एक श्रृंखला - नर-नारी संबंधों की
प्रतिभा सक्सेना
भारतीय साहित्य में नारी -पुरुष संबंधों के दो चरम रूप सामने आते हैं -पार्वती और सीता। एक शक्ति है,प्रज्ञा है विलक्षण व्यक्तित्व सम्पन्ना, जो कुछ अनुचित लगता है सिर उठा कर विरोध करती है ।और दूसरी यद्यपि कृतित्व में वह भी पीछे नहीं तेजस्विता में कम नहीं पर उसे ऐसा निरूपित किया गया जिससे नारीत्व को बेबसी और दैन्य का पर्याय बन गया और नारी कृपा और करुणा की पात्र अति निरीह -व्यक्तित्व हीना,सब कुछ सहने और रोनेवाली । एक का चित्रण उसके प्रति करुणा जगानेवाला है और दूसरी स्वयं करुणामयी है दूसरों पर करुणा करनेवाली । कभी रोते नहीं पाया उसे, विषम परिस्थिति में भी नहीं । डट कर लोहा लेना जानती है -चाहे रक्तबीज या महिषासुर की सेना हो चाहे पिता की यज्ञ-भूमि । पति से कभी उसे तिरस्कार नहीं मिला, उसकी सलाह न मान कर अपने मन के अनुसार चलने पर भी । पर वह समझ जाती है, अपने हठ और पति की विवशता को । पछताती है और उस अवज्ञा का निराकरण करने को तत्पर होती है ।
स्त्री-पुरुष दाम्पत्य-संबंध के कुछ अन्य रूप है - राधा और कृष्ण का एक दूसरे के प्रति गहन अनुराग, द्रौपदी तथा कृष्ण की मैत्री और द्रौपदी और कर्ण का विलक्षण संबध। यद्यपि भारतीय समाज में यह सहज स्वीकृत नहीं। पारिवारिक संबंधों के अतिरक्त सामाजिक संबंधों की लंबी श्रृंखला रही है।
एक राधा और कृष्ण का जो इतना आकर्षक है कि अनेक रंगों और रूपों में चित्रित हुआ है और दूसरा मित्रता का। एक दूसरे को समझते हुए, मनोबल बढ़ाते हुए, ज़रूरत के समय सदा प्रस्तुत, परस्पर विश्वास पर आधारित-द्रौपदी और कृष्ण !
परकीया प्रेम में कितनी उमंग और ऊष्मा होती है, जाननेवालों ,कहने-सुननेवलों को भी रँगे बिना नहीं छोड़ती । मेरी सासु-माँ मगन होकर गाया करती थीं -
'कर मोहन सों यारी, हे राधा प्यारी !'
जब मोहन ने खर्चा भेजा चार मोहर एक सारी 1
सारी पहन राधा मँदिर में भैठीं ङँस रहे लोग-लुगाई !
जब मोहन ने पाती भेजी लिख दिया प्यारी प्यारी१'
लोक-मन ने उनके प्रेम को कभी स्वकीया की मान्यता नहीं दी इसीलिये इस गीत में पत्र और खर्चा भेजने की बात हैं । हर युग अपनी मान्यताओं के अनुरूप अभिव्यक्ति देता रहा और यह संबंध स्वकीया से भी अधिक दृढ़ और विश्वसनीय होकर सर्वस्वीकृत हो गया ।
पारस्परिक निष्ठा और गहनता ने उसे मान दिया उसे पूजा की वस्तु बना दिया । अपनी पत्नियों के साथ कृष्ण के मन्दिर कहीं हों या न हों राधा के साय़ वे हर मंदिर और हर गीत में जुड़े रहे हैं । उनका प्रेम शारीरिकता और सामाजिकता की सीमा से परे था । परकीया या मित्रता जो जैसा माने !
राधाकृष्म के प्रेम को कितने भावों में कितने रूपों में अंकित कया गया है । वास्तव में राधा-कृष्ण का सामीप्य केवल बाल्यवस्था का, उनके मधुपुरी जाने से पूर्व का है। उस की भंगिमा भिन्न है। अलग रह कर वह गहराता जाता है। उसके बाद एक बार दोनों की भेंट तब होती है प्रभास तीर्थ में ब्रज भूमि से गोपों की एक टोली भी आई है ।
यहाँ पत्नी और सखी का अंतर साने आता है । रुक्मिणी अधिकार संपन्ना है विवाहिता, पटरानी, संतान की जननी । पर कहीं बहुत विवश है । इतना ही विवश राधा का पति रहा होगा, यद्यपि उसका वर्णन कहीं नहीं मिलता । पत्नी जानना चाहती है, पति की बचपन की सखी, जो आज भी उसके मन में विराजती है, कैसी है। एक साधारण गोपबाला कैसे इतनी महत्वपूर्ण हो गई ?
