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वर्ष- 2, अंक - 14, जुलाई 2007

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   ललित निबंध

 

गरेबां चाक करता है


शानी (गुलशेर खान)

 

र्मयुग के 24 अप्रेल,60 के अंक में प्रकाशित श्री लक्ष्मीकांत वर्मा का लेख गैर-जिम्मेवार पुस्तक-समीक्षा पढ़कर कौन ऐसा जागरूक और जीवंत साहित्य-कार है, क्षण-भर विचार करने न बैठ जाये ?  वास्तव में यह लेख एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। यह जलती हुई समस्या है जिसका धुआं प्रत्येक जीवित साहित्यकार के मन को घेरे हुए है।

 

 लेकिन समस्या केवल पढ़ने और क्षण-भर विचार करके रख देने मात्र से नहीं सुलझती। लेख के प्रकाशन का वह उद्देश्य भी नहीं है। आये-दिन हिंदी की अनेक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में ऐसी, या इसी तरह की लेख-टिप्पणियाँ प्रकाशित होती रहती है, जिनमें बड़े-बड़े महत्त्वपूर्ण और समसा-यिक प्रश्नों को उठाया जाता है। किसी भी समस्या की ओर इंगित करना या उसके विभिन्न पहलुओं पर विचार करना वास्तव में हल की अपेक्षा के लिए होता है। इस तरह की रचनाओं का महत्व इसलिए है कि ये न केवल हमारी कठिनाइयों को रखती हैं, बल्कि हमारी चेतना, योगदान और ईमानदाराना कदम की भी मांग करती है। और यह तभी संभव है, जब हम इन्हें सचमुच गंभीरतपूर्वक लें और उनपर सामूहिक रूप से चिंतन व विचार हो सके।

 

लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। होता यह है कि रचना प्रकाशित होती है, चंद बुद्धिजीवी या तथाकथित जागरूक पाठक पढ़ते हैं। लेखक यदि उनके घेरे का हुआ, तो आपस में चर्चा भी कर ली, अन्यथा नोटिस तक नहीं लिया जाता, और वह प्रश्न अनुत्तरित ही पत्रिका के पन्नो में दफन होकर रह जाता है।

 

मुझे ऐसे कई लेख याद आ रहै हैं । समस्याएं भी जहन में हैं, और उनके लेखक राजेंद्र यादव व श्रीकांत वर्मा आदि के आग्रह भी अभी नहीं भूले । धर्म-युग के किसी पिछले अंक में अपने लेख द्वारा राजेन्द्र यादव ने लेखक और पाठक के बीच की दीवार की बात उठायी थी । उसमें भी लेखक ने अपने यहाँ की वर्तमान परिस्थितियों पर गहरा क्षोभ प्रकाट किया और लक्ष्मीकांत वर्मा की तरह पाश्चात्य प्रणालियों व वस्तु-स्थितियों की चर्चा की थी ।

 

नयी दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका कृति(दिसंबर 56अंक) में श्रीकांत वर्मा की एक टिप्पणी ढाक के तीन पात शीर्षक से आयी थी, जिसमें उन्होंने सरकार की पुरस्कार-नीति की आलोचना कर एक सुझाव रखा था। बात सचमुच बड़ी महत्वूर्ण थी कि सरकार की रीति-नीति जनता के सामने जैसा विकृत मानदंड प्रस्तुत कर रही है(चर्चा दिनकर के ग्रंथ संस्कृति के चार अध्याय पर सरकारी पुरस्कार से निकली), उसके प्रति मौन साध लेना, एक गुरु, साहित्यिक अपराध है ! सुझाव था कि ब्रिटेन के बुक-क्लब तथा यूरोप और अमेरिका की स्वतंत्र समितियों जैसी छोटी-बड़ी समितियाँ या संस्थाएं गठित कर क्यों न इस खतरे का सामना किया जाये ? इस दिशा में कदम उठाने का भी उनका आह्वान था। लेकिन अंततः इनका क्या हुआ ? अब बात आयी-गयी हो गयी है और अधिकांश लोगों को शायद उसकी याद भी न हो। मैं नहीं समझता कि किसी ने तब भी इन बातों का अधिक नोटिस लिया होगा। मेरे जैसे चंद लोगों ने यदि आवश्यकता अनुभव भी की, या लेखक से सहमत हुए, तो इसलिए पल्लू झटककर अलग हो गये कि कौन मुफ्त की झंझट मोल ले। और यहीं मुझे प्रसिद्ध पाश्चात्य विचारक व लेखक श्री इमर्सन की पंक्तियाँ दुहरानी पड़ती हैं-

