संचार माध्यम और नैतिकता
अच्युतानंद मिश्र
भारतीय
तत्व चिन्तन के मनीषियों ने सम्प्रेषण को विराट पुरुष
की महाशक्ति के रूप में देखा और अनु
भव किया है। विखंडन
और पुनर्निर्माण जैसे ब्रम्हाण्ड की अनवरत प्रक्रिया
है उसी तरह सम्प्रेषण शब्दों,
संकेतों और दृश्यों के माधयम से ज्ञान
के रूपान्तरण की एक सनातन विधि है। इसकी अवधारणा में
सम्प्रेषक और ग्रहणकर्ता के मन और बुध्दि,
प्रेरणा और अनुभूति,
संवेदना और आक्रोश भी सृजित और
प्रवाहित होता है। भारतीय संदर्भ में सम्प्रेषण को
ज्ञान के वाहक, एक जीवन पध्दति
और सकारात्मक उत्प्रेरक के रूप में स्वीकार किया गया
है। सम्प्रेषण के जनसंचार में परिवर्तित होने की
यात्रा के पीछे विज्ञान और सूचना क्रांति की
अविस्मरणीय भूमिका है। दूसरे विश्वयुध्द के बाद
प्रौद्योगिकी के विकास ने एक वैश्विक परिवेश पैदा किया
था। इसी प्रौद्योगिकी की मदद से संचार माधयमों ने
भौगोलिक दूरियाँ मिटाई हैं,
साथ ही सूचना और ज्ञान के विस्तार के नए क्षितिज खोल
दिए हैं। आधाुनिक पीढ़ी के सामने स्वतंत्रता और
स्वावलम्बन के अनगिनत विकल्प प्रस्तुत किए हैं। रेमंड
विलियम्स ने लिखा है कि नई प्रौद्योगिकी ने नई भौतिक
संस्कृति को जन्म दिया है। सम्प्रेषण के संस्थानिक
स्वरूप- जनसंचार माधयमों के दायरे में देश-काल के
वैचारिक अर्न्तप्रवाह, सामाजिक
व्यवस्थाओं, सरोकारों,
मर्यादाओं के साथ सूचना,
लोक शिक्षण और मनोरंजन की भूमिकाओं का
अधययन भी शामिल है। मनुष्य की मनोवृत्तियों,
व्यवहारों और हमारे सामुदायिक जीवन की
अन्त:क्रियाओं, वैचारिक
अन्तर्यात्राओं को समझने और सिखाने के लिए दर्जनों
मॉडल गढ़े गए हैं। संचार की आधाुनिक तकनीक समझने के लिए
दुनिया भर में पढ़ाये जा रहे इन मॉडलों की कोडिंग और
'डिकोडिंग'
को जनसंचार के अध्ययन का एक प्रमुख
हिस्सा बना लिया गया है। संचार माध्यमों ने मनुष्य,
प्रौद्योगिकी और समाज के रिश्तों की
नई व्याख्या की है। भौतिक विकास के प्रयासों ने
औद्योगिक, आर्थिक,
यातायात जैसे अनेक क्षेत्रों में
स्पर्धा और समृध्दि के मार्ग खोल दिये हैं। जल और जमीन
के साथ समुद्रों, नदियों,
जंगलों,
पर्यावरण और स्वास्थ्य की चेतना जगाने में इन माध्यमों
ने भारी योगदान किया है।
सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की परम्परागत विधा को आधुनिक संचार तकनीक ने आमूल बदल दिया है। भौतिक समृध्दि प्राप्त करने की ललक ने राष्ट्रों की विशिष्टताओं, जैविक विविधाताओं और विशेषताओं को कितना बदल डाला है। संचार माधयमों पर यह गंभीर आरोप है कि उन्होंने मनुष्य को उपभोक्ता तथा यांत्रिक दास में परिवर्तित कर दिया है। उसकी मौलिकता, सामाजिक अस्मिता, संवेदना का स्पंदन, कला और संगीत की कोमल अनुभूतियों को भी संकुचित करने का काम किया है। उसकी राष्ट्रीयताओं, संस्कृतियों, भाषाओं के प्रति उपेक्षा, इतिहास, साहित्य, पारम्परिक मनोरंजन के प्रति हीनता तथा तिरस्कार का भाव जगाया जा रहा है। खेती और उद्योग, रोजगार और चिकित्सा की स्वदेशी तकनीक को शक्तिशाली बाजार की स्पर्धा में खड़ा करके नष्ट करने की कोशिश हो रही है। दावा तो परम्परा और आधुनिकता के सह विकास का है लेकिन प्रयत्न बाज़ार के एकाधिकार और प्राकृतिक संसाधानों की असीमित लूट स्थापित करने का है।
