मैं सूखी नहर में ख़बर
ढूँढता हूँ,
कई
साल पहले तबाही मची थी,
अभी तक लहर में ख़बर
ढूँढता हूँ,
मेरे
साथ आए भला कोई कैसे,
मैं जूठे ज़हर में ख़बर
ढूँढता हूँ।
  
इलेक्शन आ रहे
हैं दोस्तों
करो
मत व्यर्थ जीवन का प्रबल आधार हो जाओ,
ना बन पाओ यदि तुम गुल,
नुकीले
ख़ार हो जाओ,
सुबह
उठ कर नहाते हो औ पूजा पाठ करते हो,
अमाँ तुम आदमी अब हो गए
बेकार हो
जाओ,
चिलम
को हाथ में लेकर लगाओ कश पे कश प्यारे,
चलो मूँदो ये आँखें डूब
जाओ
पार हो जाओ,
ज़रा
पेटी कसो बंदूक की गोली भी चेक कर लो,
इलेक्शन आ रहे हैं दोस्तों,
तैयार हो
जाओ,
  
कविता और
पब्लिक ओपिनियन
एक
लम्बे समय तक चले,
घनघोर
शीतयुद्ध के बाद,
जब घर
पर पिताजी नें
हमें,
नालायक शिरोमणी की उपाधि करते हुए,
हमारे
कवि हो जाने का ऐलान किया,
तब
हमें अपना भविष्य बिल्कुल क्लियर दिखाई दिया,
दूर
दूर तक कुछ भी नहीं
था,
और जो
दिख रहा था वह बिल्कुल सही था,
खैर,
युद्ध
विराम कि स्तिथि के
कारण,
एल ओ
सी पर शांति व्यवस्था बहाल हो गई थी,
हम और
पिताजी आपस के बैर
भुला
कर,
कभी
कभार,
एक
दूसरे को देख कर मुस्कुरा लेते थे,
पिताजी
मुस्कुराते हुए सोचते होंगे कि,
'बच्चू,
अभी
दो ही दिन में आटे दाल का भाव
मालूम
पड़ जाएगा,'
हम ये
सोचते थे कि,
जब
कविता करके आदमी प्रधानमंत्री बन
सकता
है,
नोबल
पुरुस्कार की दौड़ में शामिल हो सकता है,
मंच
पर बातें बना
कर
अच्छे अच्छों को धो सकता है,
तो
अपना भी झंडा किसी ऊँची चोटी पर जाकर गड़
जाएगा,
लेकिन
अपना भविष्य ऐसे कैसे दांव पर लगा दिया जाए,
कविता
के बारे
में
पब्लिक ओपिनियन क्या है पता किया जाए,
पिताजी तो अपनी राय पहले ही दे चुके
थे,
कविता
मात्र अमीरों का सौंदर्य प्रसाधन है,
समय
नष्ट करने का एक निकृष्ट
साधन
है,
तुम्हे आई आई टी में सेलेक्ट हुए अपने मामा से कुछ ज्ञान लेना चाहिए,
केवल
पढ़ाई की ओर ध्यान देना चाहिए।
मां
नें कहा,
बेटा,
बचपन
में हम
लोग
कवि सम्मेलन सुनने जाते थे,
अपनी
डायरियों में भी कविताएँ नोट करके लाते
थे,
कवि
वही है जो ह्रदय से सच्चा हो,
वैसे
तुम भी लिखते अच्छा हो,
पर
अब
कविता में कुछ बचा नहीं है,
नए
लोगों को ये सब जंचा नहीं है,
छोटे
भाई
नें
कहा,
अबे,
मेरे
आयल फ्री पापड़ पर चुपड़े हुए मक्खन,
मिट्टी के तेल के पीपे के
अन्दर
वाले ढक्कन,
तू
बड़ा महान है,
वीर
हनुमान है,
हम
जैसे लोगों का
राबिनहुड है,
याद
रख तेरा लक्ष्य बालीवुड है,
तू
वहां पहुँच कर गीतकार बन
जा,
फिर
मेरे वहां पहुँचने की बात चला,
वैसे
कविता में लेना चाहिए नए
शब्दों का सहारा,
जैसे
कठफोड़वा,
फड़फड़ाहट,
लक्कड़हारा,
इस
मामले में
पत्नी
से हमारी अच्छी निभ जाती है,
उसे
हमारी भाषा समझ ही नहीं आती है,
वो
कुछ
भी कहती है तो हम हाँ में सिर हिलाते हैं,
हम
कुछ भी कहते हैं तो वो ना में
सिर
हिलाती है।
हम
फिर घर के बाहर आए,
अन्य
लोगों नें भी अपने विचार
बताए,
एक
नें कहा,
कविता
का अर्थ,
भूख,
गरीबी,
कमज़ोरी,
कड़की
है,
दूसरा
नें
कहा
कि,
मेरे
पड़ोस में रहने वाले डाक्टर साहब की लड़की है,
तीसरे
नें कहा
खूबसूरत नायिका है,
चौथा
बोला,
फिल्मों में गायिका है,
पाँचवा बोला,
रिसर्च
आब्जेक्ट है,
छठा
बोला,
एम ए
का एक सब्जेक्ट है,
सातवां बोला,
प्रश्न गहरा
है,
आठवां
बोला,
हमसे
मत पूछो,
अपन
तो जन्मजात बहरा है,
नवाँ
बोला,
कविता
नदी
पर बने सुंदर पुल सी है,
दसवाँ
बोला,
सूर,
कबीर,
मीरा,
तुलसी
है,
कोई
बोला,
कविता
देवी माता के आगे जलती ज्योत है,
कोई
बोला,
हम
क्या जानी क्या होत
है,
कोई
बोला,
कविता
चार लाईना सुना रिया हूँ है,
कोई
बोला,
पुराने ज़माने
में
ही हुआ करती थी रै,
जब यह
सवाल हमनें किया मंचों पर धूम धड़ाके से चलने
वाले
एक कवि से,
जिसकी
प्रसिद्धि की तुलना की जा सकती थी रवि से,
तो वह
ज़रा
देर तक तो रहा विचारों में खोया,
फिर
उसने अपनी भावनाओं को ईमानदारी के
शब्दों में पिरोया,
फिर
बोला,
जब
मैंने लिखना शुरू किया था,
तब
कविता
मानव
मन का सम्मान थी,
सरस्वती माता का अनमोल वरदान थी,
पर जब
से मंचों के
बाज़ार में आया हूँ,
मेरी
आत्मा में एक मलाल बो गई है,
कविता,
दुकान
पर
बिकने
वाला माल हो गई है,
इन सब
महानुभावों की राय के बाद,
जब
हमने अपने
हृदय
से पूछा,
कि
कविता क्या होती है उस्ताद,
तो
उसने उत्तर दिया कि,
कविता
है बच्चे की किलकारी,
महके
हुए फूलों की क्यारी,
चिड़ियों की
चहचहाट,
शब्दों की तुतलाहट,
जहाँ
कहीं भी भावना है,
संवेदना है,
पीड़ा
है,
वेदना
है, |