यह कुछ ऐसे नाम हैं,
कुछ ऐसे महत्वपूर्ण
समन्वयकारी हिन्दी प्रेमियों के जिनके प्रयास से उतर
दक्षिण के बीच समापता आयी
है जिन्होने
न सिर्फ अपने
सर्जनात्मक
जीवन से भारतीय अस्मिता और सँस्कृति को
निखारा है और इतना ही नहीं बल्कि हिन्दी के प्रति वे
सजग व समर्पित
रहे।
उनके
प्रयास इस बात से और भी सराहनीय हो
जाते हैं कि हिन्दी के प्रचलन के खिलाफ़ कभी-कभार
दक्षिण भारत से विरोध के स्वर भी
सुनाई दिये हैं ।
भारत की भाषा भारती "हिन्दी" जनवाणी है !
इस
में दो मत नहीं !
परंतु
दक्षिण का अपना साहित्य है और
अति समृध्ध
भाषाएँ भी हैं ...जैसे,
तमिळ,
कन्नड,
मलयालम और
तेलेगु,
जिन्हें हम कभी अनदेखा न करें तो ही अच्छा है ।
आलव्वार साहित्य की
कृति " शिलपाधीकारम्`"
जग
प्रसिद्ध है
।
आलवार
साहित्य की मूल चेतना के आधारभूत साहित्य,
वेद,
उपनिषद,
गीता,
महाभारत, विष्णुपुराण रहे हैं । ये उक्ति सुनिये,
"भक्ति
द्रविड उपजी,
लाये रामानन्द"
आण्डाल्`
रचित कृष्ण भक्ति की वैतरणी
है - "तिरुपावै "
, तिरिकुल्लर`,
मणिमेखले,पुरुनानुर,अहनानुर्`,परिपाडल,
पुरुप्पोरुल्`,
वेणवा
मालै ( जो आठवीँ शती मे रचित तमिळ
काव्यशास्त्र है )
संगम
साहित्य महाकवि सुब्रह्मण्यम् भारती का
दीर्घ व यशस्वी साहित्य
पुरुनानूर
,..महर्षि
अगत्स्य के शिष्य तोल्`
कप्पियार जो तमिळ व्याकरण :
" तोल्`
कप्पियाम" के सर्जक हैं ।
ये
सभी,
भारतीय संस्कृति के स्तम्भ हैं
।
द्रविड
संस्कृति और आर्य संस्कृति के खेमों में इन्हें
विभाजित करना इन विद्वानों ने नहीं अपनाया बल्कि अपने
साहित्य सृजन व साहित्य
सेवा से भारत की दक्षिण व उतर के जनपदों की भाषा के
बीच सांस्कृतिक एकता का
सूत्रपात किया गया जो आज,
२१ वीं शताब्दी
के आरंभ में,
भारतीय अस्मिता की रक्षा व
संबल में,
नितांत महत्वपूर्ण भूमिका बनकर नवीन संरचना में अपना
अपना योगदान दे रहा
है । तमिल भाषा अति प्राचीन है और संस्कृत के शब्दों
को ध्वनि रुप में ग्रहण
कर आत्मसात किये हुए हैं । उदाहरण हैं ये शब्द- भोगम्`,
निधि,
नगर,
मँगल,
नील वितान इत्यादि।
"उदारचरितानां
तु वसुधैव कुटुबकम्`"
के
सार्वभौम तत्व की गंभीरता को तमिळ कवि की निम्न पंक्ति
में पाकर भारतीय मनीषा की
एकात्म चेतना को ह्रदयँगम किया जा सकता है
-
"
यादुम्`
उउरे वावरुम्`
केलिर्`
"
अर्थात्`
"सारा
विश्व मेरा आवास है और जड चेतन,
सभी मेरे
बँधु बाँधव हैं "
।
ये सारी माहिती आप को बतला दूँ मैंने
.."भक्ति
के आयाम "
शोध -ग्रंथ "में पढीं
। जिसे
डा. जयरामन जी ने मुझे उपहार स्वरुप भेजी है
। यह उनका शोध ग्रँथ है -
एक
अमूल्य बृहत्`
पुस्तिका है । प्राचीन तमिळ समाज की एक देवी का नाम
"
कोट्रवै"
है जो अम्बिका
भवानी के साद्रश्य हैं -- ये
भी उल्लेख किया गया
है ।
तो आइये,
डा.