 

वी लूज़ टाइम इन ट्राईंग टु बी लाइक अदर्स, अक्युज़िंग अवरसेल्व्ज बिकाज वी आर नाट लाइक अदर्स ।

 

मुझे डर है कि लक्ष्मीकांत वर्मा के इस लेख का भी वहीं हश्र होने जा रहा है, जो राजेंद्र यादव, श्रीकांत वर्मा, श्री नरेश मेहता, हरिशंकर परसाई आदि लेखकों की एकाधिक लेख-टिप्पणियों का हुआ।

 

मेरे मन में एक जिज्ञासा उठती है कि इस तरह के लेख फिर क्यों लिखे और प्रकाशित किये जाते हैं ? इनकी सार्थकता क्या है ? हमारे यहाँ इस बात का चलन नहीं कि समकालीन साहित्यकार द्वारा उठाये गये किसी अहम् सवाल पर भी सामूलिक रूप से विचार करके उनके हल के प्रयत्न किये जायें। हल ढूंढ़ता तो बड़ी बात है किसी के द्वारा उठाये गये प्रश्न पर अपने विचार चंद स्तरों में लिख भेजना तक हमारे अहं को गवारा नहीं।

 

यह और बात है कि किसी छोटी-सी चीज़ को विवाद बनाकर उसपर महीनों इधर-उधर पक्ष-विपक्ष में लिखा जाये, जैसाकि पिछले दिनों डॉ. धर्मवीर भारती की कविता ढीठ चांदनी (सात गीत वर्ष) और स्व. सतीश चौबे के नाम से आकलिक कविता चाँदनी जागती है को लेकर बड़ी-बड़ी कैफ़ियतें आयीं-गयीं । कईं लोगों ने इस विवाद में बड़े मज़े से हिस्सा लिया, और अनावश्यक तूल पाकर वह बात कई महीनों चली।

 

मैं यह नहीं कहता कि वस्तुस्थिति पर प्रकाश नहीं पड़ना चाहिए। शंकाओं का निश्चय ही निवारण होना चाहिए, लेकिन उस ढीठ चांदनी विवाद से एक बात स्पष्ट हो गयी है कि हमारी प्रवृत्ति में छिद्रान्वेषण अधिक है। जितनी रुचि व उत्साह ऊँची मीनार के चमकते कलश को गिराने में हम लोग लगाते हैं, उसका दशमांश भी यदि निर्माणात्मक हो, तो जो आवाज़ें उठती हैं, या उठायी जाती हैं, वे क्या ऐसे ही लौटती रहेंगी ?

 

हिंदी में गैर-जिम्मेदाराना ढंग सी पुस्तक-समीक्षा की शिकायत, जहाँ तक मैं जानता हूँ, प्रत्येक साहित्यकार करता है। बड़े और प्रतिष्ठित लेखक से लेकर नये लेखक तक। आपस में चर्चा भी होती है, लेकिन इसके आगे कुछ नहीं होता। जैसा कि लक्ष्मीकांत जी ने लिखा है कई बार समीक्षाएं निष्पक्ष नहीं होती; रचना का सही मूल्यांकन नहीं होता । ऐसी स्थिति में उस रचनाकार का क्या होगा, जो अपनी कृति से छूटकर प्रतिक्रिया की बाट देखता है, और उसके अनुसार अपनी शक्ति तोलकर आगे बढ़ना चाहता है ? विशेष- कर एक नये लेखक का ? वैसे यह बात हो बात है कि रचनाकार को तटस्थ और बिल्कुल निर्विकार होकर अनुकूल प्रशंसाओं और विरोधी आलोचनाओं से प्रभावित हुए बिना, चुपचाप रचना करते चलना चाहिए।

 

दरअसल, तटस्थ और निर्विकार रचनाकार कोई नहीं होता । अनुकूल प्रशंसा या विरोधी आलोचना से विचलित होना और बात है और आलोचना के सहारे, समालोचनाओं को जाँचना और ईमानदारी से आवश्यक प्रभाव ग्रहण करना और। मैं समझता हूँ कि अपनी रचना-शक्ति के संबंध की सामयिक चर्चा का थोड़ा-बहुत प्रभाव स्वीकार किये बिना किसी भी जागरूक और महत्त्वाकांक्षी रचनाकार में गति ही नहीं आ सकती। जंगल की राह तय करने के लिए केवल अपने सामने पगडंडी को देखना ही पर्याप्त नहीं होता, आस-पास भी नज़र डालकर चलना पड़ता है ।  समुंदर के किनारे खड़ी अचल चट्टान भी भले थपेड़ों से न हिले, लहरों के दाग तो झेलती ही है !