भारतीय संदर्भ में यह सत्य प्रमाणित है कि पिछले दो दशक में संचार माधयमों को बाजार की देशी-विदेशी ताकतों ने अपना निशाना बनाया है। विशाल बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से ही उन्हें शक्ति और संसाधान मिल रहे हैं। सम्पूर्ण प्रबंधन तंत्र पर उनका नियंत्रण लगातार बढ़ता जा रहा है। इसलिए आज के बड़े मीडिया संस्थानों का आराध्य अखबारों का पाठक या चैनलों का दर्शक नहीं है। उनका प्रेरणा स्रोत उपभोक्ता और बाजार है, सामाजिक सरोकार नहीं। शिक्षा, संस्कृति या मनोरंजन के नाम पर जो टुकड़े पाठकों और दर्शकों के सामने फेंके जाते हैं, उसके माधयम से अमेरिकी और यूरोपीय जीवन शैली की विकृतियाँ थोपने की कोशिश है। संचार माधयमों के पास इस आरोप का कोई ठोस उत्तार नहीं है कि पाठकों और दर्शकों के बीच अपनी विश्वसनीयता दांव पर लगाकर वे बाजार के पक्ष में क्यों खड़े हैं? भारतीय अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज जीवन पर भोगवादी उत्पादों और लुभावने वैश्विक नारों के सहारे नियंत्रण करने की कोशिश के एजेंट क्यों बन रहे हैं? सामाजिक सरोकारों तथा वंचितों के अधिाकारों के पक्षधार होने के बजाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ खड़े होने की क्या मजबूरी है? राष्ट्रीय एकीकरण, साम्प्रदायिकता एकता, मानव मूल्यों के लिए समर्पित होने का दावा करने वाले इन माधयमों की असलियत क्या है। अनियंत्रित अधिकारों और अकूत लाभ कमाने की हवस का भविष्य क्या है? 1980 में 'यूनेस्को' की एक रपट में कहा गया था कि माधयमों की विषयवस्तु राष्ट्र के विकास को ध्यान में रखते हुए देश और समाज की भाषा और संस्कृति के अनुरूप होनी चाहिए। संचालकों का हित उसका लक्ष्य नहीं होना चाहिए। क्या ऐसा हो रहा है? संचार माधयमों का यह आचरण समाज विरोधी और अनैतिक है।
ज़मीन, आसमान और पूरे वायुमण्डल पर संचार माधयमों की बढ़ती ताकत, शक्तिशाली संसाधनों और उनकी निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों के दायरे में यह भी पूछा जा रहा है कि क्या वे अपनी आलोचना के प्रति सहिष्णु हैं? क्या उन्हें अर्धसत्य या असत्य छापने और दिखाने का अनियंत्रित अधिकार प्राप्त है? क्या उनके आंतरिक विवेक और लोकहित की कथित प्रतिबद्धता पर भरोसा किया जा सकता है। क्या कोई समाज, सरकार या संस्था बिना किसी नैतिक आचार संहिता को स्वीकारे जीवित और विश्वस्त रह सकती है? क्या संचार माधयमों के लिए कोई कोड आफ कन्डक्ट जरूरी है? अगर यह जरूरी है तो इसके संचालन और नियंत्रण का अधिकार किसको है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और स्टिंग आपरेशन की छूट के बीच नागरिक हितों की रक्षा और उनकी निजता की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? स्वतंत्रता के बाद अब तक के इतिहास में प्रेस कौंसिल मीडिया से किसी आचार संहिता का पालन कराने में क्यों असफल साबित हुई है? संस्थाएं चाहे सम्पादकों की हों या श्रमजीवी पत्रकारों की, हर दौर में आचार संहिताओं को मीडिया संचालकों ने कूड़े की टोकरी में डाल दिया था जो आज भी वहीं पड़ी हैं। इमरज़ेंसी और प्रेस पर सेन्सर के दौरान सरकार की प्रेरणा से कुछ सम्पादकों ने जो आचार संहिता बनाई थी उसने आचार संहिता की नैतिकता को ही नष्ट कर दिया था। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या जनसंचार माधयमों की बढ़ती ताकत और प्रवृत्तियाँ नागरिक अधिकारों की स्वतंत्रता के विरुद्ध जा रही हैं? अगर हाँ तो इसे कैसे रोका जा सकता है? क्या आज देश में किसी ऐसी संस्था का अस्तित्व है जिसका हस्तक्षेप या नैतिक दबाव मीडिया को स्वेच्छा से स्वीकार्य हो सके।