वह कृष्ण से पूछती है 'बालापन' की जोरी के विषय में । वे इशारा करते हैं - वह ठाड़ी उन जुवति वृन्द मँह नीलवसन तन गोरी ।' लोकाचार में रुक्मिणी कहाँ पीछे थीं, राधा से प्रीतिपूर्वक भेंटीं 'बहुत दिनन की बिछुरी जैसे एक बाप की बेटी। ' (- सूरदास)
पर सौतिया डाह तो सगी बहनों में भी द्वेष भर देता है।
रुक्मिणी ने राधा को निमंत्रित किया - मन में कहीं था कि कहाँ गाँव की छोरी राधा और कहाँ द्वारकाधीश कृष्ण का यह ऐश्वर्य ! देख कर चौंधिया जायेंगी उसकी आँखें ।
कृष्ण ने उनके आगमन के उपलक्ष्य में पुर की नवीन साज-सज्जा करवाई ।अपनी बालसखी को रथ पर बैठा कर पुर का भ्रमण जो करवाना था ।आतिथ्य के प्रति रुक्मिणी अति सजग रही - कृष्ण से पूछ-पूछ कर राधा की रुचियाँ जानी ।
रानियों की दृष्टि उसकी की वेष-भूषा पर टिकी है -सतरँग लहंगा, नीली ओढ़नी, कानों में कर्ण फूल,कंठ में वनफूलों की माला पहने है राधा! मुख पर सौम्य शान्ति और परम तुष्टि !उसके अभौतिक लगते रूप के आगे रानियों के रूप-श्रृंगार फीके लगने लगे।
टीस सी उठी रुक्मिणी के हृदय में । आठों पटरानियों की देख-रेख में छप्पन भोगों की रसोई बनी । राधा भोजन करने बैठी । कृष्ण की चाव भरी दृछ्टि राधा के मुख पर! उसके मुख के ग्रास का स्वाद क्या श्याम को आ रहा है !
'तुम भी खाओ न मोहन, बस मुझे ही खिलाते रहोगे !'
ऐसे चाव से कभी पत्नियों को खिलाया था !
नहीं, पत्नी तो पति को खिला कर स्वयं तृप्त पाती है और श्याम राधा के भोग से स्वयं तृप्त हो रहे हैं ।
कृष्ण ने कहा था तुम पत्नी हो सब अधिकार प्राप्त प्रिये ,राधा अतिथि है। आई है चली जायेगी, क्या ले जायेगी तुम्हारा !?
रुक्मिणी ने गहरी साँस भरी -क्या ले जायेगी ? तुम्हारे मन का जो कोना सुरक्षित है उस के लिये ! वहा मैं नहीं हूँ । केवल वही विराज रही है । इस भाव भरे अभिनन्दन के लिये क्या नहीं निछावर किया जा सकता !सौभाग्यशालिनी है राधा कि कृष्ण के सारे एकान्त क्षण उसे समर्पित हैं ।
कृष्ण के साथ द्वारका -भ्रमण कर लौटी राधा । भोजन कर शैया पर विराजीं ,रुक्मिणी स्वयं दुग्ध का पात्र लेकर पहुँचीं, 'लो बहिन ,स्वामी को अब तक स्मरण है कि रात्रि-शयन से पूर्व तुम दुग्धपान करती हो। कहीं चूक न हो जाये उन का विशेष आग्रह है ।'
मनमोहन का उल्लेख सुन आत्मलीन राधा मुस्कराईं और पात्र हाथ में ले झटपट दूध पी लिया ,रुक्मिणी स्वयं खड़ी थीं रिक्त पात्र लेने के लिये ।
रात में रुक्मिणी ने पाया कृष्ण के चरणों में छाले पड़े है ।
'क्या बिना उपानह पैदल पुरी घुमाते रहे उन्हें, जो चरणों छाले डाल लाये ?' वाणी में किंचित तीक्ष्णता थी ।
पत्नी की मुख मुद्रा देखते रहे कुछ पल वे ,उनके मन मे क्या चल रहा है वह नहीं अनुमान पाई ।
'तुमने राधा को इतना गर्म दूध पिला दिया ?
सारे किये- धरे पर पानी फिर गया हो जैसे - रुक्मिणी एकदम अवाक् ,हतप्रभ ।
आगे पूछने -कहने को बचा ही क्या था !