जयरामन जी
से परिचित हों लें :
-
संस्कृत,
हिन्दी,
एवँ तमिल साहित्य के
विद्वान,
भारतीय संस्कृति तथा साहित्य की एकात्मता के प्रति
समर्पित,
१८ वर्ष तक
अध्ययन कार्य मे रत जन सामान्य के हित के लिये,
भारतीय रीज़र्व बेन्क के प्रबंध
तंत्र में १६ वर्ष तक कार्यरत
,
१९८० में न्यूयोर्क में भारतीय भवन की स्थापना कर,
विगत २२ वर्षों से अमेरिका में भारतीय संस्कृति,
परम्परा,
दर्शन,
भाषा,
साहित्य व
कलाओं के प्रचार-प्रसार में वे संलग्न रहे हैं ।
शैक्षणिक
योग्यता-
एम्.ए.
(
संस्कृत तथा हिन्दी), पीएचडी.डी.लिट्
प्रमुख प्रकाशन-
१) कवि
सुब्रह्मण्यम्`
भारती तथा सूर्यकाँत त्रिपाठी निराला के काव्य का
तुल्नात्मक अध्ययन
(
पीएचडी.का शोध प्रबंध )
२) कवि श्री भारती -- कवि सुब्रह्मण्यम्`
भारती की
चुनी हुई
कविताओं का हिन्दी रुपान्तर
३) पुरुनानूरु ( प्राचीन तमिल काव्य ) की
कथायें
४) स्वर्गीय अखिलन के तमिल उपन्यास " चित्त्रुप्पावै"
का हिन्दी
रुपान्तर
'
चित्रित प्रतिमा " के नाम से
५) तमिल - हिन्दी सवयम्`
शिक्षक (
के. हि. निदेशालय का प्रकाशन)
६)चिन्मय - काव्य ( योगी श्री चिन्मय की चुनी
हुई अंग्रेज़ी कविताओं का हिन्दी पध्य रुपान्तर )
७) जैन धर्म स्वामी विवेकानन्द
तथा आधुनिक भारत के निर्माताओ पर अँग्रेज़ी में
संपादित ग्रंथ
८) शिलम्बु ( तमिळ
नाटक - प्राचीन तमिल काव्य "शिल्पाधीकारम्`'पर
आधारित)
सम्मान-
-साहित्य
वाचस्पति ( हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग )
-साहित्य भूषण ( उत्तर
प्रदेश हिन्दी संस्थान)
अन्य सेवायें-
आकाशवाणी मद्रास व बंबई से वार्ताकार तथा
दूरदर्शन बंबई में " संचयिता " के नामक
पाक्षिक कार्यक्रमों के
प्रस्तोता
बंबई में डा. जयरमन जी व उनकी धर्मपत्नी श्रीमती तुलसी
जी मेरे पापा
स्वर्गीय पंडित नरेन्द्र शर्मा व मेरी अम्मा श्रीमती
सुशीला नरेन्द्र शर्मा मे घर
पर अतिथि बनकर पधारे थे और वहीं मैं
उन
दोनों से, कन्या-अवस्था में मिली थी
।
श्रीमती तुलसी जयरमन जी :
(
जन्म: २१ जनवरी १९३४,
मद्रास,
भारत)
सन`
१९८० में अमेरीका आगमन । न्यूयोर्क में रहीं
जहाँ
१८ अगस्त १९८९ को उनका देहांत हो गया
।
लेखन व प्रकाशन-
संस्कृत,
हिन्दी,
तमिल एवं
अंग्रेजी भाषा व साहित्य की श्रेष्ठ विदुषी थीं । २२
वर्ष तक आकाशवाणी मद्रास तथा
बम्बई स्टेशनों ने कार्यक्रम अधिकारी के रुप में
कार्यरत रहीं।
"गाँधी
अंजलि"
और " अपना देश अपना संगीत " उनकी लोक संगीत के क्षेत्र
की सांस्कृतिक व कलात्मक
प्रस्तुति,
अत्यंत सराही गई -- संगीत से सभर उनकी गीत रचना व गायन
श्रोता समुदाय
को भाव विभोर कर देने में सक्षम रहे।
'प्रेयर्स
अण्टु किम्`
"
भक्तिपरक
श्लोकों की पाली कृति थी जिसे स्वामी श्री चिन्मयानन्द
जी के साथ मिलकर तैयार किया
था तुलसी जी ने
नेशनल बुक ट्रस्ट के लिये ८ सर्वोत्तम उपन्यासों का
हिन्दी
से तमिल में अनुवाद किया।
तमिल के संत अरुणगिरिनाथर के तमिल काव्य "
कन्दरनुभूति" को उन्होंने हिन्दी
काव्य रुप में " स्कन्दानुभूति " के नाम से प्रस्तुत
किया । अँग्रेज़ी साहित्य :