 

पुस्तक-समीक्षा के सिलसिले में एक और महत्त्वपूर्ण बात है, जिसका उल्लेख वर्माजी ने नहीं किया। निर्दलीय, निष्पक्ष और साहसिक समीक्षा तो आगे की बात है पहले तो अधिकांश पुस्तकों की समीक्षाएं ही नहीं निकल पातीं। जो कुछ छोड़ी-बहुत निकल पातीं हैं वे लेखकों के अपने प्रयत्नों के कारण ही, और पर्याप्त विलंब के बाद।

 

मेरी नयी पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद प्रकाशक (जो कि स्वयं हिंदी के प्रसिद्ध लेखक हैं) ने मुझे लिखा-आपकी पुस्तक समालोचनार्थ पत्रिकाओं को भेज दी गयी है, अब समालोचनाएं निकलवाना आपका काम है। शायद उन्होंने गलत नहीं लिखा, क्योंकि प्रकाशक होने और साथ-साथ दस-पंद्रह पुस्तकों के लेखक होने के कारण इस संबंध में उनका तजुर्बा खुद ही तल्ख है।

 

प्रायः ऐसा होता है कि पुस्तक प्रकाशित होने के दो-दो साल बाद तक कृति अथवा कृतिकार का मूल्याँकन किया जाता है, जबकि या तो पुस्तक का संस्करण ही समाप्त हो गया होता है, अथवा लेखक इस बीच प्रगति के कई डग भरकर आगे निकल चुका होता है । ले-देकर किये गये ऐसे मूल्याँकन से अंततः किसका लाभ होता है ? जाहिर है कि न पाठक लाभान्वित होता है और न स्वयं लेखक ही ।

 

कारण अपने-आपमें स्पष्ट है कि मूल्याँकन मूल्याँकन के लिए नहीं, दस्तूर के लिए होता है। प्रायः प्रतिष्ठित समालोचक समीक्षाएं नहीं करते, और समकालीन लेखक अथवा कवि पर फेलो-ट्रेवेलर की समालोचना का भार चाहे या अनचाहे, आ पड़ता है - इसमें देरी भी न स्वाभाविक है, और पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टि भी।

 

प्रश्न है कि फिर समीक्षा या तथाकथित मूल्याँकन पत्र-पत्रिकाओं में क्यों होता है ? इन साहित्यिक पत्रिकाओं से वे असाहित्यिक पत्रिकाएं किस मानी में भिन्न हैं, जो समीक्षा-अमीक्षा के चक्कर में नहीं पड़ती, और उसकी एवज हँस-हँसकर मर गये या जब मैं हँस पड़ा जैसे स्तंभों से सस्ते पाठकों का मनोरंजन करती हैं ? हर्ष की बात है कि इस ओर कहानी, कृति जैसी पत्रिकाओं का दृष्टिकोण अधिक उदार है, और केवल दस्तूर विभाव वहाँ नहीं होता ? यह क्या कम आश्चर्य की बात है कि धर्मयुग जैसा पत्र नये साहित्य के लिए एक पृष्ठ तक नहीं दे सकता ?

 

इन पंक्तियों की समाप्ति पर मुझे इस लेख के आरंभ की बातों का ध्यान आता है जिसमें समय-समय पर ऐसी समस्याओं को उठाने वाले लेख व टिप्पणियों की सार्थकता की बात मैंने कही है। लगता है हम सब बौद्धिक और चेतनशील होने का दावा तो करते हैं, लेकिन यह दावा भी आगे नहीं जाता, दस्तूर बनकर रह जाता है। शायद यह लेख भी वैसा ही दस्तूर है, क्योंकि अंततः इसका भी ही हश्र होने जा रहा है। और इमर्सन के अनुसार आल कनवर्सेंशन एमंग लिटररी मेन इज़ मडी

शानी

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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