द्रौपदी के साथ कृष्ण का संबंध भी नारी-पुरुष संबंधों का एक नया आयाम प्रस्तुत करता है ।
पाँच-पति होते हुए भी द्रौपदी अकेली पड़ गई थी बल्कि इस कारण और भी अकेली पड़ गई थी । सबका भिन्न स्वभाव न अपने मन की बात एक अकेले से कह सकती है ,न सबसे ।उस पर अधिकार सब का था पर कर्तव्य की बार पाँच सम्मतियाँ आड़े आ जाती थीं।
एक से से एक निराले स्वभाव के । युधिष्ठिर अति शान्त, भीम अति उग्र, नकुल और सहदेव कुशल और सुन्दर पर द्रौपदी के अनुरूप पति कहने में के लिये विचार करना पड़ेगा । एक अर्जुन ही थे जिनकी कामना द्रौपदी ने की थी ।पर विवश थे दोनों जीवन के अधिकांश समय एक दूसरे विलग रहने के लिये ।द्रौपदी और कर्ण का संबंध भी विलक्षण है । प्रेम और द्वेष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, समझ में आने लगता है । एक दूसरे को सामने पाते ही दोनों जैसे आक्रोश से भर उठते हैं, दूसरे को नीचा दिखाये बिना चैन नहीं पड़ता । और फिर पश्चाताप का दंश चैन नहीं लेने देता ।एक दूसरे को देख कर जैसे सुप्त कामना जाग उठती हो और वंचित रह जाने का दोष दूसरे के हिस्से । अनुरूप थे दोनों - अग्नि-संभवा द्रौपदी और सूर्यपुत्र कर्ण -दोनो प्रखर, अपराजेय और अभिमानी । समझौता करना दोनो के स्वभाव में नहीं। जीवन भर दाह झेलने को अभिशप्त ! द्रौपदी कर्ण को अपमानित कर स्वयं दग्ध होती रही और द्रौपदी को वस्त्रहीन करने की प्रेरणा देनेवाला कर्ण भी कभी आत्मग्लानि से छुटकारा न पा सका।
कैसा युग था कि द्रोणाचार्य जैसा गुणी दारिद्र्य से जूझ रहा था- द्रौपदी की विडंबनापूर्ण जीवन का एक और कारण। द्रुपद के मन में प्रारंभ से द्रौपदी के लिये अर्जुन की कामना थी, जिसकी सहायता से वे द्रोण से अपना प्रतिशोध ले सकें। प्रबल धनुर्धर ,कुंती-पुत्र के वर्णन मात्र सुन सुन करआकर्षित हुई होगी वह -पर यह विशेषतायें तो दोनो कुन्तीपुत्रों की थीं ।इस दृष्टि से कर्ण और अर्जुन समतुल्य भले ही कहे जायँ, पर कर्ण का ही पल्ला कुछ भारी पड़ता है कवच-कुण्डल और सूर्य जैसा तेजस्वी व्यक्तित्व । स्वयंवर कहाँ था, सारे यत्न अर्जुन को जामाता बनाने के थे । और द्रौपदी ने चलती चर्चाओं से प्रभावित होकर अपना मन बना लिया । उसने न अर्जुन को देखा था न कर्ण को । स्वयंवर में जिसके लिये मानसिक रूप से तैयार थी वह नहीं आया और आ रहा था वह जिसके विषय में बस यही जाना कि उपेक्षित सूतपुत्र है । उसने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण निर्यण ले डाला ।
घटना क्रम में जो सामने आया, प्रत्यक्ष रूप से जो देखा, वह व्यक्तित्व उपेक्षणीय नहीं था, तन मन पर छा जानेवाला था । अर्जुन से रत्ती भर भी घट कर नहीं, कुछ बढ़ कर ही ! और कुछ निराली विशेषतायें जो उसके समूचे व्यक्तित्व को दुर्निवार बनाती थीं । पांचाली जीवन भर असंतोष के दाह से दग्ध होती रही । हर बार कर्ण को देख वह आक्रोश से भर जाती कोई बोध जाग्रत होता और उसे लगता वह छली गई है ।पर किसने छला समझ नहीं पाती !पिता द्रुपद,माता कुन्ती ?