रामायण और नो गाँधी इन वन हंड्रेड वेज़ - बहुत लोकप्रिय
रहीं है ।
"मेरी
चिंतन की
धारा " उनके लेखों का संग्रह है । स्व. श्रीमती तुलसी
जयरमन जी तमिल और हिन्दी
के बीच एक मजबूत सेतु रुप थीं - अनेक विश्व हिन्दी
सम्मेलन व विश्व रामायण सम्मेलन
जैसे अंतराष्ट्रीय अधिवेशनों में भाग लेतीं रहीं ।
हैदराबाद आकाशवाणी स्टेशन से
त्यागपत्र देकर अपने पति डा. जयरमन जी के साथ अमेरीका
आ गईं जहाँ डा. साहब ने
भारतीय विद्या भवन की शाखा को न्यूयोर्क में स्थापित
कर भारतीय साँस्कृतिक
गतिविधियों की नींव डाली जो अमेरीका के विभिन्न शहरों
में भारतीय संस्कृति,
दर्शन,
धर्म,
संगीत आदि का प्रचार व प्रसार करने में मुख्य भूमिका
अदा करने में रत है और
तुलसी जी का इन सारी गतिविधियों में अनन्य हिस्सा रहा
है.वे एक कुशल अध्यापिका
व
श्रेष्ठ वक्ता भी रहीं । सँगीत व कविता उनके दो सशक्त
पक्ष थे। कुँवर चंद्र
प्रकाश सिंह के शब्दों में " वे आलवारों और कम्बन के
तामिलनाडु की अंतरात्मा थीं और
दक्षिण भारत के हिन्दी काव्य की "कोकिला" थीं ।
मरणोपरांत "हिन्दी का चंदन "
कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है ।
प्रस्तुत
है इस
संग्रह की प्रथम कविता
: "हिन्दी
का चंदन
"
मैंने हिन्दी का चंदन धरा है भाल पर
दूर
से देखो मुझे
भाल पर दमकते इस तिलक में शोला भरा है !
साहस मत करो,
पास आने
का !
उसकी गरिमा को तोलने का-
हाँ,
यह चंदन नहीं है शीतल
प्रखर फासफरस-सा
है विस्फोटक
और अति उज्ज्वल
छूओगे,
तो जल जाओगे
इसे मिटाने का दंभ मत
करो
यह ऐसे भाल पर शोभित चन्दन है
जिसकी आभा में
कन्याकुमारी की कमनीयता
का,
यौवन है,
तप पावन है !
अटल दद्राविड की "भिन्नी" पर अंकित
बिन्दी है
यह
यह द्राविड का सुहाग अचल है
इसका मत उपहास करो
इसमेम सौरभ का
मार्दव नही है
हुंकार भरक दहाडता शार्दूल है ये
मैँने हिन्दी के मुक्तामल से,
निज उस
को सजाया है,
सँवरा है
पानी कितना है इसमें,
यह परखनेवाले,
तुम नहीं
हो
मोल मुक्ता का वह क्या जाने
जो गोताखोर नही है
?
ठहरो! सुनो,
मेरी बात
-
मैंने लिया है इस मुक्ता को,
उस आत्मा की धडकन के संग ही,
जहाँ मेरी
तमिळ जननी
अंत: सलिला है,
कलकण्ठी है !
इस मुक्ता को तोलने का मत करो
अभिमान
यह चठती नही तराजू पर
इसे उसी कण्ठ पर पाओगे
जिसमेँ भारत माँ की
विजय के गान को,
प्रतिपल मुखरित पाओगे -
वह मेरी तूलिका हिन्दी की है
जिसे चलाता तमिल का चेतन कर है !
इसे छीनने का मत करो अभियान
प्राणों की
शक्ति समग्र सहेज कर
मैंने इसे अपनाया है
इसमें घुल गया है,
मेरा आत्म
सम्मान !
यह तुम्हारी तलवार की वार से,
गिरेगी कहाँ
?
चढकर सूली के मंच
पर भी,
अरुणामय ह्रदय मेरा -
अँकित करेगा हिन्दी के अक्षर !
हाँ - अक्षर
हिन्दी के अक्षर !
हिन्दी को मैंने अपनी रग-रग में पाया है -
जरा रहो सावधान
!
हिन्दी के ही संग मेरे उदय -अस्त की,
तटिनी बहती है - अम्लान !
हिन्दी
मेरी जाह्नवी धारा है -
ऋतंभरा है !
(कविता संग्रह "प्रवासिनी के बोल"
अमेरीका की हिन्दी
कवियत्रियों की संचित कवितावली से
साभार)