और इसी ऊहापोह में कर्ण को अपमानित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा । स्वयं की कुण्ठा । लेकन इस में कर्ण का कोई दोष नहीं था, अकारण उस पर आक्रोश निकालती रही, उसे नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । राजाओं की सभा में कर्ण अकारण अपमानित हुआ। फिर बार-बार द्रौपदी से मर्म पर चोट करनेवाले वचन सुनता रहा । आखिर क्यों करती है मेरे साथ ऐसा ! जल रहा था वह अपमान की ज्वाला में । उसे परवश पाने पर वह संयत न रह सका। एक बार में सारे हिसाब चुका डाले । लेकिन क्या शान्ति मिली कर्ण को । उसके जैसे गहन-गंभीर पुरुष से किसी को यह अपेक्षा नहीं रही होगी । निरीह को नीचा दिखाना उस परम धीर और मनस्वी के स्वभाव में नहीं था । अपमान के दाह ने विवेक कुण्ठित कर दिया था, फिर अर्जुन उसका प्रतिद्वंद्वी ! उसके प्रति भी आक्रोश था । कह डाला ऐसा कुछ जिसकी चुभन से वह स्वयं भी कभी छुटकारा न पा सका और जिसके क्रियान्वित होने पर वह कभी स्वयं को क्षमा न कर सका । दोनों एक दूसरे को चोट पहुँचा कर स्वयं पीड़ा झेलते अपराधबोध से तिक्त मनस्थिति झेलने को विवश हैं । दूसरे को कष्ट पहुँचा स्वयं आहत होते हैं । स्वयं को धिक्कारते हैं भीतर ही भीतर ।
द्रुपद के प्रतिशोध की ज्वाला से प्रकटी थी द्रौपदी और कुन्ती को कलंक से बचाने को दाँव पर लगा दिया गया कर्ण का जीवन । दोनो मे से कोई सहज जीवन नहीं जी पाया । दूसरों के दाँव पर लगे रहे और कुण्ठाओं के बीच जीने को विवश रहे । कितनी दारुण यंत्रणा झेलते हुए पांचाली ने जीवन जिया होगा और मुँह खोल कर किसी से कुछ कह भी नहीं सकती । बस एक है जिससे उसका कोई संबंध नहीं लेकिन जिसने जीवन भर उसका साथ दिया उसके दुखों को समझा । वह थे कृष्ण मित्र, सखा जो उसे समझ पाता है, जिसके आगे वह अपना मन पूरी तरह खोल सकती है !
कृष्ण का जीवन निष्काम कर्मयोग का पर्याय रहा । सब के बीच रह कर भी अलिप्त और सारे आरोपों, अभियोगों, शापों को स्वाकार करते हुए भी शान्त संयत, सहज। जब सच सामने आया होगा कि महादानी कर्ण कुन्ती का पुत्र- है, तो दोनो को कैसा झटका लगा होगा। इतना बड़ा धोखा ! निरर्थक हो गया सारा जीवन ।'अरे कर्ण, द्रौपदी के मन में पुकार उठी होगी- मैं भ्रम में पड़ी अनर्थ पर अनर्थ करती गई । तुम सबसे बड़े पुत्र थे, सबसे अधिक वरेण्य मान्य,सर्वाधिक । हृदय चीख चीख कर विरोध करता रहा और अपने अहंकार में, औरों की कही हुई बातों से निर्देशित होती रही । तुम्हें लेकर हर समय मन में एक द्वंद्व चलता रहा । एक दारुण महाभारत निरंतर मेरे भीतर । मुझे पाला गया प्रतिशोध का साधन बनने के ।'
अब तक जो जो किया, जो जाना जो माना सब बेमानी लगने लगा होगा ।
महाभारत अठारह दिनों में बीत गया पर कर्ण और द्रौपदी के भीतर जो महाभारत छिड़ा था उसका समाधान किसके पास था ?सारे विश्वास टूट गये, आदर्श खंडित हो गये, निष्ठायें झूठी सिद्ध हुईं । जिया हुआ पूरा जीवन बेकार हो गया-सा । अब तक जो जो कुछ किया, जो जाना जो माना सब बेमानी लगने लगा होगा । जो किया गलत होता गया । जीवन का महाभारत बीतते-बीतते सब पर पानी फेरता गया ।
फिर आता है विवश पत्नीत्व ! ज़बर्दस्ती विवाह कर पत्नी धर्म निभाती नारियाँ । कभी बूढ़े से, कभी अंधे से, कभी नपुंसक से बलात् ब्याह दी गईं । लिप्सापूर्ति के लिये अनुचित शर्तों पर सत्यवती को विवाह हेतु विवश किया गया तो उसने अपनी शर्तें लगा दीं इससे पहले गंगा ने भी उनसे अपनी शर्तोपर विवाह किया था । मनोविकारों की विकृति का जो रूप शान्तनु से आगे तक देखने को मिलता है जैसे अपनी लिप्सा की संतुष्टि के लिये युवा पुत्र को अपने प्राप्य से वंचित होते चुपचाप देखते रहना । उन्होंने पाईं चित्राँगद और विचित्रवीर्य जैसी संतान । भीष्म काशीराज की कन्याओं का हरण कर लाये अपने नपुंसक भाइयों को सौंप दिया तबकी अरुचि और जगुप्सा की कीमत पर बनाये हुए संबंध से उत्पन्न हुए विकृत पुत्र अंधे धृतराष्ट्र और पाण्डु जन्मे । धृतराष्ट्र की पत्नी ने आँखें पर पट्टी बाँध ली । जिनका दाम्पत्य जीवन स्वस्थ न रहा हो उनकी संताने शारीरिक अथवा मानसिक रूप से कुंठित न रहें तो आश्चर्य ही होगा । विकृत दाम्पत्य की संतानें विकारग्रस्त हो जाती हैं । माता पिता ने जिनका मुख भी नहीं देखा, जिन के बचपन का आनन्द नहीं लिया वे पुत्र वात्सल्य से वंचित रह गये, श्रेष्ठ संस्कार कहाँ से पाते ! यह सब देख-जान कर गांधार नरेश शकुनि पर क्या बीतती होगी ? कैसा लगता होगा ?आपने राज-पाट से दूर बहिन के स्नेह में डूबे, उसकी संतानों को स्नेह की छाया देने वे आये थे वे । उन्हें और सब से क्या, उनका उद्देश्य अपने भागिनेयों का हित संपादित करना था और सब से उन्हें क्या !न्याय की बात कहाँ, जब गुण-संपन्ना सुन्दरी बहिन के साथ ही न्याय नहीं हुआ। जीवन के कितने सुन्दर अनुभवों से सदा वंचित रही धृतराष्ट्र की पत्नी बन कर । किसी ज़रूरतमंद स्त्री को ब्याहा होता तो वह कृतज्ञ भी होती और प्रसन्न भी ।
समझ में नहीं आता कि स्त्री हमेशा विवश बनाये रखने की कोशिश क्यों की जाती है, उसे परमुखापेक्षी देखने में शायद पुरुषोचित अहं की तृप्ति होती हो !उसके के साथ रोना और आँसू क्यों जोड़ दिये गये हैं। सीता को रोते हुए दुःखी दिखाना, मूवीज़ में, कहानियों में हमेशा रोती-धोती औरत । माँ है तो रो रही है पत्नी है तो दुख सहन किये जा रही है, बहन है तो त्याग करना उस का कर्तव्य है । रोना और सहना उनकी नियति है क्यों हँसती हुई प्रसन्न महिलायें क्या अच्छी नहीं लगतीं । अगर संसार में रोने का ठेका स्त्री से ले लिया जाय और हमेशा उसे हँसते हुए और प्रसन्न रहने की सुविधा दी जाय तो संसार अधिक सुन्दर अधिक संतुलित और मन-भावन हो जायेगा ।
शंकर की गृहिणी साक्षात् अन्नपूर्णा है ।ऐसे विचित्र परिवार में जहाँ एक वाहन वृषभ, दूसरा सिंह, तीसरा मयूर और चौथा मूषक और पति तन में सर्प लपेटे ! ऐसी गृहस्थी चलाना उन्हीं की सामर्थ्य है । और भोजन एक पुत्र के छःमुख, दूसरा गजमुख,विशाल उदर धारे, पति को कोई चिन्ता नहीं जब चाहेगा वैरागी बन जायेगा। शुरू में तो गौरा विमूढ़ रह गई होंगी ।शिकायत किससे करें सबने मना किया था, माँ तो बारात लौटाने पर उतारू हो गई थी ज़िद तो ख़ुद ने पकड़ी विवाह थी विवाह करूँगी तो केवल शंकर से नहीं तो कुँवारी रहूँगी । और यहां पति कुछ सुननेवाला नहीं, समाधि लगा कर बैठ गया तो कब जागेगा कुछ पता नहीं । अपने तन की चिन्ता नहीं गज खाल लपेट भीख माँगने में विश्वास करनेवाला झोली ले निकल जायेगा साथ में भूत-प्रेतों की टोली उससे तो पार नहीं पा सकती गौरा । ऊपर से भाँग धतूरे का लती -ज़रा सी खुशामद में आशुतोष बनकर बिना विचारे वरदान देने वाला -सम्भालती-निपटती फिरे बाद में पार्वती !
पर उन्होंने ही कहाँ कामना की थी सांसारिक सुख-वैभव की । पहले से जानती थीं उसे उस गौर पुरुष में समाहित होकर जो अवगुण भी गुण बन गये थे,
